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महामारियों से निपटने की सरकारों की तैयारी हमेशा निराशा ही बढ़ाती है

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Faisal Anurag

चमकी बुखार के कहर ने सरकारों की बचाव व रोकथाम की तैयारी को बेनकाब कर दिया है. राज्य और केंद्र सरकारें अतीत के अनुभवों को किस सामान्य तरीके से लेती हैं, इसका उदाहरण भर है चमकी बुखार का वर्तमान दौर. देश के कई राज्यों में बीमारियों का महामारी बन जाना नॉर्मल हो गया है. अनुभवों से सीखते हुए यह अहसास सरकारें कराने में कारगर नहीं हैं कि वे बीमारियों की रोकथाम के लिए पहले से कोई तैयारी करती हैं.

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बच्चों के लिए इस तरह की बीमारियां बार-बार कहर बन जा रही हैं. कुछ दिनों के मीडिया आकर्षण के बाद फिर अगली बार के कहर का इंतजार रहता है. इसके लिए राज्यों और केंद्र सरकार की नीतियों के साथ उनकी राजनीतिक इच्छशक्ति भी जबावदेह है.

बिहार सरकार के सोशल ऑडिट रिपोर्ट से यह बात सामने आयी है कि एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिंड्रोम (चमकी बुखार) से पीड़ित ज्यादातर बच्चों के परिवार के सदस्य गरीब हैं. इन परिवारों में लगभग तीन-चौथाई परिवार गरीबी रेखा (बीपीएल) के नीचे आते हैं. यह आंकडा उस राज्य का है, जो पिछले एक दशक से लगभग 11 प्रतिशत की दर से विकास का दावा करता है.

सैकड़ों बच्चों की मौत के बाद भी जिस तरह भारत की स्वास्थ्य नीति को लेकर अगंभीरता का माहौल है, वह हमारी राजनीतिक प्रक्रिया और प्रवृति के स्याह पहलू को ही उजागर करता है. चूंकि गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों की आर्थिक और सामाजिक हालात को लेकर इन दिनों ज्यादा बातें नहीं की जाती हैं.

बावजूद बिहार और झारखंड जैसे राज्यों के लिए यह एक बेहद गंभीर सवाल है और राजनीतिक तौर पर ध्यानाकर्षण की मांग करता है. चूंकि चुनाव को प्रभावित करने में इन तबकों की भूमिका कमजोर हुई है, उनके लिए बनी योजनाओं को लागू करने की अगंभीरता भी साफ-साफ दिखती है.

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2014 से स्वच्छता को एक व्यापक अभियान सरकारी तौर पर बनाने की पहल की गयी है और सरकारों ने इसपर भारी धनराशि खर्च किया है. बावजूद इसके बेहतर हाइजीन की कमी गरीब बस्तियों की हकीकत है. यहां तक शहरों के स्लम भी कितने हाइजीन संवेदन है, इसे लेकर सवाल किए जाते रहे हैं. भारत उन देशों में है, जो जीडीपी को लेकर अनेक दावे करता रहा है. पिछले दिनों इन दावों को चुनौती जिस तरह मोदी सरकार के बड़े पजों से अलग हुए कुछ लोगों ने दी है, उससे जाहिर होता है कि भारत के विकास को लेकर जो दावे किए जा रहे हैं, वह हकीकत के बहुत करीब हैं.

रिजर्व बैंक के उप गर्वनर के पद से कार्यकाल पूरा होने के छह माह पहले ही विमल आचार्य ने इस्तीफा दे दिया है. पिछले दिनों भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर उनकी टिप्पणियों ने सरकार को परेशान किया था. इस तरह के अंतरविरोध गरीबी रेखा के सवाल को और पेचीदा बना देते हैं.

यूपीए सरकार के दौरान गरीबी रेखा तय करने को लेकर जिस तरह के विवाद हुए थे, वह भारत के नागरिकों के सम्मान के लिए बेहद शर्मनाक कहे गए थे. अब भी यह प्रवृति जारी है. सवाल उठता है कि जब भारत का हर चौथा बच्चा कुपोषण का शिकार है, तब चमकी जैसी बीमारियों की गिरफ्त में आने से रोकना कैसे संभव हो सकेगा. बीमारियों से होने वाली मौतों के बाद भी यदि जनमत पूरी तरह सक्रिय नहीं होता है और उसकी संवेदना को चोट नहीं लगती है तो जाहिर है कि यह हालत एक गंभीर बीमारी का लक्षणभर है.

बरसात के साथ चमकी बुखार का असर क्रमशः कम होता जाएगा. लेकिन इसके शिकार हुए बच्चे, जो बच जाते हैं, उनकी मुसीबतें खत्म नहीं होगी. चमकी बुखार के दौरान लोगों के बीच सक्रिय रहे पत्रकार पुष्यमित्र ने सोशल मीडिया में इस बाबत एक पोस्ट किया है. “पुष्यमित्र ने लिखा है : चमकी बुखार की वजह से जो बच्चे मर गये, वे हमारे हिस्से में दुख छोड़कर चले गये. मगर जो बच गये उनमें से कई बच्चों को इस दिमागी बुखार का कहर आगे भी भोगना है.

