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सरकारी दांवपेंच में उलझ रहे स्वैच्छिक संगठन, प्रोजेक्ट और फंड के चक्कर में न रहें: हर्ष

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Ranchi: सरकार की नीतियों में दांवपेंच के कारण स्वैच्छिक संगठनों को उलझनों का सामना करना पड़ रहा है. कई संस्थाएं हैं जो सही तरीके से काम करती हैं, लेकिन सरकारी दबाव में आकर इन्हें मुसीबतों का सामना करना पड़ता है. उक्त बातें वाणी के हर्ष जेटली ने वीणा और लीड्स की ओर से आयोजित एक दिवसीय कार्यशाला में कहा. कार्यशाला का विषय झारखंड में स्वैच्छिक संस्था जगत में क्षेत्रीय नेतृत्व विकास था. उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर तो कई मुद्दों की बात होती है, मगर राज्य स्तर पर ऐसा नहीं होता. स्वैच्छिक संस्थाओं को चाहिये कि‍ राज्य स्तर के मुद्दों पर अधिक ध्यान दें, क्योंकि ऐसा करने से राष्ट्रीय स्तर की समस्याएं नहीं होंगी. उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय नेतृत्व विकास का अभाव है. पब्लिक परसेपशन एक बड़ा मुद्दा है, इसको बदलने की जरूरत है. इस पर युवाओं के साथ काम करने की जरूरत है.

काम करने वालों को नहीं मिलता फंड

लीड्स के निदेशक एके सिंह ने कहा कि कई संस्थाएं हैं जो जमीनी स्तर पर काम करती हैं. ऐसी संस्थाओं को रोकने के लिए सरकार फंड नहीं देती. जबकि कई क्षेत्र ऐसे हैं जहां ग्रामीणों को सरकार की नीतियों की जानकारी नहीं है. उन्होंने कहा कि प्रोक्युरमेंट पॉलिसी ऐसी है जो स्वैच्छिक और नीति संगठनों का ही एक नीति है जो सही नहीं है. उन्होंने कहा कि सरकार की संस्थाओं को लंबे समय तक प्रोजेक्ट मिलता है, जबकि स्वतंत्र संस्थाओं के साथ ऐसा नहीं होता.

संस्थाओं के बीच तालमेल नहीं

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एके सिंह ने कहा कि संस्थाओं को चाहिए की एकजुट होकर काम करें, तभी लक्ष्य तक पहुंचा जायेगा. प्रोजेक्ट और फंड के चक्कर में संस्थाओं के बीच नेटवर्क खराब होता है. उन्होंने कहा कि स्वयंसेवी संगठन एक तरह का संसाधन केन्द्र हैं, जिसका उपयोग समाजिक-आर्थिक विकास और बदलाव के लिए हमेशा से किया जाता रहा है. चाहे सरकार के परामर्शदाता के रूप में या सीधे लोगों के बीच काम करती है.

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