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झारखंड में पंचायत चुनाव का टलनाः वजह, मायने व परिणाम

खजाना नहीं तो नेता प्रतिपक्ष है बहाना 

सुधीर पाल 

झारखंड में पंचायत चुनाव तय समय पर नहीं होगा. चुनाव कराने के लिए संवैधानिक तौर पर अधिकृत अधिकारी राज्य निर्वाचन आयुक्त का पद खाली है. सरकार कहती फिर रही है कि नेता प्रतिपक्ष नहीं हैं इसलिए राज्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति नहीं हो पा रही है.

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पंचायत प्रतिनिधियों के विरोध के स्वर को थाम लिया गया हैं. पंचायत से लेकर जिला स्तर तक पंचायतों के विकल्प के तौर पर कार्यकारी समितियों का गठन कर दिया गया है. तीनों स्तर पर संबद्ध पंचायत प्रतिनिधयों को इसमें सदस्य बनाया गया है. समिति में मुखिया, प्रमुख और जिला परिषद् अध्यक्ष को सम्बंधित स्तर के समिति के अध्यक्ष की जिम्मेवारी दी गयी है. पंचायत प्रतिनिधियों को सन्देश दिया गया है कि सब कुछ पूर्ववत चलेगा और समिति पंचायत चुनाव होने तक काम करती रहेगी.

 

संवैधानिक संस्थाओं को मजबूत बनाने की जगह समानांतर संस्थाएं खड़ा करना यहां की सरकार का शगल है. पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास सरकार की योजनाओं को सही तरीके से पहुंचाने के दावे के साथ आदिवासी विकास समिति और ग्राम विकास समिति का गठन किया था. उनकी परिकल्पना थी कि गांव के लोग समिति में हैं, इसलिए गड़बड़ी नहीं होगी. कहा गया था कि समिति ही गांव में छोटी-छोटी विकास योजनाओं को तय करेगी. शायद तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुवर दास को किसी ने समझा दिया था कि पंचायतों  के प्रतिनिधि किसी दूसरे ग्रह के हैं, गांवों के नहीं हैं. इसलिए पंचायतों को दरकिनार कर रातोंरात समितियां गठित कर दी गईं थी. हेमंत सोरेन की सरकार ने कोरोना के मद्देनज़र समितियों के गठन को जायज बताया है.

 

जनवरी महीने में करीब-करीब सभी जिलों के त्रिस्तरीय पंचायतों का कार्यकाल समाप्त हो रहा है. नियमानुसार पंचायतों की निरंतरता बनी रहनी चाहिए और कार्यकाल समाप्त होने से पहले नई पंचयातों का गठन हो जाना चाहिए. जैसे विधान सभा या लोक सभाएं नियमित गठित होती रहती हैं. कार्यकाल समाप्त होने के छह महीने के भीतर चुनाव कराने की संवैधानिक बाध्यता तो है ही.

तो क्या वाकई राज्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति नेता प्रतिपक्ष के बिना संभव नहीं है. क्या कोरोना की वजह से पंचायत चुनाव टालना जरूरी है? इसमें दो राय नहीं कि राज्य निर्वाचन आयोग का गठन प्रत्येक राज्य/संघशासित क्षेत्र के निगम, नगरपालिकाओं, ज़िला परिषदों, ज़िला पंचायतों, पंचायत समितियों, ग्राम पंचायतों तथा अन्य स्थानीय निकायों के चुनावों के संचालन के लिये जरूरी है.

 

राज्य निर्वाचन आयोग के गठन का मुख्य उद्देश्य राज्य में स्थानीय निकायों के लिये स्वतंत्र, निष्पक्ष और तटस्थ निर्वाचन कराना है. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243K तथा 243ZA में राज्य निर्वाचन आयोग संबंधी प्रावधान किये गए हैं. राज्य निर्वाचन आयोग का गठन 73वें तथा 74वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992  के तहत किया गया था. राज्य निर्वाचन आयोग भारत के निर्वाचन आयोग से स्वतंत्र इकाई है और राज्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति राज्य के राज्यपाल द्वारा की जाती है. भारत के संविधान के अनुच्छेद 243K के अनुसार पंचायतों के निर्वाचन तथा निर्वाचन नामावली तैयार करने के दौरान अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण के कार्य राज्य निर्वाचन आयोग में निहित होंगे.

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राज्य निर्वाचन आयुक्त को नियुक्त कौन करता है?

अभी जब देश में तालाबंदी थी, 29 मई को आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने एक मामले की सुनवाई करते हुए राज्य सरकार के अध्यादेश को निरस्त कर दिया था. उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार के पास भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243K और 243 ZA के तहत राज्य निर्वाचन आयुक्तों को नियुक्त करने की शक्ति नहीं है. राज्य के निर्वाचन आयुक्तों को नियुक्त करने की शक्ति राज्य के राज्यपाल के पास होती है. आंध्र प्रदेश सरकार इस मामले को सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष लेकर गई और 11 जून, 2020 को सर्वोच्च न्यायालय ने आंध्रप्रदेश उच्च न्यायालय के निर्णय पर रोक लगाने से इनकार कर दिया. आन्ध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस की सरकार और राज्य निर्वाचन आयुक्त रमेश कुमार के बीच काफी समय से विवाद चल रहा था. और कार्यकाल समाप्त होने से पहले ही सरकार ने राज्य निर्वाचन आयुक्त के पद से रमेश कुमार को हटा दिया था. रमेश कुमार ने सरकार के इस फैसले को कोर्ट में चुनौती दी थी.

