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प्रवीण परिमल की कविता – महुआ बीनती लड़कियां

वरवर राव को समर्पित गजल

महुआ बीनती लड़कियां

Pravin Parimal

 

हर साल की तरह

इस साल भी टपक रहे हैं महुए!

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एक अजीब-सी गंध फैली है चारो ओर

 

सुबह-सुबह,

अब दिखाई देंगी

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महुए बीनती हुई लड़कियां…

कच्ची उम्र की !

 

मैं सोचता हूं

महुए बीनती हुई लड़कियां

लड़कियां होती हैं

या मजबूरी की कहानियां !

 

याद आते हैं मुझे

महुए बीनती हुई लड़कियों के समूह !

 

चुन-चुन कर महुए

पूरी लगन के साथ

करती हैं इकट्ठा लड़कियां ,

मानो महुओं की शक्ल में बिखरे पड़े हों उनके सपने !

 

सचमुच ,

महुए बीनती हुई लड़कियां

महज महुए नहीं बीनतीं…

बीनती हैं,

भविष्य के लिए सपने भी ।

 

टपक रहे हैं महुए,

बीनती जा रही हैं लड़कियां !

महुओं का ढेर क्रमशः बड़ा होता जा रहा है।

महुए बीनती हुई लड़कियां जानती हैं,

इसी ढेर से निकलेगा

कटोरी भर बासी भात

कुछ सूखी रोटियां

चुटकी भर नमक

और पेट भर पानी!

कि ढेर जितना ऊँचा और बड़ा हो

उतना ही अच्छा है इनके लिए ।

 

कहां- कहां पहुँचते हैं,

उनके बीने महुए

क्या-क्या होता है महुओं के साथ,

महुए बीनती हुई लड़कियों को

कुछ भी पता नहीं !

 

महुए बीनती हुई लड़कियां जानती हैं तो सिर्फ इतना कि महुए से बनती हैं रोटियां

जिससे भरते हैं पेट

दुधमुंहें भाई- बहनों के लाचार मांओं के

वृद्ध पिताओं के!

 

दिहाड़ी में मिले हुए महुए बेचती हैं लड़कियां ,

बनिए की दुकान पर

लाती हैं, बदले में गुड़ और नमक

थोड़ी चाय की पत्ती भी !

 

डंडी मारकर इतराता है बनिया

लेने में किलो का तीन पाव

और देने में तीन पाव का सेर !

 

महुए जाते हैं साहूकार के गोदामों में

करते हैं इंतजार सही वक्त का

और कमाते हैं एक का कितना …

साहूकार के लिए ,

महुए बीनती हुई लड़कियां नहीं जानतीं!

 

मुनाफ़े की रकम

तिजोरी-बंद करते हुए

एक पल के लिए भी

नहीं याद करता है साहूकार

महुए बीनती हुईं

इन लड़कियों को।

 

महुए बीनती हुई लड़कियां

महुए की ही तरह

किस दिन टपक जाएँगी

बाबूसाहेब के दिमाग में,

लड़कियां नहीं जानती!

 

लड़कियां , फिर भी बीनती हैं महुए।

 

महुए से चुआयी जाती है दारू

जिसे पीते हुए

नहीं पहचान पाते बाबू

साहेब

या उनका हितैषी दारोगा

या उनका रिश्तेदार मंत्री

कि उसमें महुए का रस कितना है

और लड़कियों के जीवन का रस कितना !?

 

लड़कियां जानती हैं, जानवर आजकल दोपाये हो गए हैं ।

 

दारोगा आज फिर शिकार पर आया है !

 

बाबू साहेब की हवेली पर ठहरा है दारोगा

दारोगा, अक्सर हवेली पर ही ठहरता है !

 

पैग- दर- पैग रंगीन होती है रात

भेड़ियों के मुंह से टपकता है लार

मुर्ग-मुसल्लम और ‘अंग्रेजी’ तो बहुत हुई

अब ‘देसी डिश’ की बारी है ।

 

जंगल में छूटते हैं

बाबू साहेब के पालतू शेर !

