LITERATURE

नोबेल में नौ साल के बाद हुई कविता की वापसी

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Manglesh Dabral

 

साहित्य के नोबेल पुरस्कार में नौ साल बाद कविता की वापसी हुई है और साल 2020 के नोबेल के लिए अमेरिकी कवि लुइस ग्लिक को चुना गया है. साल 2011 में स्वीडन के कवि तोमास ट्रांसत्रोमर को उस समय नोबेल दिया गया था, जब वे लकवा से पीड़ित थे.

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कविता की वापसी

 

इन दोनों के बीच  2016 में गीतकार-गायक बॉब डिलन को उनके गीतों की ‘काव्यात्मक विशेषताओं’ के लिए भी यह पुरस्कार मिला, लेकिन उस पर यह विवाद हुआ कि बॉब डिलन विश्व भर में विख्यात गीत-लेखक और गायक हैं. लेकिन पारंपरिक अर्थ में कवि कहना मुश्किल है और उनके गीत गंभीर साहित्य का हिस्सा नहीं माने जाते, उनकी रचनाएँ लोकप्रिय और जन-क्षेत्र (पब्लिक स्फीयर) में सक्रिय रहती हैं. दिलचस्प यह है कि बॉब डिलन उस सम्मान को लेने स्टॉकहोम भी नहीं गए, जिसे पाने के लिए बहुत से लेखक जीवन-भर इंतज़ार करते हैं.

 

संयोग से लुइस ग्लिक कविता के लिए नोबेल पाने वाली पहली अमेरिकी महिला भी हैं. इससे पहले 1993 में अश्वेत लेखिका टोनी मॉरिसन को उपन्यास के लिए नोबेल मिला था. इस तरह यह पुरस्कार 27 वर्ष बाद अमेरिका लौटा है, जहाँ उसकी पुरस्कार समिति पर यूरोप-केन्द्रित होने और अमेरिका और एशियाई के देशों के साहित्य की उपेक्षा करने के आरोप भी लगते रहे हैं.

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उपन्यास का बोलबाला?

 

पिछले दो दशकों को देखें तो यह पुरस्कार 21  वर्ष में 19 कथा-लेखकों और सिर्फ़ 2 (बॉब डिलन को जोड़ा जाए तो 3) कवियों के हिस्से में आया है और यह धारणा भी बन गयी थी कि दुनिया में अब उपन्यास का ही बोलबाला है और कविता कहीं हाशिये पर चली गयी है, इसलिए नोबेल पुरस्कार समिति भी उसकी लगातार अनदेखा कर रही है.

 

बॉब डिलन के चयन के बाद यह भी कहा गया कि कविता के संदर्भ में नोबेल समिति के पैमाने हलके और ‘लोकप्रियतावादी’ हो गये हैं. पोलैंड की विस्वावा शिम्बोर्स्का शायद आख़िरी महान कवि थीं, जो सन 1996 में इस पुरस्कार से सम्मानित हुई थीं.

 

काव्यात्मक स्वर

 

लुइस ग्लिक को उनके ‘अचूक काव्यात्मक स्वर, सौन्दर्य के संयम और व्यक्तिगत अस्तित्व का एक सार्वभौमिक रूपांतरण’ करने के लिए नोबेल दिया गया है. सन 1943 में न्यूयॉर्क में जन्मी लुइस के 12 कविता संग्रह और कविता पर केन्द्रित गद्य की कुछ पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं और वे इन दिनों येल विश्वविद्यालय में कविता की प्रोफेसर हैं.

अवसाद की कविता

 

बचपन में वे एनारेक्सिया नर्वोसा नामक बीमारी से पीड़ित थीं जिसमें व्यक्ति को वज़न बढ़ने, मोटापा आने और मृत्यु से डर लगता है और भोजन से अरुचि हो जाती है. इस रोग ने लुइस को गहरे अवसाद और अकेलेपन से ग्रस्त कर दिया जिससे निजात पाने में उन्हें कई साल लगे और उनकी पढ़ाई में भी बाधा आती रही.

 

बचपन का यह अवसाद उनकी कविताओं के भीतर अब भी अंतर्धारा की तरह बहता है. एक कविता में उन्होंने कहा है कि ‘हम दुनिया को सिर्फ़ एक बार देखते हैं, बचपन में. बाकी सब सिर्फ़ स्मृति है.’

 

ग्रीक मिथकों का प्रयोग

 

लुइस ग्लिक की कविता का कथ्य मुखर रूप से सामाजिक नहीं, बल्कि व्यक्तिगत है और उसमें समाज की उतनी ही छवियाँ हैं, जितनी उनके अपने अनुभवों से छनकर आती हैं. बचपन, घर-परिवार, माता-पिता, प्रकृति के दृश्य और इतिहास और मिथक उनकी कविता के आधार भूमियाँ हैं. ग्रीक मिथक भी उनकी कविता का बड़ा स्रोत रहे हैं और वे अपने निजी जीवन के अलगाव को उन मिथकों के महिला चरित्रों के माध्यम से रेखांकित करती रही हैं.

 

कुछ साल पहले उन्हें अमेरिका का पोएट लॉरिएट बनाया गया तो एक बातचीत में उन्होंने कहा था,     ‘मेरा व्यक्तित्व काफ़ी निजी क़िस्म का है और सार्वजनिक जीवन में मेरी बहुत कम रुचि है. इसलिए मुझे लगता था कि उन्हें मेरा ख़याल तो नहीं आयेगा.’

