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कांग्रेस को घेरने के लिए प्रधानमंत्री ने उछाला है अर्बन नक्सली का जुमला

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Faisal Anurag

अर्बन नक्सली जुमला अब चुनावों के हथियार के रूप में मतदाताओं को लुभाने के लिए मैदान में उतार दिया गया है. छत्तीसगढ़ की एक सभा में प्रधानमंत्री ने इसकी चर्चा कर इस मुहावरे को शासकीय मान्यता दे दी है. अब तक अर्बन न्क्सली की बहस टीवी चैनलों तक ही सीमित थी और कुछेक सत्तारूढ़ दल के नेता इसका इस्तेमाल कर रहे थे.

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प्रधानमंत्री ने इस शब्द‍ का इस्तेमाल कर कांग्रेस को निशाना बनाया है और अर्बन नक्सलियों के अभिजात जीवन शैली का उल्लेख किया है. हालांकि प्रधानमंत्री इसका कोई ठोस उदाहरण नहीं दे पा रहे हैं. गुजरात के विधानसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह पर आरोप लगाते हुए उनके पाकिस्तान साजिश में शामिल होने की बात कही थी. बाद में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने खेद भरे शब्दों में इसकी सफाई देते हुए डॉ सिंह की प्रशंसा की थी.

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जाहिर है एक बार फिर प्रधानमंत्री ने कांग्रेस को घेरने के लिए अर्बन नक्सली-कांग्रेस संबंध का हवाला दिया है. यह आरोप लगाते हुए प्रधानमंत्री 2014 के अंत में दिए गए अपने ही वक्तव्यों को भूल गए जिसमें उन्होंने कहा था कि नक्सली हमारे ही लोग हैं. भारतीय राजनीति में इन दिनों अर्बन नक्सली शब्द का इस्तेमाल उन लोगों के दमन के लिए ज्यादा किया जा रहा है जो मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में अपनी विशेष छवि रखते हैं और सरकार की आर्थिक और राजनीतिक नीतियों का विरोध करते रहे हैं.

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इससे यह मुद्दा उभर का सामने आता है कि आखिर सरकार के विरोध में बोलनेवालों को देशद्रोही और अब अर्बन नक्सली के घेरे में डाल कर सरकार दरअसल क्या दिखाना चाहती है. जिन लोगों पर देशद्रोह के मामले दर्ज किए गए लंबा वक्त गुजर जाने के बाद भी उन्हें सरकार प्रमाणित नहीं कर पायी है और न ही उनके खिलाफ आरोप पत्र ही दायर किया जा सका है. अब तक जिन पर अर्बन नक्सली होने का आरोप लगा कर या तो गिरफ्तार किया गया है या जिनके घरों में छोपे मारे गए हैं उनके खिलाफ भी सकरार कोई ठोस प्रमाण पेश नहीं कर पायी है. सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस चंद्रचूड़ ने इसी मामले पर सुनवाई के दौरान असहमति के अधिकार का सवाल उठा कर तल्ख टिप्पणी की थी. यहां तक कि जिन कथित अर्बन नक्सलियों पर प्रधानमंत्री की हत्या‍ करने की साजिश के आरोप लगे हैं उसमें भी छानबीन का जो तरीका अपनाया गया है उसे ले कर अनेक तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं.

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मानवाधिकार आंदोलन और कार्यकर्ताओं से सरकारों की नाराजगी का पुराना इतिहास है. लेकिन यह पहली बार हो रहा है कि मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर इस तरह के आरोप लगा कर उनके कार्य को और उनकी साख को प्रभावित करने का प्रयास सुनियोजित तरीके से किया जा रहा है. प्रधानमंत्री ने अर्बन नक्सलियों के सुविधापूर्ण जीवन की बात करते हुए यह भी कहा है कि वे वातानुकूलित कमरों में रहते हैं, महंगी गाडियों में चलते हैं और उनके बच्चे विदेशों में पढ़ते हैं, लेकिन वे आदिवासियों को हथियार पकड़ा कर उनके विकास के रास्ते को ही बंद कर देते हैं. प्रधानमंत्री के इस कथन के बाद प्रतिक्रिया में अनेक लोगों ने कहा है कि सरकार को चाहिए कि वे अपने आरापों को प्रमाणित करे. इसके साथ ही कारपोरेट और क्रोनी कारपोरेट राजनीति का मुद्दा भी उभर कर सामने आ गया है. यह सर्वविदित है कि भारत की संसदीय राजनीति कारपोरेट घरानों के प्रभाव में है. कारपोरेट घराने न केवल सकरार की नीतियों को प्रभावित करते हैं बल्कि कई बार वे सरकारों का भविष्य भी तय करते हैं.

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कांग्रेस के शासनकाल में ही नक्सलियों के खिलाफ आपरेशन ग्रीन हंट चलाया गया था और तत्कालीन गृह मंत्री पी चिदंबरम ने नक्सलियों को आतंरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया था. प्रधानमंत्री मोदी अब कांग्रेस पर ही आरोप लगा रहे हैं कि उसकी सांठगांठ अर्बन नक्सलियों से है. झारखंड में नक्सल विरोधी ऑपरेशन सारंडा भी कांग्रेस के जमाने की ही योजना थी और उसे कामयाब बनाने के लिए कांग्रेस की सरकार ने पूरा प्रयास किया था. प्रधानमंत्री के नए आरोप के बाद आरोप प्रत्यरोप का दौर जारी है, लेकिन इसे केवल चुनावी जुमला ही नहीं बना देना चाहिए. केंद्र सरकार ओर प्रधानमंत्री को चाहिए कि आरोप की गंभीरता को देखते हुए उसके प्रमाण पेश कर दोषियों को दंडित किया जाए. वरिष्ठ पत्रकार आरथी जेरथ ने कहा है कि अभी अर्बन नक्सली के नाम पर जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया है, उनका जीवन खुली किताब है. सुधा भारद्वाज ने अमेरिकी नागरिकता छोड़ और हाइकोर्ट के जज का ऑफर त्याह एक सादगीपूर्ण जीवन का उदाहरण पेश किया है वहीं गौतम नवलखा ने भी एक सामान्य व्यक्ति की तरह ही बड़े ऑफर को ठुकरा कर रहना पसंद किया है. जेरथ ने यह भी सवाल पूछा है कि क्या गरीबों के पक्ष में बोलना या किसी अन्याय का प्रतिकार करना गलत है. उन्होंने कहा है कि अर्बन नक्सल के नाम पर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को ही परेशान किया जा रहा है. सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा है कि कारपोरेट घरानों को मदद करने और खदानों पर उनका कब्जा दिलाने के लिए सरकार ने अर्बन नक्सली का जुमला उछाल दिया है.

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(लेखक न्यूज विंग के वरिष्ठ संपादक हैं)

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