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यहां हो रही ईको-फ्रेंडली दुर्गा पूजा की तैयारी, दो घंटे के भीतर पानी में घुल जायेगी मूर्ति

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Ranchi: पर्यावरण की समस्या वर्त्‍तमान समय में अंतर्राष्ट्रीय समस्या बन गयी है. पिछले कुछ सालों में देश-दुनिया में बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण के मुद्दे को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुखता से उठाया गया है. प्रदूषण रोकने के लिए सरकार की ओर से भी पहल की जा रही है. वहीं दूसरी ओर इस पहल में सहयोग देने से रांचीवासी भी पीछे नहीं हैं. दुर्गा पूजा करीब है. ऐसे में पंडालों की तैयारियां लगभग पूरी हो चुकी है. शहर के अधिकांश पंडाल जहां कृत्रिम रंगों और प्लास्टर ऑफ पेरिस आदि से मां की प्रतिमा बना रहे हैं, वहीं भारतीय युवक संघ बकरी बाजार की ओर से ईको-फ्रेंडली मूर्ति का निर्माण किया गया है. पूजा के लिए मूर्ति बन कर तैयार है और इसे अब अंतिम रूप देने की तैयारी की जा रही है.


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पिछले छह सालों से बना रहे हैं ईको फ्रेंडली मूर्ति

भारतीय युवक संघ के सह सचिव अमर पोद्दार ने बताया कि संघ की ओर से पिछले छह सालों से ईको फ्रेंडली मूर्ति बनाया जा रहा है. इस वर्ष यहां 22 फीट की मूर्ति बनी है, जिसे बंगाल के कारीगरों ने बनाया है. उन्होंने बताया कि मूर्ति बनाने में 50 कारीगर लगे, जिन्हें तीन माह का समय लगा. उन्होंने बताया कि उत्सव के साथ पर्यावरण को किसी तरह की क्षति न हो, इस कारण से ईको फ्रेंडली मूर्ति बनायी जाती है.

कैसे बनायी जा रही है ईको-फ्रेंडली मूर्ति

मूर्तिकार कुशक ध्वज ने बताते हैं कि उन्हें यह मूर्ति बनाने में तीन माहिने का समय लगा. तीन माह मूर्ति को अलग-अलग कई स्‍टेप में बनाया गया. इसके लिए दूधी, एटेल और पोली मिट्टी का मुख्य रूप से इस्‍तेमाल किया गया. इसके साथ ही गंगा नदी की मिट्टी का भी इस्तेमाल में लाया गया है. मूर्तिकार ने बताया कि सिर्फ मिट्टी का प्रयोग करने के कारण इसमें और भी अधिक समय लगता है. क्योंकि मिट्टी को सूखने में अधिक समय लगता है. बकरी बाजार में जितनी भी मूर्तियां बनी है सबके कपड़े, गहने, मुकूट आदि मिट्टी के ही बने हैं. मूर्तिकारों ने बताया कि हाथ से साड़ी और धोती आदि बनाना काफी कठिन है. अनुभवी मूर्तिकार ही ऐसा करते हैं. जिसमें काफी समय भी लगता है.

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मूर्तिकारों ने बताया कि मूर्ति-निर्माण में जहां कृत्रिम रंगों का प्रयोग किया जाता है. वहीं उन्होने ईको-फ्रेंडली मूर्ति बनाने के लिए वाटर कलर का प्रयोग किया है. जो पानी में आसानी से घुल जाते हैं. इससे जलीय जीव को किसी तरह का नुकसान नहीं होता. कृत्रिम रंगों के समान अलग-अलग रंगों के वेराईटी के लिए मिक्‍स वाटर कलर का इस्‍तेमाल किया गया है. दो घंटे में पानी में घुल जायेगी मूर्ति: यहां बनीं मूर्ति दो घंटे में पानी में घुल जायेगी. जबकि प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी मूर्तियों को घुलने दो-तीन दिन का समय लगता है. साथ ही ईको फ्रेंडली मूर्ति से जलीय जीवों को किसी तरह का नुकसान नहीं होगा, क्योंकि इनमें किसी तरह के रसायन का प्रयोग नहीं होता है.

पर्यावरण संरक्षण को प्रोत्साहन

वर्तमान समय में ईको फ्रेंडली मूर्ति बनाने के कई फायदे है. पर्यावरण संरक्षण में तो ये मददगार है ही साथ ही स्वास्थ्य के दृष्टि से भी ये काफी फायदेमंद है. ईको फ्रेंडली मूर्ति में मकर्री, जिप्सम, कैडमियम, आर्सेनिक आदि रसायनों का प्रयोग नहीं किया जाता, जो पानी में घुलने के बाद उसके एसिड लेवल को बढ़ा देता है. वहीं अगर यह हाथ और त्वचा के संपर्क में आता है तो कई बार रसायन के कारण खुजली, जलन आदि तो होती है साथ ही श्वांस संबधी रोगों की भी संभावना रहती है.

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