Opinion

मृत्यु के बाद का कर्मकांड

Surya Narayan Chaudhary

हिन्दू समाज में कर्मकांड की बड़ी महिमा है. चाहे-अनचाहे व्यक्ति को जीवन-भर इसका शिकार होना पड़ता है और मौत के बाद वह अपनी संतान को इसके चंगुल में छोड़ जाता है! एक अनन्त सिलसिला चलता रहता है.
माता-पिता की मृत्यु के बाद व्यक्ति का मन श्रद्धावनत होता है और इस क्षण का फायदा उठाकर कर्मकांडी प्रथा उसे एक ऐसे जाल में फंसा देती है, जिसे काटने में वह असमर्थ रहता है. कोई-कोई किसी राजनीतिक दल का सदस्य बनकर या बुद्धिवाद के सहारे इसे काटने का प्रयास करता है, पर कोई-कोई ही.

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मैं यहां उन लोगों की बात नहीं करूंगा, जो ईश्वर और कर्मकांड को एक में जोड़कर देखते हैं. अर्थात् जो दोनों में से एक को छोड़ने का मतलब दूसरे को भूल जाने से लगाते हैं. मैं उन लोगों की बात करना चाहूंगा, जो या तो ईश्वर और कर्मकांड को दो भिन्न वस्तु मानते हैं या फिर ईश्वर या ईश्वर जैसी किसी सत्ता पर माथा-पच्ची करने के बजाय किसी राजनीतिक या सामाजिक दर्शन पर विश्वास कर उसके अनुरूप अपना और अपने समाज का जीवन गढ़ना चाहते हैं.
दुर्भाग्यवश हमारे समाज में ऐसे व्यक्ति बहुत ही कम हुए हैं, जिन्होंने इस दिशा में कथनी और करनी में मेल रखा है.

इस दिशा में लोहिया अप्रतिम थे. 1945 में जेल से छूटने के बाद उन्हें गांधी जी ने कहा कि वह अपने पिता का श्राद्ध करें तो उन्होंने दो टूक उत्तर दिया, ‘मुझे इस पर विश्वास नहीं है.’ अपनी वसीयत में भी लोहिया ने निर्देश दिया था कि उन्हें बिजली से जलाया जाय और कोई कर्मकांड नहीं किया जाये. इस स्पष्ट निर्देश के कारण उनके एकमात्र चचेरे भतीजे और असंख्य श्रद्धालु मित्रों तथा अनुयायियों को किसी प्रकार का धार्मिक बखेड़ा करने की हिम्मत नहीं हुई.

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जवाहरलाल नेहरू यहां भी लोहिया से पिछड़ जाते हैं. अपनी वसीयत में उन्होंने जो रूमानी ताना-बाना बुना उससे कहीं भी परंपरागत कर्मकांड का निषेध नहीं हुआ बल्कि उसमें और कई विधियां जुड़ गयीं. मनों चन्दन की लकड़ी और मनों घी स्वाहा करने के साथ-साथ सारी कर्मकांडी विधियों से उनका शव दाह हुआ और श्राद्ध के लिए प्रयागी पुरोहितों को खासतौर से बुलाया गया. प्रसिद्ध क्रांतिकारी दामोदर विनायक सावरकर ने, जिनका बाद में हिदू राष्ट्रवाद से संबंध हो गया, धर्म-निरपेक्ष’ नेहरू की तुलना में इस दिशा में कही ज्यादा इहलौकिक दृष्टांत पेश किया.

उन्होंने इच्छा प्रकट की कि उनका शव बिजली से ही जलाया जाये . मोहन कुमार मंगलम को माक्सवादी जीवन दर्शन में गहरा विश्वास था. कर्मकांड के प्रति उनके मन में कही भी श्रद्धा नहीं रही होगी. लेकिन उनका श्राद्धकर्म भी काफी बखेड़े के साथ हुआ. जाहिर है कि उन्होंने इस संबंध में कभी बातचीत के प्रसंग में भी अपने परिवार वालों को कोई निर्देश नहीं दिया होगा और न ही उनके विचारों को इस प्रकार ढाला होगा कि वे लोग स्वयं भी इसे निरर्थक समझते. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संचालक गोलवलकर की गिनती लोग एक कट्टर पुरातन पंथी के रूप में करते हैं, परंतु उन्होने अपनी वसीयत मे यह निर्देश दिया था कि मृत्यूपरांत उनका श्राद्ध कर्म नहीं किया जाये (‘मैंने अपना श्राद्ध कर लिया है).

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शायद उनका आशय अपने कर्तव्य पालन को ही अपना श्राद्धकर्म मानने मे रहा हो. अगर वैसा नहीं हो तब भी किसी भी व्यक्ति का अपने जीवनकाल में ही श्राद्धकर्म कर जाना श्रेयस्कर है. कम-से-कम वैसा करने से व्यक्ति अपनी संतान पर अंधविश्वास की विरासत लादने का उत्तरदायी तो नहीं बनता. जयप्रकाश नारायण का द्वंद्वात्मक भौतिकवाद में विश्वास नहीं था. अध्यात्म पर उनकी गहरी श्रद्धा थी. पर वह भी अध्यात्म को कर्मकांड से अलग करके देखते थे .

अपनी पत्नी प्रभावती देवी की मृत्यु पर उन्होंने उनका श्राद्ध कर्म नहीं किया. सिर्फ इस अवसर पर गीता, कुरान, बाइबिल आदि धर्मग्रंथों का पाठ करवाया. मृतात्मा के प्रति श्रद्धा निवेदन करने का यह तरीका निश्चय ही कर्मकांडी तरीके से भिन्न है. समाजवादी नेता प्रणव चटर्जी की इच्छानुसार उनके संबंधियों ने भी उनका श्राद्ध नहीं किया.

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यह तो एक विडंबना है कि नेहरू और वैज्ञानिक समाजवादी कहलाने वाले लोगों का कर्मकाडी संस्कार होता है और सावरकर तथा गोलवलकर जैसे हिंदूवादी माने जान वाले व्यक्ति अपने को विद्युत् शवदाह गृह में जलाने और श्राद्ध न करने का स्पष्ट निर्देश देकर जाते हैं. लोहिया तो खैर अंतिम छोर पर ही थे. हमारे देश में आज क्या यह आवश्यक नहीं है कि बुद्धिवादी लोग जन्म और मरण को उलझाने वाले कर्मकांड को समाप्त करने के लिए आगे बढें.

राजनीतिज्ञों, वैज्ञानिकों और लेखको को अपनी वसीयत में स्पष्ट रूप से इन कर्मकांडों का निषेध करना होगा, तभी उनकी संतान को विरासत में मिलने वाले कर्मकांडों की श्रृंखला से मुक्ति मिल सकेगी अन्यथा यह भ्रमजाल लोगों को युगों तक परेशान करता रहेगा.

(लेखक परिचय : हिन्दी के वरिष्ठ लेखक-पत्रकार एवं पूर्व सदस्य बिहार विधान परिषद्)

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