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एसकेएमसीएच के पेडियाट्रिक्स विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. ब्रजमोहन कहते हैं, जो बच्चे ठीक होकर अस्पताल से जाते हैं, उनमें से कई हमारे पास बार-बार आते हैं. मां बाप कहते हैं , बच्चा सुस्त पड़ गया है, चलने फिरने में दिक्कत होती है, वोमेटिंग की शिकायत रहती है. 2017 में पीएमसीएच के दो डॉक्टरों ने ऐसे 104 बच्चों पर शोध किया और पाया कि जो बच्चे बच गये, उनमें से एक तिहाई को न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर से जूझना पड़ा.

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सिर दर्द, उल्टी, जैसी कई परेशानियों के उनमें लक्षण थे. 2011 से अब तक सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 5000 से अधिक बच्चे इसके शिकार हुए हैं, इनमें से बड़ी संख्या ऐसे बच्चों की हो सकती है, जो इस तरह की परेशानियों से पीड़ित होंगे. इन बच्चों की मदद तो दूर सरकार के पास ऐसे बच्चों की पहचान करने की भी कोई व्यवस्था नहीं है.”

टाइम्स ऑफ इंडिया ने एक रिपोर्ट के आंकड़ों के हवाले से लिखा है कि इस बीमारी से ग्रसित बच्चों के 287 परिवार आर्थिक रूप से कमजोर हैं. इस रिपोर्ट के मुताबिक, इन बच्चों के परिवारों की औसत सालाना आय 53,500 से कुछ ज्यादा है. इस तरह इन परिवारों की प्रति महीने आय लगभग 4,465 रुपये है.

रंगराजन समिति ने साल 2011-12 में बिहार के ग्रामीण इलाकों में उन परिवारों को गरीबी रेखा से नीचे रखा था, जिनकी प्रति व्यक्ति मासिक आय 971 रुपये थी. इस तरह समिति के अनुसार, गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले औसतन पांच सदस्यों वाले परिवार की प्रति महीने की आय साल 2011-12 में 4,855 रुपये थी. अगर इन आठ सालों में वार्षिक मुद्रास्फीति की दर सिर्फ 2 फीसदी भी मानी जाए, तो आज ऐसे परिवारों की आय 5,700 रुपये होनी चाहिए.

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जबकि रिपोर्ट बताती है कि, ऐसे परिवारों में से लगभग 77 फीसदी की आय इससे भी कम है. साथ ही इन परिवारों में ज्यादातर 6-9 सदस्य वाले परिवार हैं. कुछ ही परिवार ऐसे भी हैं, जिनकी सालाना आय 10,000 रुपये है. लगभग 82 फीसदी (235) परिवारों की आय का जरिया मजदूरी है.

रिपोर्ट से इन परिवारों की गरीबी के अन्य मानकों का भी पता चलता है. एक-तिहाई परिवारों के पास राशन कार्ड नहीं है. प्रति छह में से एक परिवार के पास राशन कार्ड होने के बावजूद उन्हें पिछले महीने राशन नहीं मिला था.

287 परिवारों में से 200 परिवारों ने बताया है कि उनका बच्चा बीमार पड़ने से पहले धूप में खेला था और 61 बच्चे ऐसे हैं जिन्होंने बीमार पड़ने से पहली रात को कुछ नहीं खाया था. दो-तिहाई परिवार (191) कच्चे मकान में रहते हैं. इनमें से लगभग 102 को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर मिला है. 87 फीसदी परिवारों को पीने का पानी मिलता है, जबकि 60 फीसदी घरों में शौचालय नहीं है. सरकार ने दावा किया है कि उसने एम्बुलेंस सेवा मुहैया करवाई थी, लेकिन 84 फीसदी परिवारों को इसकी जानकारी ही नहीं थी. बीमार पड़े बच्चों के 64 फीसदी परिवार लीची के बगान के इर्द-गिर्द रहते हैं.

लगभग इतनी ही संख्या में लोगों ने बताया कि जो बच्चे बीमार पड़े थे, उन्होंने लीची खाया था. तीन-चौथाई मामलों में परिजन चमकी बुखार या एइएस के बारे में जानते ही नहीं थे. उन्हें यह भी नहीं मालूम था कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में इसके लिए इलाज भी उपलब्ध है. इतना ही नहीं केवल एक-चौथाई मामलों में बच्चों को इलाज के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में भेजा गया.

कमोवेश झारखंड के आंकड़े भी इससे अलग नहीं हैं. 2017 में जिन 800 बच्चों की मौत इंसेफ्लाइटिस और न्यूमोनिया की वजह से हुई थी. इसके बाद भी बच्चों को स्वस्थ रखने और ऐसी बीमारियों से बचाने के सरकारी उपाय नाकाफी हैं.

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