Opinion

#AmitShah का बहुदलीय प्रणाली पर हमले से राजनीतिक विवाद

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Faisal Anurag

बहुदलीय प्रणाली पर हमला कर अमित शाह ने राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है. इसके पहले हिंदी को लेकर उन्होंने विवाद खड़ा किया था. हालांकि बाद में उन्हें सफाई देनी पड़ी. इस बार भी राजनीतिक दलों ने अमित शाह पर तीखी प्रतिक्रिया दी है. अमित शाह संसदीय प्रणाली को विफल बता रहे हैं. उनके अनुसार, संविधान निर्माताओं ने इस प्रणाली से जो सपना देखा था, उसे लेकर जनता में उत्साह कम हुआ है और उनमें निराशा है.

यह दीगर बात है कि भारत के संविधान में बहुलदलीय प्रणाली का उल्लेख नहीं है और संविधान लागू होने के बाद जब निर्वाचन की प्रक्रिया और उसके लिए विधान अस्तित्व में आये तो इसे सही माना गया. उन्होंने तो ब्रिटेन को भी दो दलीय प्रणाली का प्रयोग कर बताया. जबकि सच्चाई इसके विपरीत है. ब्रिटेन में बहुदलीयता है.

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पिछले कुछ दशकों से जरूर लेबर पार्टी और कंजरवेटिव पार्टी की सरकारें बन रही हैं, लेकिन उनमें कई बार साझा प्रयोग भी हुए हैं. एक जमाने की मजबूत लिबरल पार्टी जिसने कई पर शासन किया. अब कमजोर है, लेकिन अब भी प्रभावी है. इसके अलावे भी कई छोटे-बड़े दल हैं.

जब कभी भाजपा सरकार बनी है, बहुदललीय प्रणाली को लेकर विवाद खड़ा किया गया है.  आरएसएस की विचारधारा शुरू से ही इस तरह की प्रणाली के खिलाफ तर्क देती रही है. आजादी के तुरंत बाद जरूर भारत में कांग्रेस का वर्चस्व दूसरे दलों को उभरने में बाधा था.

लेकिन बाद में जब कभी किसी एक दल का वर्चस्व हुआ, छोटे दलों को लेकर अनेक तरह के सवाल उठाये जाते रहे हैं. यह सवाल वाजपेयी सरकार के समय भी उठा था. प्रमोद महाजन का वह प्रसिद्ध लोकसभा स्पीच जिसमें छोटे दलों के नेतृत्वकारी होने का मजाक उड़ाया गया था, याद किया जा सकता है.

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2014 के बाद से भाजपा के उभार के बाद तो इस तरह का विमर्श दबे स्वर में होता रहा है. अमित शाह ने आरएसएस विचार की खुली अभिव्यक्ति भी किया है. भाजपा की आंतरिक समझ न केवल संसदीय व्यवस्था की जगह प्रेसिडेंशियल सिस्टम की रही है, बल्कि वह बहुदलीयता के खिलाफ है.

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2019 का लोकसभा चुनाव भी प्रेसिडेंशियल जनमत संग्रह के तौर पर भाजपा ने लड़ा और जबरदस्त वोट शेयर के साथ भारी बहुमत हासिल किया. यह विरोधाभास भी अजीब है. भाजपा एक ओर एनडीए के नाम पर ज्यादातर दलों को मोर्चा भी बनाती है और चुनाव को अध्यक्षीय प्रणाली के तौर पर लड़ती है. छोटे दलों के अस्तित्व को स्वीकार करने के बावजूद उसने उन्हें हाशिए की ताकत ही बना दिया है. हिंदी इलाके में तो उसने जिस तरह का समीकरण साधा है, वह इन दलों के लिए बेहद घातक हैं. उन्हें भी अहसास है कि स्वत तौर पर अब उनका राजनीतिक भविष्य नहीं है. यूपी और बिहार का उदाहरण तो यही बताता है.

अमित शाह बिना कारण कोई विवाद खड़ा नहीं करते और ना ही अपनी विचारधारा से अलग कोई  बात करते हैं. उनकी हड़बड़ी उस सपने को पूरी तरह जमीन पर लाने की है, जिसे आरएसएस 1025 से देख रहा है. अमित शाह यह बिना समय गंवाये तमाम उन एजेंडों पर बात करते हैं, जो उनकी विचारधारा आधारतत्व रहा है.

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अटल बिहार वाजपेयी की सरकार तो वाज्ञस्त में साझा सरकार थी और वे एनडीए के न्यूनतम साझा कार्यक्रम से भी बंधे हुए थे. वे उसका सम्मान भी करते रहे. वे किसी ऐसे सवाल को लेकर सरकार को सक्रिय नहीं दिखाना चाहते थे, जिसपर एनडीए सहमत न हो.  2014 के बाद मोदी के लिए इस तरह की बाध्यता नहीं है.

2014 के चुनाव अभियान के समय ही मोदी ने स्पष्ट कर दिया था कि एनडीए तो रहेगा, लेकिन निर्णय भाजपा की नीतियों के अनुकूल होगा. सरकार में आने के बाद मोदी इसपर टिके रहे. 2019 के जनादेश के बाद तो मोदी और शाह को इस बात की जल्दबाजी है कि संघ का एजेंडा जल्द से जल्द अमल में लाया जाये. 370, तीन तलाक और अब राममंदिर को लेकर मोदी का ताजा बयान यही संकेत देता है.

वाजपेयी सरकार तो संघ एजेंडा को खुलकर अपनाने और अमल में लाने का साहस तो नहीं दिखाया. लेकिन संविधान की समीक्षा के लिए एक आयोग जस्टिस वेंकटचलैया की अध्यक्षता में बनाया था. उसकी रिपोर्ट पर अब चर्चा नहीं होती, लेकिन संविधान की समीक्षा करते हुए संशोधन के अनेक सुझावों का अमित शाह के भाषणों पर असर है.

अमित शाह तो अपने अंदाज तक संविधान सभा की बहसों का उल्लेख कर रहे हैं. वे जानते हैं कि उनके बयान वास्तविकता से अलग हैं. बहुदलीय प्रणाली पर संविधान सभा की बहस का उल्लेख भी इसी का विस्तार है.

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