 

लुईस ग्लिक बहुत कम चर्चा में रहीं

 

ग्लिक की कविता अमेरिका से बाहर बहुत कम चर्चा में रही है. इस तथ्य का उल्लेख नोबेल पुरस्कार समिति ने भी अपनी प्रशस्ति में किया है. लेकिन अमेरिकी पाठकों के बीच वे काफ़ी चर्चित हैं और अमेरिका में साहित्य का ऐसा कोई बड़ा पुरस्कार नहीं है जो उन्हें न मिला हो. पुलित्ज़र प्राइज़, नेशनल बुक अवार्ड, बोलिंगन प्राइज़ आदि मिलने के बाद वे साल 2003 से 2004 तक अमेरिका की पोएट लॉरिएट भी रहीं.

पीड़ा से भरी कविता

 

कुछ साल पहले जब उनका महत्वपूर्ण संग्रह ‘अरारात’ प्रकाशित हुआ तो ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने उसकी समीक्षा करते हुए लिखा था कि ‘यह पिछले पच्चीस वर्षों में अमेरिकी कविता का सबसे कठोर और पीड़ा से भरा हुआ संग्रह है.’ ग्लिक के अन्य महत्वपूर्ण संग्रह हैः ‘मीडोलैंड्स’, ‘द सेवन एजेज़’, ‘अवेर्नो’, ‘अ विलेज़ लाइफ़’, ‘द हॉऊज़ ऑन मार्शलैंड’ और ‘द इरिस’.

 

उदासी, हताशा, पीड़ा और निर्वासन के बिंबों और दृश्यों के बावजूद लुइस ग्लिक की कविता पाठक को अवसादग्रस्त नहीं करती, बल्कि अनुभव के नये झरोखे खोलती है. उसमें अवसाद का उत्सव नहीं है, बल्कि उससे मुक्त होने और मनुष्य बने रहने के अनुभवों के विविध आयाम चित्रित हुए हैं.

ग्लिक की कविता को आलोचना का सामना भी करना पड़ा है और कुछ अमेरिकी आलोचकों की राय में उनकी कविता समकालीन संकटों की भाषा में कम बात करती है और बिंबों में नयेपन का भी कुछ अभाव है.

 

शायद इसी आलोचना के संदर्भ में लुइस ग्लिक ने नोबेल पुरस्कार की घोषणा होने के बाद कहा कि ‘यह ख़बर मेरे लिए आश्चर्य की तरह थी और मुझे पहला ख़याल यह आया कि अब मेरे बहुत कम दोस्त रह जायेंगे, जबकि साहित्यिक मित्रों के अलावा मेरी और कोई दुनिया नहीं है.’ बहरहाल, नोबेल के बाद अब लगता है कि अमेरिका से बाहर लुइस ग्लिक की कविता के पाठकों की संख्या में काफ़ी बढ़ोतरी होगी.

लुइस ग्लिक की एक कविता

एक फंतासी

 

मैं आपको कुछ बताती हूं: हर दिन

लोग मर रहे हैं. और यह सिर्फ शुरुआत है.

हर दिन अंत्येष्टि-स्थलों में नयी विधवाएं जन्म लेती हैं,

नयी-नयी अनाथ. वे दोनों हाथ बांध कर बैठती हैं,

नये जीवन के बारे में कुछ तय करने की सोचती हुईं.

फिर वे कब्रिस्तान जाती हैं,  कुछ तो

पहली बार. उन्हें रोने से डर लगता है,

कभी रुलाई न आने से. फिर कोई उनकी तरफ झुकता है

उन्हें बताता है कि आगे क्या करना है, जिसका मतलब हो सकता है

कुछ शब्द कहना, कभी

खुली हुई कब्र में मिट्टी डालना.

और उसके बाद सभी घर लौटते हैं,

जो अचानक मातमपुर्सी वालों से भर गया है.

विधवा सोफे पर बैठती है, एकदम धीर-गंभीर,

लोग एक-एक कर उससे मिलने के लिए आगे आते हैं,

कभी उसका हाथ थामते हैं, कभी गले लगाते हैं,

उसके पास कहने के लिए हमेशा कुछ न कुछ होता है,

वह उन्हें शुक्रिया कहती है, आने के लिए शुक्रिया.

मन ही मन वह चाहती है कि वे चले जायें.

वह कब्रिस्तान में लौटना चाहती है,

बीमारी वाले कमरे में, अस्पताल में. वह जानती है

कि यह संभव नहीं है. लेकिन वही उसकी अकेली उम्मीद है,

पीछे लौटने की इच्छा. बस थोडा सा पीछे,

बहुत पीछे विवाह और  पहले चुंबन तक नहीं.

 

 

मंगलेश डबराल मशहूर साहित्यकार हैं और समकालीन हिन्दी कवियों में सबसे चर्चित नामों में से एक हैं. उनका यह आलेख ‘सत्यहिन्दी’ से लिया गया है. जिसका लिंक नीचे है-

https://www.satyahindi.com/literature/with-louise-glick-nobel-prize-for-literature-poetry-returns-113893.html

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