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तीन राज्यों में कांग्रेस की जीत के बाद झारखंड में सत्ता परिवर्तन की अटकलें

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Akshay Kumar Jha

Ranchi: राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को बहुमत और मध्य प्रदेश में कांग्रेस के सबसे बड़ी पार्टी बनने के बाद झारखंड में सत्ता परिवर्तन की अटकलें काफी तेज हो गयी है. हालांकि, बीजेपी का कोई भी नेता इन अटकलों से इत्तेफाक नहीं रखता. लेकिन सरकारी अधिकारियों, कर्मियों और आम लोगों के बीच यह चर्चा आम हो चली है कि झारखंड में आगामी चुनाव के मद्देनजर सत्ता में परिवर्तन हो सकता है.

व्हाट्सएप पर इस तरह के कई मैसेज वायरल हो रहे हैं. राजनीतिक पंडित इस बहस में दो हिस्से में बंटे हुए हैं. एक का कहना है कि बीजेपी चुनाव से पहले ऐसी गलती कभी नहीं कर सकती, क्योंकि ऐसा करने से विपक्ष को बैठे-बिठाए एक तगड़ा मुद्दा चुनाव के लिए मिल जाएगा. वहीं दूसरे हिस्से के राजनीतिक पंडितों का कहना है कि आगामी चुनाव को लेकर ऐसा संभव है. उदाहरण के तौर पर मोदी के गढ़ गुजरात में हुए राजनीतिक उठा-पटक का हवाला दिया जा रहा है.

आदिवासी वोटर को रिझाने की हो सकती है कोशिश

सीएम लाख संताल का दौरा कर लें. लेकिन आदिवासी समाज के बीच सरकार को लेकर जो मैसेज बीते चार साल में गया है, वो किसी से छिपा नहीं है. झारखंड में आदिवासियों का वोट प्रतिशत करीब 27 फीसदी है. किसी भी पार्टी को सत्ता में काबिज करने के लिए यह आंकड़ा काफी होता है. बीते चुनाव में बीजेपी को बहुमत मिलने के बाद पार्टी ने पहली बार एक गैरआदिवासी चेहरा झारखंड को सीएम के तौर पर दिया. इसे एक तरह का परीक्षण माना जा रहा था.

सरकार बनने के बाद सीएनटी और एसपीटी एक्ट को लेकर सरकार ने जो भी संशोधन करने की कोशिश की, उसका आदिवासी समाज ने पुरजोर विरोध किया. विरोध का असर यह हुआ कि बहुमत वाली सरकार को आदिवासी समाज की आवाज के नीचे दबना पड़ा. किसी तरह का कोई संशोधन सरकार चाह कर भी नहीं करवा सकी.

भूमि अधिग्रहण बिल भी पास कराने में राज्य से लेकर केंद्र तक विरोध हुआ.  हालांकि इस बिल को किसी तरह राज्य सरकार ने पास करवा लिया. पत्थलगढ़ी, कोचांग रेप कांड, कैथोलिक गुरुओं की गिरफ्तारी, धर्म परिवर्तन कानून को लागू करते वक्त जिस तरीके से आदिवासी समाज को टारगेट किया गया उसका खामियाजा भी मौजूदा सरकार को भुगतना पड़ सकता है.

कई ऐसी चीजें दो सालों में हुई, जिससे आदिवासी समाज का एक हिस्सा सत्ता से नाराज है. ऐसे में कहा जा रहा है कि आदिवासी समाज के वोट के मद्देनजर कोई बड़ा फैसला लिया जा सकता है.

फिर से आदिवासी चेहरा लाकर मैनेज करने की कोशिश

झारखंड का इतिहास गवाह रहा है कि सीएम का उम्मीदवार आदिवासी होने के बावजूद भी सत्ता स्थिर नहीं रही है. लेकिन सीएम का आदिवासी चेहरा होने के नाते आदिवासी समाज में एक निश्चितता जरूर दिखी है. ऐसे में अगर बीजेपी एक बार फिर से आदिवासी कार्ड खेलती है, तो कई तरह के समीकरण बनते हैं. कहा जा रहा है कि अर्जुन मुंडा, नीलकंठ सिंह मुंडा, समीर उरांव और दिनेश उरांव सरीके नेता को मौका दिया जा सकता है. लेकिन सवाल यह उठता है कि फिर मौजूदा सीएम क्या करेंगे. चर्चाओं की मानें तो माना जा रहा है कि मौजूदा सीएम को केंद्र में किसी महत्वपूर्ण पद से नवाजा जा सकता है या पार्टी में अहम किरदार दिया जा सकता है.

