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लोकसभा चुनाव में निर्णायक होंगे सामाजिक न्याय के राजनीतिक और सामाजिक संदर्भ

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FAISAL ANURAG

सामाजिक न्याय और आर्थिक सवाल लोकसभा चुनाव में बड़े सवाल बन कर उभर रहे हैं. आदिवासी, दलित और पिछड़ों के बीच अपनी पैंठ बनाने के लिए भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच शह और मात का खेल जारी है. सामाजिक न्याय के लिए जाने जाने वाले दल अपने वोट आधार को अपने पक्ष में बनाये रखने के लिए रणनीति को कारगर धार देने की कोशिश कर रहे हैं.

पांच विधान सभाओं के चुनाव परिणामों के बाद इन सभी दलों को यह अहसास हो गया है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में इन तबकों की अहम भूमिका होगी. राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के चुनाव परिणामों ने इन तबकों की निर्णायक ताकत को एकबार फिर रेखांकित किया है. तेलंगाना के चुनाव परिणाम भी किसानों और इन्हीं तबकों के सवालों की निर्णायक भागीदारी का संकेत देता है.

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पिछले साल हुए भारत बंद के दौरान आदिवासियों और दलितों का गुस्सा जिस तरह सामने आया था उस ने राजनीतिक पैराडाइम (पैटर्न) को प्रभावित किया है. इन तबकों का वोट प्रतिशत निर्णायक है. 1990 के बाद से भारत की राजनीति सामाजिक न्याय के इर्दगिर्द ही है.

बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में सामाजिक शक्तियों के उभार के बाद भारतीय जनता पार्टी ने सोशल इंजीनियंरिंग की प्रक्रिया शुरू की थी. 2014 के चुनावों में उसने विभिन्न जाति समूहों को जिस तरह साधा और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की भूख को सहलाने प्रयास किया उस से उसे बेहतर निर्णायक राजनीतिक जीत हासिल करने में मदद मिली.

भाजपा की प्रक्रिया ने सामाजिक न्याय की पहचान वाली राजनीतिक ताकतों को इस चुनाव में एक तरह से सीमित कर दिया या हाशिए पर धकेल दिया. भाजपा के इस प्रयोग ने राजनीतिक तौर पर उसे इन तबकों के बीच एक पहचान दी है.

हिंदी क्षेत्र के तीन राज्यों के विधानसभा के चुनाव परिणाम और उत्तर प्रदेश और बिहार के अनेक उपचुनावों के नतीजों ने इन तबकों में भाजपा से माहभंग को रेखांकित किया है. दूसरी ओर सामाजिक न्याय की पहचान वाले दलों ने इन तबकों के दबाव में नेताओं को बाध्य किया है कि वे एक मोरचे पर आयें.

पिछले पांच सालों में इन तबकों का मोहभंग विभिन्न आंदोलनों के माध्यम से उजागर होता रहा है. भाजपा ने 2014 में जिस राजनीतिक समूहों को अपने मोरचे से जोड़ा था. उसमें कई उससे बाहर आ गए हैं. बावजूद भाजपा कुछ नाराज समूहों को अपने साथ बनाए रखने में कामयाब हुई है. भाजपा टिकट बंटवारे में भी सामाजिक और जाति संतुलन को प्रमुखता दिया है. भाजपा की इस कोशिश का परिणाम क्या होगा, यह तो 23 मई को ही पता चलेगा.

लेकिन इन ताकतों के मोहभंग का प्रमुख कारण प्रतिनिधित्व खास कर नौकरियों में सीमित होने के कारण ही गहराया है. इसके साथ ही जिस तरह इन तबकों के सामाजिक संगठनों के बीच एकता बनी है, उससे भी राजनलीतिक दलों की परेशानी बढी है. आरक्षण और सामाजिक उत्पीड़न के सवालों के साथ रोजगार का सवाल भी इनके मोहभग के प्रमुख कारणों में है.

खास कर रोहित बेमुला प्रकरण और भीमा कोरेगांव की घटनाओं ने इन्हें राजनीतिक तौर पर सजग बनाया है. और इनकी एकजुटता को भी मजबूती प्रदान की है. इसके साथ पिछले साल दलित आदिवासी उत्पीड़न कानून के खिलाफ हुए भारत बंद का संदेश साफ है. इस एक परिघटना ने राजनीतिक तौर पर दलों को हिला कर रख दिया.

क्योंकि भारत बंद बिना किसी बड़े संगठन के भी देश के अनेक हिस्सों में प्रभावी था और इन तबकों ने जिस तरह की भागीदारी की थी उससे ग्रामीण परिवेश में भी इन तबकों के अंतरविरोध कम हुए. पिछड़ों के साथ भी आदिवासी दलित संवाद ने राजनीतिक तौर पर अपने सवालों को गंभीरता ओर प्रभावी तरीके से स्थापित किया.

राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ में इन तबकों की उभरती ताकतों ने अपने राजनीतिक महत्व और भूमिका को सतह पर खडा कर दिया. गरीब सवर्णो को दिये गये दस प्रतिशत आरक्षण को ले कर भी इन तबकों की नारजगी और बढ़ी है.

ऐसे हालात में भाजपा की कोशिश है कि वह 2014 की तरह इन तबकों के बडे हिस्से को अपने पक्ष में करे और उनके मोहभंग को दूर करे. भाजपा अपने टिकट बंटवारें में जिस तरह की सजगता दिखा रही है उससे जाहिर होता है कि उसका फोकस इन तबकों के सवालों को चुनाव तक भावनात्मक सवालों के इर्दगिर्द बनाए रखने के साथ हर जाति समूह को विश्वास दिलाना कि वह प्रतिनिधित्व के सवाल पर संजीदा है.

उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पाटी और समाजवादी पार्टी ने लोकसभा उपचुनावें में यह साबित किया है कि इनके साथ आने से उत्तर प्रदेश एक नये तरह का निर्णायक फैसला कर सकता है. गोरखपुर, इलाहाबाद और कैराना में इनकी एकजुटता ने भाजपा के परंपरागत आधार को दरका दिया. इस गठबंधन में रालोद के सामने होने के बाद  सामाजिक स्तर पर राजनीतिक गणित बेहद दिलचस्प हो गया है. अल्पसंख्यक समूहों की एकजुटता भी मजबूत हुई है.

कांग्रेस सचेत तरीके से अपनी राजनीति को बदलता दिखाई दे रह है. उसने भी इन्हीं समूहों की आकांक्षाओं का प्रतिबिंब बनने का प्रयषस तेज कर दिया है. कांग्रेस आदिवासी और पिछडों को अपने साथ मजबूती से लाने के लिए अपनी चुनावी रणनीति पर कार्य करती दिख रही है.

तीन राज्यों में मुख्य मंत्रियों के चयन में उसने यही दिखाने की कोशिश की है. साथ आदिवासी आकांक्षाओं को और हकों को वह प्रमुखता से उठाने का तेवर दिखा रही है. कांग्रेस ने कई विजन डाक्युमेट तैयार किया है जो उसके चुनाव के साथ सामजिक संतलन की रणनीति में बदलाव का संकेत देता है.

कांग्रेस इन तबकों का कितना समर्थन हासिल कर सकती है यह भी 23 मई को चुनावी नतीजे और वोट प्रतिशत के बंटवारें से ही सामने आयेगा.

 

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