Opinion

सियासत की बात: टेंपोवाले मंत्री जी और नमाज-नियोजन के बहाने खोई जमीन तलाशते एक्स सीएम

Anand Kumar

बीजेपी के सीनियर विधायक सीपी सिंह बड़बोले हैं, इसमें कोई संदेह नहीं. पत्रकार हो या मंत्री, सबसे उलझते रहना इनकी आदत बन चुकी है. एक और कांग्रेस एमएलए इरफान अंसारी अपनी हरकतों के चलते राजनीतिक विदूषक के रूप में मशहूर हैं. ये दोनों लोग अपने काम से कम और अपनी जुबान की वजह से चर्चा में ज्यादा रहते हैं. अब दो और नेता भी इसी कैटेगरी में आने को बेताब हैं. संयोग कि दोनों जमशेदपुर से आते हैं. एक अभी मंत्री हैं, दूसरे पूर्व सीएम. एक टेंपो चला कर यह जताते हैं कि वह कमजोर वर्ग के हितैषी हैं, लेकिन उन्हीं के स्वास्थ्य विभाग ने 21 सरकारी ईएसआई अस्पतालों से एक साथ 26 डॉक्टरों को हटा दिया. नतीजन ये अस्पताल डॉक्टर विहीन हैं. मजदूर इलाज के बिना परेशान हैं और उनके हितचिंतक बन्ना गुप्ता ऑटो चलाते हुए विधानसभा जाते हैं. ये अलग बात है कि बड़ी गाड़ियों में उनका पूरा लाव लश्कर पीछे-पीछे चलता है. अब उनसे ये कौन पूछे कि अगर उन्हें टेंपो चालकों के सम्मान की इतनी ही चिंता है, तो वे उनके लिए कोई अच्छी सी स्वास्थ्य बीमा योजना ले आते. इलाज की  कोई सरकारी स्कीम ले आते. मगर नहीं, कोरोना काल में जब सारा देश लॉकडाउन था, तब तो भुखमरी के शिकार हो रहे ऑटो चालकों के लिए आपदा प्रबंधन मंत्री के नाते बन्ना जी ने कुछ नहीं किया. उन्हें बुरा तब लगा जब सीपी सिंह ने उन्हें टेंपोवाला कह दिया. दरअसल बन्ना ने खुद को टेंपोवाला कहे जाने से चिढ़कर इसे ऑटो चालकों के सम्मान का मुद्दा बना दिया. वरना उनके शहर जमशेदपुर से लेकर राजधानी रांची तक रोज कोई न कोई ऑटोवाला पुलिस से पिटता है, लोकल गुंडों को हर ट्रिप के लिए पैसे चुकाता है और किसी हुज्जतबाज़ सवारी के हाथों जलील होता है. तब बन्ना गुप्ता उन्हें बचाने नहीं आते. उन्हें टेंपो वालों की इज्जत तब याद आती है, जब सीपी सिंह उन्हें टेंपोवाला कह  देते हैं.

अगर बन्ना सचमुच ऑटोवालों के हितैषी होते तो उन्हें ऑटो ड्राइविंग का स्टंट करने की जरूरत नहीं पड़ती. वे सीपी सिंह के तंज को कॉम्प्लीमेंट के रूप में कबूल करते, लेकिन वे खुद टेम्पो लेकर चल दिये, फोटो खिंचाने और मीडिया में माइलेज लेने. ये अलग बात है कि टेंपो से उतर कर वह वापस अपनी सरकारी फॉर्च्यूनर में सवार हो गये और उनका काफिला सायरन बजाता हुआ सड़क पर चल रहे तमाम टेंपो को साइड कराता हुआ सरपट निकल गया.

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ये तो हुई बन्ना गुप्ता की बात. अब बात करते हैं पूर्व सीएम रघुवर दास की. विधानसभा में स्पीकर ने नमाज पढ़ने के लिए कमरा एलॉट किया. भाजपा ने इसे मुद्दा बनाया. भाजपा को सांप्रदायिक मुद्दे भुनाने में महारत है, यह सभी जानते हैं, लेकिन इसमें रघुवर जी भी कूद पड़े माइलेज लेने. हालांकि इस चक्कर में वह यह भूल गये कि वे पिछली सरकार के पांच साल तक मुख्यमंत्री रह चुके हैं. तब भी राज्य में विधानसभा थी, स्पीकर भी उन्हीं की पार्टी के थे और नमाज के लिए कमरा तब भी था. लेकिन तब शायद सत्ता की खुमारी में यह छोटा सा कमरा उन्हें दिखता नहीं था. रघुवर जी अपने शासन काल में कर्मचारी चयन आयोग की स्नातक स्तरीय परीक्षा नहीं करा पाये. छठी जेपीएससी परीक्षा का मजाक उन्हीं के समय बना. उनकी नियोजन नीति का नतीजा झारखंडी युवा आज तक भोग रहा है. शिक्षक नियुक्त मामल में सोनी कुमारी के केस में कोर्ट का फैसला इसका प्रमाण है, लेकिन दास बाबू को राजनीति करनी है. इसलिए अपने पाप का घड़ा हेमंत सोरेन के सिर पर फोड़ने निकले हैं. दरअसल सत्ता में रहते भाजपा के मंत्री-विधायक तब इतने मस्त-मगन थे कि इन छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देने की न फुरसत थी और न ही जरूरत. लेकिन अब भाजपा विपक्ष में है और इलेक्शन हार कर रघुवर जी भी फुल खलिहर हैं, उन्हें भी थोड़ा मीडिया अटेंशन चाहिए. सो वे भी निकल पड़े नमाज और नियोजन पर धरना देने.

अब ये नेता लोग भले पब्लिक को मूर्ख समझ कर स्टंट करते रहें, लेकिन पब्लिक हकीकत में इतनी मूर्ख होती नहीं है. बात बस इतनी सी है कि नेता पब्लिक को उल्लू बनाने का मजा लेते हैं और पब्लिक नेताओं का मजाक बनाकर मजा लेती है. इसी मजे-मजे में राज भी चलता रहता है और राजनीति भी.

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