पूर्व सीएम और मंत्री करते रहे विरोध, कई विधायक भी भनभना रहे

मौजूदा सरकार की कई नीतियों को लेकर राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और आदिवासी नेता के तौर पर देखे जाने वाले अर्जुन मुंडा कई बार आलोचना कर चुके हैं. कई बार तो खुलेतौर पर मीडिया में श्री मुंडा ने सरकार की नीतियों के खिलाफ बोला है. मौजूदा खाद्य आपूर्ति और राज्य के दिग्गज माने जाने वाले नेता सरयू राय मुख्यमंत्री के धुर विरोधी माने जाते रहे हैं. कई बार ऐसा हुआ है कि मंत्री ने सीएम के विभाग के खिलाफ ही सीएम को चिट्ठी लिखी है.

सार्वजनिक तौर पर मीडिया के सामने सीएम की नीति की आलोचना की है. नाम ना बताने की शर्त पर राज्य के कुछ विधायक हैं जो खुलेतौर पर सीएम की आलोचना करते हैं. उनकी नीतियों के खिलाफ नहीं बोलने का दर्द बयां करते हैं. लेकिन चाह कर भी कुछ कह नहीं पाते. लेकिन दिल्ली तक लॉबी करने वाले विधायक आला अधिकारियों को सारी बात पहुंचाने का काम जरूर करते हैं.

लाखों वोट को खोने का डर

स्थापना दिवस के दिन जो हुआ और जिस तरह के फैसले उस दौरान सरकार की तरफ से लिए गए. फैसलों के बाद फिर सरकार कैसे बैकफुट पर है. यह सारी चीज कहीं ना कहीं यह बताती है कि सरकार को आगामी चुनाव में वोट का डर सता रहा है. पारा शिक्षक ही नहीं, रसोइया, राजस्व कर्मी, आंगनबाड़ी सेविकाएं, सर्कल इंस्पेक्टर जैसे तमाम अल्प वेतन धारी जिस तरीके से आंदोलनरत है. उससे कहीं ना कहीं बीजेपी के शीर्ष नेता को यह मैसेज जरूर दिया जा रहा होगा कि झारखंड में ऑल इज वेल के मुगालते से निकलने की जरूरत है. अल्प वेतन धारियों को लेकर सरकार के कई मंत्री भी अब खुलकर बोल रहे हैं. विधायक कई मामलों पर मीडिया के जरिए मुखर होने की कोशिश कर रहे हैं. इन सभी चीजों का दबाव सीधेतौर पर सत्ता पर पड़ेगा. और सत्ता पर दबाव राजनीति में सबसे अहम माना जाता है.

गुजरात वाला एजेंडा हो सकता है लागू

2014 में नरेंद्र मोदी के पीएम बनने के बाद गुजरात का जिम्मा आनंदीबेन पटेल के कंधों पर दिया गया. लेकिन पाटीदार समुदाय के आंदोलन से लेकर दलित समुदाय के लोगों के साथ हुए बर्ताव जैसी घटनाओं पर बीजेपी के लिए असहज स्थिति पैदा हो गई थी. पाटीदार समाज गुजरात के लिए झारखंड के आदिवासी समाज की ही तरह के हैं. वहां भी विजय रूपाणी को सीएम इसलिए बनाया गया था ताकि एक साल बाद होने वाले चुनाव में बीजेपी मुंह की ना खाए. वैसे ही हालात आज झारखंड के हैं. सत्ता बचाने के लिए बीजेपी ने अगर झारखंड में सत्ता परिवर्तन किया भी तो, कोई अचरच नहीं होना चाहिए. क्योंकि राजनीति में सत्ता नहीं तो कुछ भी नहीं का एजेंडा आज से ही नहीं बल्कि लोकतंत्र के जन्म से ही लागू है.

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