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राज्य में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की नीति नहीं होने का फायदा उठा रहीं निजी कंपनियां, खामियाजा भुगत रहे किसान

कृषि सचिव पूजा सिंघल बोलीं- राज्य में नहीं है कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग का कोई ड्राफ्ट

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Ranchi : 29 और 30 नवंबर को रांची में ग्लोबल एग्रीकल्चर एंड फूड समिट हुआ था. इसे किसानों का महाकुंभ भी कहा गया. किसानों के भले और विकास की बड़ी-बड़ी बातें कही गयीं इसमें. खुद मुख्यमंत्री रघुवर दास ने किसानों की आय दोगुनी करने की बात करनेवाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी दो कदम आगे बढ़कर किसानों की आय चौगुनी करने का सपना दिखा दिया. बाबा रामदेव ने भी झारखंड के किसानों को सपना दिखा दिया कि उनकी कंपनी पतंजलि सीधे किसानों से उनका सारा उत्पाद खरीद लेगी. कुल मिलाकर रघुवर सरकार झारखंड के किसानों का हमदर्द बनने की कोशिश करती दिखी. लेकिन, आपको बता दें कि राज्य सरकार की अनदेखी के कारण राज्य के किसान कृषि उत्पाद बेचनेवाली निजी कंपनियों के शोषण का शिकार हो रहे हैं. इस शोषण का जरिया बनी है राज्य में हो रही कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग. और, किसानों के इस शोषण का कारण यह है कि राज्य में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को लेकर झारखंड सरकार ने कोई कानून या नीति ही नहीं बनायी है. किसानों की आय चौगुनी कर देने का वादा करनेवाली रघुवर सरकार ने भी कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के जरिये निजी कंपनियों के हाथों शोषित हो रहे किसानों के लिए अब तक कोई नीति नहीं बनायी है.

केंद्र ने कहा था- कॉनट्रैक्ट फार्मिंग के लिए कानूनी मसौदा जरूरी है

झारखंड में कृषि का स्वरूप भी अजीब है. केंद्र सरकार ने जनवरी 2018 में कहा था कि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग (अनुबंध खेती) के लिए कानूनी मसौदा जरूरी है. अगर कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग का कानून नहीं बना, तो किसानों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा. बिचौलियों की तरह कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग करानेवाली एजेंसियां किसानों का मुनाफा ले जायेंगी. पिछले सप्ताह खेल गांव में हुए ग्लोबल एग्रीकल्चर एंड फूड समिट में मुख्यमंत्री रघुवर दास और कृषि सचिव पूजा सिंघल ने किसानों की दशा और दिशा सुधारने और आय दोगुनी करने की बात कही थी, लेकिन नीतिगत मामलों पर किसी ने कुछ नहीं कहा. विभाग द्वारा भी इसकी अनदेखी की गयी. किसानों को लाभ की जगह नुकसान होने की अधिक संभावना दिख रही है. राज्य में सिंचाई सुविधा के अभाव में किसान एकफसली खेती करने को विवश हैं.

बिना कानूनी मसौदे के हो रही है कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग

राज्य में कई सालों से कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की जा रही है. इसमें रिलायंस फ्रेश, सफल, सुविधा जैसी कंपनियां शामिल हैं. लेकिन, कृषि विभाग के पास कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग का कोई कानूनी मसौदा ही नहीं है. इसके कारण कंपनियां अपनी शर्तों के अनुसार किसानों से कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग करा रही हैं. रांची के आस-पास खूंटी, नगड़ी, रातू, कांके, बेड़ो में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की जा रही है. कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के तहत किसानों को उत्पादन का सब्जबाग दिखाया जा रहा है, लेकिन उत्पादन नहीं बढ़ रहा है.

कृषि सचिव को नहीं मालूम क्या है कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग

कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के कानूनी मसौदे पर जब कृषि सचिव पूजा सिंघल से बात की गयी, तो वह को-ऑपरेटिव फार्मिंग की जानकारी देने लगीं. फिर उन्होंने कहा कि इजरायल से लौटकर आये किसान और बीएयू के कृषि वैज्ञानिकों के प्रयास से विभाग द्वारा को-ऑपरेटिव फार्मिंग चार जिलों में शुरू की जायेगी, जिसमें रांची, पाकुड़ लातेहार और खूंटी जिला शामिल हैं. फिर दोबारा कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के संबंध में पूछा गया, तब उन्होंने कहा कि विभाग के पास कोई पॉलिसी नहीं है. सफल द्वारा कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग कराया जा रही है, इस संबंध में उद्योग विभाग बतायेगा, उनसे पूछिये.

