न्यूज़ विंग
कल का इंतज़ार क्यों, आज की खबर अभी पढ़ें

पुलिस प्रशासन अपनी जिम्मेदारी समझे और जवाबदेही सुनिश्चत करे : मोनिका

66

Hazaribagh :  सड़क किनारे, झाड़ियों में कार्टन में मिले मृत बच्चों के शव किन परिस्थितियों में छोड़े गये हैं, उन्हें जीवितावस्था में छोड़ा गया या मृत्यु के बाद, यह जानना अत्यंत जरूरी है और यह भी जानना जरूरी है कि कहीं शिशु की हत्या करने के बाद तो शव को छोड़ा नहीं गया. इसके कारणों की तह तक जाना अत्यंत आवश्यक है और यह तभी संभव हो सकता है, जब इसमें पुलिस प्रशासन अपनी जिम्मेदारी समझे और जवाबदेही सुनिश्चित करते हुए हर मामले की उपयुक्त धाराओं में एफआईआर दर्ज करे. उक्त बातें पालोना मुहिम चलानेवाली संस्था आश्रयणी फाउंडेशन की संस्थापक मोनिका गुंजन आर्य ने कहीं. मोनिका आर्य गुरुवार को हजारीबाग स्थित पुलिस एकेडमी में प्रशिक्षु डीएसपी और सब-इंस्पेक्टर्स को संबोधित कर रही थीं. इस मौके पर 20 से ज्यादा प्रशिक्षु डीएसपी और 450 सब-इंस्पेक्टर महिला-पुरुष उपस्थित थे.

झारखंड में विकराल रूप लेती जा रही है यह समस्या

मोनिका आर्य ने कहा कि झारखंड में यह समस्या विकराल रूप लेती जा रही है. इस अपराध की गंभीरता को बताते हुए उन्होंने देश के अनेक हिस्सों में हुई ऐसी घटनाओं की अनेक वीडियो फुटेज एवं तस्वीरें भी दिखायीं और बताया कि किस प्रकार पुलिस की सजगता से कुछ मामलों में दोषियों तक पहुंचा जा सका और कैसे इसकी कमी के कारण पर्याप्त साक्ष्य होने के बाद भी किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सका. घटनाओं में संदेह होने के बाद भी यह नहीं जाना जा सका कि बच्चों की हत्या हुई है या मामला कुछ और है. मोनिका आर्य ने उपस्थित प्रशिक्षु पुलिस अधिकारियों को इस प्रकार की घटनाओं में कानून क्या कहता है, कौन सी धाराएं लगती हैं, पुलिस की क्या जिम्मेदारी-जवाबदेही होती है, इस बारे में विस्तारपूर्वक बताया.

चार सालों का डेटा और एनसीआरबी से उसकी तुलनात्मक विवेचना भी की गयी

आश्रयणी फाउंडेशन और इसकी मुहिम पालोना के बारे में मोनिका ने बताया कि यह एकमात्र संगठन व अभियान है, जो इस मुद्दे पर सक्रिय है और इस अपराध पर रोक लगाने और नवजातों के जीवन को बचाने के लिए प्रयासरत है. सेंसेटाइजेशन, सेंसिटिव जर्नलिज्म, रिसर्च, एडवोकेसी और अवेयरनेस के माध्यम से लगातार इसे उठा रहा है. कार्यक्रम के दौरान मोनिका आर्य द्वारा बीते चार सालों का डेटा और नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) से उसकी तुलनात्मक विवेचना भी प्रस्तुत की गयी. इस रिपोर्ट में यह बताया गया कि उक्त समय-सीमा के अंदर झारखंड में कितने बच्चों के शव मिले हैं और कितने नवजात जिंदा मिले हैं. कार्यक्रम के दौरान झारखंड में लग रहे क्रेडल्स की भी जानकारी दी गयी और एक बच्चे के मिलने के बाद पुलिस को त्वरित गति से क्या-क्या करना चाहिए, यह भी बताया गया. जैसे- बच्चे को सबसे पहले फर्स्ट एड, इलाज दिलवाना, फिर सीडब्लयूसी को सूचित करना और एफआईआर दर्ज करना, मृत शिशु का पोस्टमॉर्टम करवाना,  उसके अंतिम संस्कार की व्यवस्था, क्षेत्र की गैर सरकारी संस्थाओं की मदद उपलब्ध करवाना.

झारखंड पुलिस पूरी संवेदनशीलता से करेगी काम

ट्रेनिंग सेशन को डीएसपी राजकुमार मेहता ने भी संबोधित किया और विश्वास दिलवाया कि नवजात शिशुओं के मामले में झारखंड पुलिस पूरी संवेदनशीलता से काम करेगी और देश के सामने नयी इबारत पेश करेगी कार्यक्रम में पुलिस विभाग की ओर से डीएसपी अजय कुमार झा, डीएसपी रतिभान सिंह, डीएसपी नवीन चंद्र दास, डीएसपी केदार नाथ व पालोना की ओर से प्रोजेश दास व अमित कुमार भी मौजूद थे.

इसे भी पढ़ें- विकास योजना का हाल : गरीब विधवा मुन्नी देवी और उनके बच्चों को एक साल से नसीब नहीं हुई है दाल

हमें सपोर्ट करें, ताकि हम करते रहें स्वतंत्र और जनपक्षधर पत्रकारिता...

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

Comments are closed.

%d bloggers like this: