LITERATURE

निधि नित्या की कविता – एक बाजार ऐसा भी हो

एक बाजार ऐसा भी हो

 

 

Nidhi Nitya

 

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एक बाजार जहां बेची जाएं

बेचैन नींदों की प्रताड़ना

रूठे प्रेम को मनाने के नुस्खे

प्रथम विरह का रुदन

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छोड़े जाने का संताप

अनचाहे आलिंगन के तीव्र स्पंदन

आंसुओं का खारापन

प्रेमपगे कड़वे उलाहने

अवसाद को निगल जाने की दवा

प्रतीक्षा को सरल बनाने की तकनीक

क्रोध के रसपान की व्यजंन विधि

नीरस भावों को उत्पादक बनाने की खाद

बंजर कोख में बो देने वाले बीज

गीले मन को सुखाने के प्रबंध

एक बाज़ार हो जिसमें बेचे जाएं

सारे कड़वे , कसैले स्वाद

जीवन में बचेखुचे स्वप्न की रिक्तता

कलुषित मन

तमाम निकृष्ट भाव

उदासीन संबंध

भयमुक्त धर्मग्रंथ

एक बाज़ार हो जहां पुकार कर

बुलाये जाएं

डाकिए , हरवाहे , संदेशवाहक

जो शिशु की निष्पाप मुस्कान के बदले

बेच दें ईश्वर को समस्त सामग्री

उसी की श्रापित थैलियाँ में धरकर….

कदाचित

नग्न आत्मा का

बाज़ार की सामग्री ले जाना निषेध है

लगा दिए जाएं बाज़ार में ताले

लिखा जाए तख्तियों पर

सामग्री आउट ऑफ स्टॉक

ईश्वर असंगतियों का

सर्वश्रेष्ठ क्रेता है

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