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जेल ले जाने से पहले होती है कैदियों की बेशर्म जांच, गालियों से होती है शुरूआत

सभी कैदी लाइन में लग जाओ, जो नया है वो अलग से खड़ा हो जाओ

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Kumar Gaurav

Ranchi : “जोड़ा में बैठें, गिनती होगा” इसी आवाज से हर दिन सुबह 5:30 बजे नींद खुल जाती थी. जब आंख खुली तो सादा कुर्ता पहने एक आदमी जिसके हाथों में चाबियों का गुच्छा है और उसके साथ एक सिपाही भी है. वह कैदियों की गिनती करना शुरू करता है. जेल में सुबह की शुरूआत यहीं से होती है.

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जब आप कोर्ट में आत्मसमर्पण करते हैं या आपको गिरफ्तार कर जज के सामने पेश किया जाता है. उसके बाद आपको जेल लाया जाता है. हाथों में हथकड़ियां लगाकर कोर्ट हाजत की ओर ले जाया जाता है. हाजत के मुख्य दरवाजे पर तलाशी भी होती है. फिर आपको हाजत के कमरे में ले जाया जाता है, जो बहुत ही बदबूदार होता है. बदबू की एक मात्र वजह ये है कि उस कमरे से ही सटा बहुत ही गंदा शौचालय होता है. शौचालय के चारों ओर इतनी गंदगी रहती है, जिसे देखकर कहा जा सकता हैं की स्वच्छ भारत अभियान सिर्फ तस्वीरों में ही नजर आता है. दो घंटे के बाद सभी कैदियों को गाड़ी में भरकर जेल की ओर ले जाया जाता है.

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दोषसिद्ध कैदी करता है कैदियों के गुप्तांगों की जांच

मुख्य दरवाजे के अंदर जाने के साथ ही एक आदेश आता है कि “सारे कैदी लाइन में लग जाओ और जो नया कैदी है, वो अलग से खड़ा हो जाओ”. जेल गेट पहुंचने के बाद कैदियों की जांच शुरू होती है. जांच का तरीका जेल में आज भी पुराने जमाने की तरह ही है. आधुनिकता के इस दौर में भी एक-एक कैदी के सारे कपड़े उतरवाकर उनकी तलाशी ली जाती है. देश का आधुनिकीकरण हो गया है, लेकिन आज भी कारावास में कैदियों की जांच करने का तरीका आधुनिक नहीं हुआ है. सभी कैदियों को एक-एक कर दोषसिद्ध कैदी के सामने नंगा होना पड़ता है, वो भी सार्वजनिक तौर पर जहां चारों ओर महिला और पुरुष पुलिसकर्मी मौजूद रहते हैं.

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वर्तमान में राजू तांति नाम का दोषसिद्ध कैदी ही विचाराधीन और दोषसिद्ध कैदियों की शारीरिक जांच करता है. कैदियों के मानवाधिकार का हनन करते हुए तथा उनको अपमानित करते हुए उनके गुप्तांगों की भी तलाशी ली जाती है. ये कहना बहुत ही हास्यास्पद लगता है कि तलाशी लेने वाला कोई पुलिस या जेल अधिकारी नहीं होता हैं, बल्कि वो खुद एक दोषसिद्ध कैदी ही होता है. गुप्तांगो की भी जांच वही करता है, वो भी बेहद बेशर्मी के साथ, जिसका बखान इस लेख में करना संभव नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2018 में कहा था कि कैदियों के भी मानवाधिकार हैं, उन्हें जानवरों की तरह जेल में नहीं रखा जा सकता है. जेल एक सुधार गृह होता है. वहां कैदियों के साथ जानवरों सा व्यवहार करना कैदियों के मानवाधिकार का हनन है. इसके बावजूद हर कदम पर कैदियों के साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता है. कैदियों से सीधे लहजे में बात तक नहीं की जाती. बल्कि गाली से शुरूआत और गालियों से ही बातों का अंत किया जाता है. तलाशी तथा जेल प्रक्रिया पूरी होने के बाद अंदर ले जाया जाता है.

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मौत का घर है जेल अस्पताल

जेल अस्पताल के भवन की स्थिति ठीक है, लेकिन ना कोई नर्स और ना कोई वार्ड बॉय है. दो डॉ, एक प्रभारी और कुछ स्टाफ ही हैं. बेहतर प्राथमिक इलाज के लिए कोई तकनीकी सुविधा नहीं है. अगर किसी कैदी का किसी वजह से शरीर का कोई हिस्सा टूट जाय तो बिना एक्स-रे किए हुए ही कैदी के टूटे अंग पर प्लास्टर कर दिया जायेगा. चाहे कैदी के शरीर का टूटा हिस्सा सही से जुड़े या फिर जैसे-तैसे, वहीं इसकी जिम्मेवारी जेल प्रशासन की नहीं है. कहा जाता है कि अस्पताल में मरीज रहते हैं, लेकिन जेल अस्पताल में 70% स्वस्थ कैदियों को जगह दी जाती है. जिसके पास पैसा है या फिर जिसका परिचय जेल या अस्पताल प्रशासन के किसी अधिकारी से है, तब वह कैदी आराम से बिना अस्वस्थ हुए भी अस्पताल में आराम कर सकता है. ऐसा इसलिये क्योंकि अस्पताल में मरीजों के लिये जो बिस्तर लगे होते हैं, वो थोड़े आरामदायक होते हैं.

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जेल अस्पताल में दवा के नाम पर की जाती है खानापूर्ति

लेकिन अगर खाने की बात की जाए तो जेल अस्पताल में मरीजों को जो खाना दिया जाता है, उससे मरीज स्वस्थ होने के बजाए और बीमार हो जाएंगे. दूध के नाम पर पानी दिया जाता है. जबकि जो खाना जेल मैनुअल के हिसाब से होता है वो खाना तो कैदी मरीजों को दिया ही नहीं जाता है. कैदी मरीजों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ किया जाता है. यहां भी दोषसिद्ध कैदी ही वार्ड बॉय का काम करता है. किसी मरीज की तबियत बिगड़ जाये तो पहले कैदी ही सूई और दवा देते हैं. लेकिन यदि इससे मरीज की तबियत में कोई सुधार नहीं हुआ, तब डॉक्टर को बुलाया जाता है. बात यहीं खत्म नहीं होती है, अस्पताल में अच्छे आरामदायक बेड के लिए मोटी रकम भी चुकानी पड़ती है. मोटी रकम देने के बाद आपको अस्पताल में घर जैसी सारी सुविधाएं उपलब्ध करायी जायेंगी. वहीं जेल अस्पताल में दवा की बात की जाए तो वहां दवा के नाम पर महज खानापूर्ति ही होती है. साथ ही जेल अस्पताल में साधारण जांच की भी सुविधा उपलब्ध नहीं है. जिसमें खून जांच, यूरिन जांच, X-ray करने को लेकर प्राथमिक सुविधा नहीं है. जेल अस्पताल बस भगवान भरोसे ही है.

हाल ही में जेल से निकले व्यक्ति से की गई बातचीत पर आधारित

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