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इमरान को झटका, नवाज शरीफ और बिलावल भुट्टो की पार्टी ने मिलाया हाथ

Islamabad: पाकिस्तान की राजनीति दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गई है. पाकिस्तानी अखबार डॉन ने लिखा है कि सोमवार को हुए घटनाक्रम में नवाज शरीफ की पार्टी पीएमएल एन (PML-N) ने बिलावल भुट्टो की पार्टी पीपीपी के साथ हाथ मिला लिया है. नवाज शरीफ की पीएमएल एन को 64 सीटों पर जीत हासिल हुई है, जबकि पीपीपी को 43 सीटों पर जीत मिली है.

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पीपीपी और पीएमएल एन के गठबंधन के बाद क्या हैं आंकड़े

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पीएमएल एन और पीपीपी को मिलाकर 107 सांसद होते हैं. जबकि इमरान खान की पार्टी ने 115 सीटों पर जीत हासिल की है. इमरान खुद पांच सीटों पर चुनाव लड़कर जीते हैं. पाकिस्तान में कोई एक ही सीट से सांसद रह सकता है, बाकि की सीट उसे खाली करनी होती है. इमरान खान को चार सीटें खाली करनी होगी. इसके अलावा इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ के दो नेता तीन-तीन सीटों पर चुनाव जीतकर संसद पहुंचे हैं. सीटें छोड़ने के बाद इमरान की पार्टी 107 सांसद बचते हैं. ऐसे में ये देखना दिलचस्प होगा कि 107 सीट वाला विपक्ष का गठबंधन बहुमत साबित करता है या इतने ही सीट वाली पीटीआई. बहुमत के लिए 137 सांसदों की जरुरत है. दोनों को बहुमत के लिए 30-30 सांसदों का जुगाड़ करना है.

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फजलुर रहमान की पार्टी और निर्दलीय सांसदों की भूमिका महत्वपूर्ण

मौलाना फजलुर रहमान की पार्टी एमएमए (MMA) के पास 12 सीटें हैं. फिलहाल फजलुर रहमान ने चुनाव परिणाम के बहिष्कार की घोषणा की है. लेकिन पीपीपी नेता शेरी रहमान का कहना है कि वे मौलाना साहब से समर्थन की गुजारिश करेंगी.  चुनाव परिणाम के बहिष्कार का मतलब होगा इमरान खान की पीटीआई को वॉक ओवर देना. फजलुर रहमान साहब ऐसा कभी नहीं चाहेंगे.

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फजलुर रहमान ने विपक्षी गठबंधन को समर्थन देने के संकेत दिए

एक बात जो महत्वपूर्ण है वो ये है कि जिस बैठक के बाद फजलुर रहमान ने चुनाव परिणामों के बहिष्कार की घोषणा की उस बैठक में नवाज शरीफ के भाई शहबाज शरीफ और पीपीपी के नेता भी मौजूद थे. फजलुर रहमान ने भी विपक्षी गठबंधन को समर्थन देने के संकेत दिए हैं. अगर फजलुर रहमान ने विपक्षी गठबंधन को समर्थन देने का फैसला किया तो गठबंधन के पास 119 सांसद हो जाएंगे. लेकिन विपक्षी गठबंधन में भी दो नेता ऐसे हैं जिन्हे अपनी एक-एक सीट खाली करनी होगी. इस तरह विपक्ष का कैल्कुलेशन भी 117 का ही बैठता है.

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कैसे होगा बहुमत का जुगाड़ ?

पाकिस्तान के राजनीतिक एक्सपर्ट्स का कहना है कि सरकार तो इमरान खान ही बनाएंगे क्योंकि उनके पीछे सेना की ताकत है. लेकिन विपक्षी गठबंधन होने के कारण उनके लिए सरकार चलाना मुश्किल हो जाएगा. 2002 में भी नवाज शरीफ और बेनजीर भुट्टो की पार्टी ने हाथ मिलाया था. उस वक्त परवेज मुशर्रफ का शासन था और मुशर्रफ ने जफरुल्लाह जमाली को प्रधानमंत्री बनवाया था. जफरुल्लाह जमाली के शासनकाल में एक वर्ष तक सदन का कामकाज बाधित रहा था, और सरकार कोई काम नहीं कर पाई. राजनीतिक जानकार कहते हैं कि इमरान खान के लिए ऐसे में काम करना बेहद मुश्किल भरा हो सकता है.

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