LITERATURE

बांग्ला देश के कवि रफीक आजाद की कविता – बेहद भूखा हूं

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बेहद भूखा 

 

पेट में, शरीर की पूरी परिधि में

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महसूसता हूं हर पल, सब कुछ निगल जाने वाली एक भूख

बिना बरसात के ज्यों चैत की फसलों वाले खेतों में

जल उठती है भयानक आग

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ठीक वैसी ही आग से जलता है पूरा शरीर

 

महज दो वक़्त दो मुट्ठी भात मिले

बस और कोई मांग नहीं है मेरी

लोग तो न जाने क्या क्या मांग लेते हैं वैसे सभी मांगते हैं

मकान गाड़ी, रुपए पैसे, कुछेक में प्रसिद्धि का लोभ भी है

पर मेरी तो बस एक छोटी सी मांग है

भूख से जला जाता है पेट का प्रांतर

भात चाहिए, यह मेरी सीधी सरल सी मांग है

ठंडा हो या गरम

महीन हो या खासा मोटा या राशन में मिलने वाले लाल चावल का बना भात

कोई शिकायत नहीं होगी मुझे

एक मिटटी का सकोरा भरा भात चाहिए मुझे

दो वक़्त दो मुट्ठी भात मिल जाय तो मैं अपनी समस्त मांगों से मुंह फ़ेर लूंगा

अकारण मुझे किसी चीज़ का लालच नहीं है

यहां तक की यौन क्षुधा भी नहीं है मुझमें

मैं तो नहीं चाहता नाभि के नीचे

साड़ी बांधने वाली साड़ी की मालकिन को

उसे जो चाहते हैं ले जाएं

जिसे मर्ज़ी उसे दे दो

ये जान लो कि मुझे इन सब की कोई जरूरत नहीं

पर अगर पूरी न कर सको मेरी इत्ती सी मांग

तुम्हारे पूरे मुल्क में बवाल मच जाएगा

भूखे के पास नहीं होता है कुछ भला बुरा कायदा कानून

सामने जो कुछ मिलेगा खा जाऊंगा बिना किसी रोक-टोक के

बचेगा कुछ भी नहीं

सब कुछ स्वाहा हो जायेगा निवालों के साथ

और मान लो गर पड़ जाओ तुम मेरे सामने

राक्षसी भूख के लिए परम स्वादिष्ट भोज्य बन जाओगे तुम

सब कुछ निगल लेने वाली महज़ भात की भूख

खतरनाक नतीजों को साथ लेकर आने को न्योतती है

दृश्य से द्रष्टा तक की प्रवहमानता को चट कर जाती है

 

और अंत में सिलसिलेवार मैं खाऊंगा पेड़ पौधे, नदी नाले

गांव-देहात, फुटपाथ, गंदे नाले का बहाव

सड़क पर चलते राहगीरों, नितम्बिनी नारियों

झंडा ऊंचा किए खाद्य मंत्री और मंत्री की गाड़ी

आज मेरी भूख के सामने कुछ भी न खाने लायक नहीं

भात दे हरामजादे… वर्ना मैं चबा जाऊंगा समूचा मानचित्र

 

 

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