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खेल प्रशिक्षकों के लिए 20 सालों में नहीं बनी नियोजन नियमावली, कैसे मिलेंगे द्रोणाचार्य?

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# 2014-15 में बनी नियमावली से खेल प्रशिक्षकों में है निराशा. 
# सुरक्षित भविष्य के लिए झारखण्ड छोड़ते रहते हैं स्पोर्ट्स ट्रेनर्स. 

Amit Jha
Ranchi: झारखण्ड में खेल प्रशिक्षकों के लिए आदर्श हालात नहीं हैं. खिलाड़ियों की नयी पौध तैयार करने और उनका सुनहरा भविष्य गढ़ने की जिम्मेदारी लिए स्पोर्ट्स ट्रेनर अपने ही भविष्य की चिंता में घुटते जा रहे हैं. ट्रेनरों के लिए राज्य में अब तक आदर्श नियोजन नियमावली तय नहीं की जा सकी है.

राज्य में अभी एक भी स्थायी खेल प्रशिक्षक नहीं है. ऐसे में जिन्हें मौका लग जाता है, वे दूसरी संभावनाओं को तलाश करते हैं और फिर वहीं चले जाते हैं. जाहिराना तौर पर इससे अव्वल दर्जे के खेल प्रशिक्षकों को खेल विभाग को अपने साथ बनाये रखना चुनौती साबित हो रही है.

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खेल प्रशिक्षकों के लिए 2014 में पहली बार हुई थी पहल

15 नवंबर, 2000 को बिहार से अलग होकर झारखंड अलग राज्य बना. इस दौरान झारखंड के हिस्से में 20 स्थायी खेल प्रशिक्षक आये थे. प्रशिक्षकों का अभाव खेल विभाग ने महसूस किया. इसके लिए पहली बार ढंग से पहल तब हुई तब 2014 में स्पोर्ट्स ट्रेनरों के लिए नियुक्ति नियमावली बनायी गयी.

कुल 92 पदों पर स्थायी नियुक्ति के लिए प्रावधान रखा गया. इसमें मुख्य रूप से पहले से काम कर रहे 20 ट्रेनरों के अलावा 72 नये पदों पर स्थायी नियुक्ति किये जाने का प्रस्ताव था. इसे कैबिनेट में स्वीकृति के लिए भेजा गया. जानकारी के अनुसार वहां इस मसले को उलझा दिया गया और स्थायी नियुक्ति की प्रक्रिया का मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया. इसके बदले अनुबंध आधारित नियुक्ति को ही आगे बढ़ाने की बात तय की गयी.

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अब तक होती रही है संविदा आधारित नियुक्तियां

खेल खिलाड़ियों के लिए जाने जानेवाले राज्य में शानदार खेल प्रशिक्षकों को बुलाने और उनसे सेवा लिए जाने के मामले में खेल विभाग उदासीन ही रहा है. 2004 में अर्जुन मुंडा सीएम थे. उस दौरान 15 नवंबर को राज्य स्थापना दिवस के मौके पर आवासीय सेंटरों में सेवा देने को 6 स्पोर्ट्स ट्रेनर्स को नियुक्ति पत्र दिया गया. हालांकि यह संविदा आधारित ही था. 10,000 रुपये प्रतिमाह पर इनकी सेवा लिए जाने की बात तय हुई. इसी दौरान तकरीबन 20 खेल प्रशिक्षकों को डे बोर्डिंग सेंटरों के लिए चुना गया. 2500 रुपये प्रतिमाह नियत मानदेय पर उन्हें रखा गया.

2006 में चार नये प्रशिक्षकों को लाया गया और आवासीय सेंटरों पर उन्हें भेजा गया. वर्ष 2008 में बंधू तिर्की खेल मंत्री थे. उस दौरान भी आवासीय सेंटरों के लिए चार ट्रेनरों और डे बोर्डिंग के लिए 15 लोगों (लगभग) को चुना गया. तिर्की ने 2500 रुपये प्रतिमाह नियत मानदेय पा रहे प्रशिक्षकों को 5500 रुपये दिये जाने का प्रावधान कराया. हालांकि जिन्हें 10,000 रुपये प्रतिमाह मिल रहे थे, उनके लिए कोई नयी पहल नहीं हुई. वर्ष 2011 में आवासीय सेंटर के ट्रेनरों के लिए मानदेय में वृद्धि हुई. 10,000 रुपये प्रतिमाह की जगह पर 15,660 रुपये का प्रावधान हुआ. संविदा आधारित ट्रेनर पद पर कार्यरत लोगों के लिए प्रतिवर्ष एक एक साल का विस्तार किया जाता रहा.

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2016 में खेल प्रशिक्षकों को मिली मामूली राहत

पूर्व खेल निदेशक रणेंद्र कुमार के समय (वर्ष 2016) खेल प्रशिक्षकों के लिए एक सकारात्मक पहल हुई. आवासीय सेंटरों में कार्यरत ट्रेनरों के लिए 15,660 रुपये की बजाये 31,611 रुपये प्रतिमाह और 5500 रुपये प्रतिमाह पर डे बोर्डिंग सेंटर में काम रहे ट्रेनरों के लिए लगभग साढ़े ग्यारह हजार रुपये का प्रावधान तय किया गया.

2016-17 में एक दर्जन से भी अधिक ट्रेनरों को 500 प्रतिदिन के नियत पारिश्रमिक पर भी लाया गया. वर्ष 2019 में आवासीय सेंटरों के लिए 19 पदों पर (संविदा आधारित) खेल प्रशिक्षकों को लाया गया. इन्हें एक एक साल अवधि विस्तार के बदले एक ही बार में तीन सालों के लिए रखा गया.

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सोलह सालों में ढाई हजार से साढ़े ग्यारह हजार पर पहुंचे ट्रेनर्स

अभी तकरीबन 100 खेल प्रशिक्षक खेल विभाग को अपनी सेवाएं दे रहे हैं. 2004 में प्रतिमाह 2500 रुपये प्रतिमाह संविदा आधारित नौकरी की शुरुआत करनेवाले ट्रेनर सोलह बरसों में साढ़े ग्यारह हजार रुपये पर पहुंचे हैं. वहीं 10,000 रुपये पाने वाले 31,611 पर पहुंचे हैं.

इतनी अवधि में इनके लिए न तो पीएफ, मेडिकल की सुविधा बन पायी है और ना ही दूसरी कोई सुविधा दी गयी है. ऐसे में जिन ट्रेनरों व पूर्व खिलाड़ियों को मौका मिला कि वे साईं (स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया) या अन्य राज्यों में अपनी सेवा देने निकल जा रहे हैं. सिलसिला जारी है. राज्य सरकार द्वारा नियुक्ति नियमावली नहीं बनाये जाने से खेल प्रशिक्षकों के सामने अपने सुरक्षित भविष्य का सवाल अरसे खड़ा रहा है. मसला यह अब भी मौजूद है कि अर्जुन, एकलव्य तो तभी उभरेंगे न जब गुरु द्रोणाचार्य बचेंगे.

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