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पीएम मोदी के सामने जीडीपी ग्रोथ को रफ्तार देने की चुनौती, फंसा है बैंकों का 13 हजार अरब रुपये का कर्ज

Newdelhi : आर्थिक विकास को गति कैसे दे पायेगी मोदी सरकार?  मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में देश के आर्थिक विकास को गति देने की चुनौती सबसे बड़ी साबित होगी.   खासकर जब वित्त वर्ष 2018-19 में जीडीपी ग्रोथ रेट घटकर 7% से भी नीचे आने की खबर है.

सूत्रों के अनुसार सरकार की यह चुनौती सरकारी बैंकों के फंसे कर्ज के कारण और भी बड़ी  बन गयी है.  ब्लूमबर्ग के आंकड़े के अनुसार, इस फंसे कर्ज की रकम 13 हजार अरब रुपये तक पहुंच चुकी है.

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 नकदी संकट ने पूरे सेक्टर पर नकारात्मक असर डाला

कुछ नॉन-बैंकिंग फाइनैंशल कंपनियों (एनबीएफसी) के नकदी संकट ने पूरे सेक्टर पर नकारात्मक असर डाला है और अब यह सेक्टर कर्ज का मोहताज हो गया है.  ऐसे में नॉन-बैंकिंग फाइनैंशल कंपनियां भी ग्राहकों को कर्ज नहीं दे पा रही हैं जिससे खपत एवं खर्चों की गति सुस्त पड़ी है.  अब बैंकों और एनबीएफसीज में दोबारा जान डालने का पूरा दारोमदार सरकार पर है.

अगर वह इस सेक्टर में फिर से जान फूंकना चाहती है तो उसे इस 13 हजार अरब रुपये को झोल को साफ करना होगा. तब जाकर बैंक और एनबीएफसीज फिर से कर्ज देना शुरू कर पायेंगे जिससे निजी निवेश को बल मिलेगा और कन्ज्यूमर स्पेंडिंग भी बढ़ पायेगी.

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निवेशकों की आस मोदी सरकार से

बता दें कि  निवेशक मोदी सरकार से यह आस लगाये बैठे हैं कि वह अपने पहले कार्यकाल में शुरू की गयी  सुधारों की श्रृंखला आगे बढ़ायेगी.  सरकार ने ढाई साल पहले दिवालिया कानून लाकर कर्ज नहीं चुकाने वालों को साधने की अच्छी शुरुआत की थी.

इस कानून से बैंकों को अपने फंसे कर्जों की वसूली कर पाने में बड़ी सहायता मिली, लेकिन अदालती प्रक्रिया में खींचतान के कारण कर्जदारों की संपत्तियां बेचने में ज्यादा वक्त लग रहा है.  यही वजह है कि कुछ विदेशी निवेशक भी भारत में निवेश करने से हिचक रहे हैं.

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दिवालिया कानून की समीक्षा की जाये

देश के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) के चेयरमैन रजनीश कुमार ने हाल ही में एक इंटरव्यू में कहा था, हमें (दिवालिया कानून के तहत समाधान) प्रक्रिया में तेजी लाने का रास्ता तलाशना होगा.  उन्होंने कहा, लेटलतीफी के बावजूद पूरे सिस्टम के लिए अब तक के परिणाम अच्छे रहे हैं.

उन्होंने स्पष्ट कहा कि दिवालिया कानून की समय-समय पर समीक्षा करने की जरूरत है. सरकारी आंकड़े बताते हैं कि मार्च महीने तक दिवालिया कानून के तहत दर्ज मुकदमे 270 दिनों की तय समयसीमा से पार कर गये थे.

हालत यह है कि आरबीआई ने जिन 12 बड़े कर्जदारों को 2017 में ही दिवालिया अदालत भेजा था, उनमें सिर्फ पांच की ही संपत्तियां सफलतापूर्वक बिक पायी. जिससे उनके कर्जदाता बैंकों को औसतन 39% बकाया वापस हो सका.  शेष सात कंपनियों के मुकदमे विभिन्न कारणों से अटके पड़े हैं.

  43% रकम की वसूली हुई

क्रिसिल की रिपोर्ट के अनुसार दिवालिया अदालत में करीब 1,000 अरब रुपये के फंसे कर्ज वाले जिन 94 मामलों को मंजूरी मिली, उनमें करीब 43% रकम की वसूली हो गयी है.वर्ल्ड बैंक कहता है कि इन मुकदमों में लगे समय और खर्च हुए धन के मद्देनजर वसूली दर का आकलन करें तो इनमें कुछ अफ्रीका के 20.3% तो कुछ आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) के ऊंची आय वाले सदस्य देशों की 70.5% दर के आसपास बैठती है.

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