क्या कहती है कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग करानेवाली एजेंसी

सफल के असिस्टेंट मैनेजर कुंदन कुमार का कहना है कि कंपनी ने 2018 में 105 एकड़ में स्वीट कॉर्न कराया. बारिश और सिंचाई सही रूप से नहीं होने से मात्र 30% ही उत्पादन हुआ. इससे किसानों के साथ-साथ कंपनी के भी मुनाफे में कमी आयी. कंपनी ने किसानों से 9.50 रुपये प्रति किलो स्वीट कॉर्न खरीदा और प्रोसेसिंग कर इसे राज्य एवं राज्य के बाहर भेजा गया. जब कुंदन कुमार से सरकार की पॉलिसी के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि इसके बारे में उन्हें जनकारी नहीं है. इस वर्ष टमाटर की खेती करने की कंपनी की योजना है.

क्या कहते हैं कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग करनेवाले किसान

खूंटी के लक्ष्मण महतो कहते हैं, “मैंने खूंटी जिले में 24 एकड़ में स्वीट कॉर्न खेती सफल के साथ की. इसमें आशा के अनुरूप मुनाफा नहीं हुआ. सफल के साथ के द्वारा खेती की तैयारी से लेकर प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता देने के लिए कृषि वैज्ञानिक हमारे खोतों में आते रहे. जब उत्पाद को कंपनी द्वारा खरीदा गया, तब 2504 रुपये प्रति किलो की दर से बीज का पैसा कंपनी ने काट लिया. 24 एकड़ में कुल 70 किलो सिर्फ बीज लगा. प्रति एकड़ बीस हजार रुपये खर्च हुआ. कुल लागत चार लाख 80 हजार रुपये से अधिक हुई और लाभ मात्र पांच लाख रुपये के करीब. सरकार की ओर से किसी प्रकार की सहायता नहीं मिली.

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राज्य में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की नीति नहीं होने का फायदा उठा रहीं निजी कंपनियां, खामियाजा भुगत रहे किसान

कृषि निर्यात को प्रोत्साहन के लिए बन रही व्यापक नीति

कृषि मंत्रालय द्वारा कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग का कानूनी मसौदा तैयार किया जा रहा है. इसके लिए केंद्र सरकार ने मॉडल कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग एक्ट का मसौदा जारी करके सभी पक्षों से सुझाव व टिप्पणी आमंत्रित किये थे. वाणिज्य मंत्रालय भी कृषि उत्पाद, जैसे- चाय, फल और सब्जियों के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए परिवहन समेत सभी मसलों पर व्यापक नीति बनाने की तैयारी कर रहा है. भारत कृषि उत्पादों का सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक है. इस क्षेत्र में अभी भी निर्यात बढ़ाने की व्यापक संभावनाए हैं. मंत्रालय के अधिकारी के अनुसार ग्लोबल वैल्यू चेन में शामिल करके इन उत्पादों में वैल्यू एडिशन की काफी गुंजाइश है. सरकार की व्यापक नीति में लॉजिस्टिक और सर्टिफिकेशन समेत सभी मुद्दों को शामिल किया जायेगा. निर्यात बढ़ाने के लिए बेहतरीन इन्फ्रास्ट्रक्चर होना अत्यंत महत्वपूर्ण है. इससे किसानों की आय दोगुनी करने और निर्यात बढ़ाने में मदद मिलेगी.

क्या होती है कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग?

अक्सर देखा गया है कि खरीदार नहीं मिलने पर किसानों की फसल बर्बाद हो जाती है और किसानों को भारी नुकसान झेलना पड़ता है. इसके पीछे सबसे बड़ी वजह होती है किसान और बाजार के बीच तालमेल की कमी. ऐसे में ही कॉन्ट्रैक्ट खेती की जरूरत महसूस की गयी, ताकि किसानों को भी उनके उत्पाद की उचित कीमत मिल सके. कांट्रैक्ट खेती का मकसद है- फसल उत्पाद के लिए तयशुदा बाजार तैयार करना. इसके अलावा कृषि के क्षेत्र में पूंजी निवेश को बढ़ावा देना भी कांट्रैक्ट खेती का उद्देश्य है. कृषि उत्पाद के कारोबार में लगीं कई कॉरपोरेट कंपनियों ने कांट्रैक्ट खेती के सिस्टम को इस तरह सुविधाजनक बनाने की कोशिश की कि उससे उन्हें अपनी पसंद का कच्चा माल तय वक्त पर और कम कीमत पर मिल जाये.

देश में पहली बार पंजाब ने बनाया कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के लिए कानून

भारत में पहली बार पंजाब राज्य ने 2013 में द पंजाब कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग एक्ट बनाया. इस कानून के आधार पर कृषि आधारित उत्पाद तैयार करनेवाली कंपनियां सीधे किसानों से अपने लिए फसल उत्पादन करने का समझौता कर सकती हैं. किसानों द्वारा उपजायी गयी फसल को कंपनियां सीधे खरीद सकती हैं.

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