झारखंड पंचायत राज अधिनियम

झारखंड पंचायत राज अधिनियम,2001 की धारा 66 में स्पष्ट किया गया है कि राज्य निर्वाचन आयोग में एक राज्य निर्वाचन आयुक्त होगा जिसकी नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाएगी. राज्य निर्वाचन आयोग की सिफारिश पर राज्यपाल पंचायतों के गठन की तारीख नियत करता है. वैधानिक स्थिति है कि राज्यपाल मंत्रिमंडल के परामर्श और मंत्रणा से ही यह भूमिका निभाता है. लेकिन भारत निर्वाचन आयोग की तरह राज्य निर्वाचन आयोग चुनाव के संचालन के लिए एकदम स्वतंत्र नही है. राज्य निर्वाचन आयोग में प्रशासनिक पदाधिकारियों की नियुक्ति तथा चुनाव के संचालन के लिए कर्मचारी, सुरक्षा और फंड राज्य सरकार की जिम्मेवारी है. लेकिन राज्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति के लिए नेता प्रतिपक्ष की राय या मंत्रणा का कोई क़ानूनी प्रावधान नहीं है.

विपक्ष चुप, पंचायत प्रतिनिधि खुश

तो नेता प्रतिपक्ष का नहीं होना सरकार के लिए पंचायत चुनाव नहीं कराने का बहाना है. विपक्ष चुप है क्योंकि उसे लग रहा है यह एक मुद्दा बन सकता है. पंचायत प्रतिनिधि ख़ुश हैं क्योंकि उन्हें लग रहा है की छह महीले का कार्यकाल और बढ़ गया है. जिला और ब्लॉक के अधिकारी ख़ुश हैं कि उन्हें पंचायत के हर स्तर पर काम और वित्त का प्रभार मिला हुआ है. यानी ग्रास रूट डेमोक्रेसी के बहाल नहीं किया जाने के फैसले से किसी को कोई परेशानी नही है. सरकार ने कार्यकारी समिति में सबके हितों का ख्याल जो किया है.

राज्य सरकार के लिए परेशानी

राज्य सरकार की मुसीबत है कि वह चाह कर भी चुनाव कराने की स्थिति में नहीं है. राज्य सरकार का खजाना खाली है. सरकार को उम्मीद है कि नए वित्तीय वर्ष में सरकार के खजाने की हालत थोड़ी सुधरेगी. राज्य में पंचायत चुनाव कराने के लिए लगभग ३०० करोड़ रूपए की जरूरत है. इसके साथ-साथ चुनाव की घोषणा होते ही राज्य में आचार संहिता लागू करना पड़ जाएगा. इससे छिटपुट चल रहे विकास कार्यक्रमों को भी थोड़े समय के लिए स्थगित करना पड़ेगा. मालूम हो कि राज्य सरकार बामुश्किल वेतन के अतिरिक्त विकास कार्यों के लिए पैसे जुटा पा रही है. राज्य सरकार को लग रहा है कि छह महीने की संवैधानिक बाध्यता के मद्देनजर चुनाव को टालने में ही भलाई है.

यह बात अलग है कि विकास बनाम डेमोक्रेसी लड़ाई में ‘बड़ी पंचायतें’ हमेशा जरूरी हो जाती है. बिहार इसका नज़ीर है. कोरोना के बावजूद वहां चुनाव हुए और अब बंगाल में इसकी दुन्दभि बज चुकी है. लेकिन कोरोना का ऐसा प्रकोप कि पंचायत चुनाव आन्ध्र प्रदेश में टल जाते हैं और झारखंड में संभव नहीं हो पाता है. पंचायत चुनाव से क्या कुछ बदल जाएगा? राज्य में 2010 और 2015 में हुए पंचायत चुनाव ने 25 हजार से ज्यादा महिलाओं को नेतृत्व का अवसर दिया. अनुसूचित क्षेत्र में आदिवासी स्त्री-पुरुषों को विकास की नई अवधारणा पर काम करने का मौका दिया. सामाजिक न्याय और आर्थिक विकास की योजनाओं में निर्माण से लेकर अनुश्रवण कच्ची-पक्की भूमिका निभा पाने की पहल का साहस दिया.545जिला परिषद सदस्य, 5,423पंचायत समिति सदस्य, 4,402ग्राम पंचायत मुखिया और 54,330ग्राम पंचायत सदस्य सहित कुल 64,700 लोगों द्वारा चुने गए जन प्रतिनिधि थे. ये संवैधानिक दायित्व निभा रहे थे. ये गांव-गांव में सरकार के आंख-कान हैं. कार्यकारी समिति पंचायतों का विकल्प नहीं है. 10 साल में 10000 करोड़ से अधिक राशि केंद्र सरकार से पंचायतों को मिल पायी तो इसलिए कि त्रिस्तरीय व्यवस्था का ढांचा संवैधानिक तौर पर यहां खड़ा था. वर्ष 2015-16 से लेकर वर्ष 2019-20 में 6046 करोड़ 14 वें वित्त आयोग से मिले हैं.जैसे कोरोना के लिए हम रट लगा रहे हैं, जब तक दवाई नहीं तब तक ढिलाई नहीं, उसी प्रकार हमें कहना पड़ेगा कार्यकारी समिति नहीं है ‘गांव की सरकार’.

(लेखक झारखंड के वरिष्ठ पत्रकार हैं और पंचायत राज विषय के जानकार हैं)

 

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