 

कच्ची उम्र की हिरणियां

दहशत से दुबकी हैं !

 

दारोगा हवेली में बैठे- बैठे ही

शिकार करता है

उसके शिकार करने का यही ढंग है ।

 

दरअसल , दारोगा सियार होता है

और सियार कभी खुद शिकार नहीं करता !

 

महुए बीनती हुई लड़कियों पर शामत आई है !

 

बाबू साहेब का बैठकखाना

जंगल में बदल चुका है।

 

दीवारों पर टंगी

लकड़ी की कृत्रिम गर्दन में ठुँकी

बारहसिंघों के सीगों  में तनाव व्याप्त है!

 

दीवारों पर टंगी हुई खाल से निकलकर

बिस्तर पर आ गए हैं चीते ! आंखों में विचित्र- सी चमक लिए हुए ।

 

अजगर की देह ,

कुछ लपेटकर

उसे मरोड़ने को आतुर है ।

 

जंगली सुअर

दाँत पजा रहे हैं !

 

महुए बीनने वाली लड़कियां भयभीत हैं–

कि किसी भी वक्त

वे बनाई जा सकती हैं

नीचे की जमीन

जिस पर

पेड़ बनकर खड़े हो जाएँगे बाबू साहेब

या उनका कोई मेहमान

और टपकते रहेंगे महुए–

टप्- टप्  …

रात भर !

 

बाबू साहेब के बैठकखाने से

मुस्कुराते हुए जाते हैं भेड़िए

गुर्राते हुए निकलते हैं सुअर

दहाड़ते हुए भागते हैं चीते

और कराहती हुई जाती हैं हिरणियां !

 

और ऐसे ही एक दिन

महुए बीनने वाली लड़कियां

बनती हैं अखबारों की सुर्खियां

खुश होते हैं पत्रकार और फोटोग्राफर

लहराता रहता है तिरंगा संसद भवन पर

गर्म होती हैं चर्चाएँ !

 

भुने हुए काजू की तरह

दिनभर कुतरते हैं विपक्ष के लोग

लड़कियों के सवाल को

और महुओं के मौसम की ही तरह

बीत जाता है एक पूरा सत्र !

 

मुआवज़े की रकम का

एलान करते हैं मुख्यमंत्री

खुश होते हैं बिचौलिये !

 

 

महुए बीनती हुई लड़कियां परेशान हैं ।

 

जब महुओं का वक्त बीत जाएगा–

लहलहायेंगे पलाश

खूब-खूब उगलेंगे अंगारे

और पूरा का पूरा जंगल शोलों में नहा जाएगा!

 

हां, देखो—

अब पलाश फूलने लगे हैं !

 

महुए बीनती हुई लड़कियां–

महुओं में छिपाकर

अब पत्थर भी बीनने लगी हैं !

 कवि वरवर राव को समर्पित-

 

 

 

तारी ख़ौफ़ अगर है , राव !

उनको तुमसे डर है , राव !

 

तुम पर ये इल्ज़ाम लगा ,

ज़हरीला ख़ंज़र है राव ।

 

हाकिम की नज़रों में भी

दहशत का दफ़्तर है राव ।

 

कुचले गए इरादों का

संगी है, रहबर है राव ।

 

अरी हुकूमत ! मान भी ले ,

लोहा है , पत्थर है राव ।

 

उनको पता नहीं शायद ,

शेर एक बब्बर है राव ।

 

पिंजरे में है बाघ अगर ,

मत समझो कमतर है राव ।

 

रहा न केवल ‘भीमा’ का ,

चर्चा में घर- घर है राव ।

 

साथी ! मत घबराना तू ,

सँग तेरे लश्कर है , राव !

 

जुल्मी सारे जान लें अब,

‘परिमल’ के अंदर है राव।

 

 

 

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6 Comments

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