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कुमार अम्बुज की कविता –  सरकारी मौत अंधविश्‍वास है

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हिंदी के महत्वपूर्ण कवि कुमार अम्बुज की एक कविता प्रस्तुत है. ये कविता हमारे वर्तमान को परिभाषित संबोधित है. ये हर उस काल से आंखें मिलाती है, जब कवियों से कहा जाता है कि कुछ तो है तुम्हारे साथ गड़बड़. तुम सत्ता और व्यवस्था के लिए डाउटफुल हो.  जब ठंडी मौतें बहुमत के सुनसान में घटित होने लगती हैं. निराशा इतनी ज्यादा है कि अब उसी से कुछ उम्मीद भी है. कुमार अम्बुज कथ्य को उसकी संभव ऊंचाई तक ले जाते हैं और वह अपने शिल्प से कहीं गिरता नहीं है. एक विस्फोट की तरह खुलता है और वहां ले जाता है. जहां हम जाने से बचते हैं. यह कवि का प्रतिपक्ष है जो हमेशा इसी तरह जलता है, हर अंधेरे में कभी मशाल की तरह कभी आंखों की तरह. 

सरकारी मौत अंधविश्‍वास है

कहते हैं उसे आज तक किसी ने ठीक से देखा नहीं

लेकिन वायरस की तरह वह हर जगह हो सकती है

धूल में, हवा, पानी, आकाश में,

सड़कों पर, घरों में, दफ्तरों, मैदानों, विद्यालयों में,

ज्योंही प्रतिरोधक-क्षमता कम होती है वह दबोच लेती है

कोई भागता है तो पीछे से गोली लग जाती है

खड़ा रहता है तो सामने माथे पर हो जाता है सूराख

 

तब आता है सरकारी बयान

कोई मरा नहीं है सिर्फ कुछ लोग लापता हैं

फिर इन लापताओं की खोज में मरने लगते हैं तमाम लोग

कचहरी में, सचिवालय, थाने और अस्‍पताल के बरामदों में

खेत-खलिहानों, चौपालों, क़ैदखानों में, कतारों में, भीड़ में,

शेष सारे बहुमत की ख़ुशियों के वसंत में

झरते हुए पत्तों के साथ झरते हैं

हवाएं उन्हें अंतरिक्ष में उड़ा ले जाती हैं

 

आरटीआई से भी किसी मौत का पता नहीं चलता

न्‍यायिक जाँच में भी समिति को कुछ पता नहीं चलता

लोग इस तरह मरने लगते हैं कि उन्हें खुद पता नहीं चलता

एक दिन लोगों को अपने लोग पहचानने से इनकार कर देते हैं

जैसे लावारिस लाशों को पहचानने से इनकार करते हैं

मरे हुए आदमियों का कोई घर नहीं होता

उन्‍हें खदेड़ दिया जाता है फुटपाथों से भी

उनसे हर कोई हर जगह सिर्फ़ कागज़ मांगता है

पत्नी, बच्चे, पड़ोसी सब कहते हैं कागज़ लाओ, कागज़ लाओ

सरकार भी दिलासा देती है तुम जिंदा हो, बस, कागज़ लाओ

काम-धाम, खाना-पीना, हंसना-बोलना छोड़कर वे खोजते हैं कागज़

 

लेकिन उनकी दुनिया में वह कागज़ कहीं नहीं मिलता

थक-हारकर उन्‍हें यकीन हो जाता है वे सपरिवार मर चुके हैं

फिर वे खुद कहने लगते हैं हम तो सदियों से मरे हुए हैं,

हम गर्भ में ही मर गये थे, हमारे पास कोई कागज़ नहीं था

हम नै‍सर्गिक मृतक हैं, हमारे पास कोई कागज़ नहीं है

हमारे पितामह धरती पर कागज़ आने के पहले से रहने आ गये थे

और वे तो कब के दिवंगत हुए कोई कागज़ छोड़कर नहीं गये

सरकार कहती है हम कभी किसी को नहीं मारते

 

भला हम क्‍यों मारेंगे लेकिन लोगों को

लोगों के द्वारा लोगों के लिए बनाए गये

कानून का पालन करना चाहिए, हम केवल पालनहारे हैं

 

खुद सरकार ने कहा है सरकार कभी किसी को नहीं मारती

सरकारी मौत एक अंधविश्‍वास है, सब अपनी ही मौत मरते हैं

अखबार और टीवी चैनल दिन-रात इसीकी याद दिलाते हैं.

 

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