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घर का बोझ उठा रहीं पिंक ऑटो चालिकाएं, पीठ में बच्चे को बांध चला रहीं ऑटो

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Chhaya

Ranchi: आर्थिक रूप से मजबूत रहना हर व्यक्ति चाहता है और इसके लिए लोग अपने-अपने तरीके से मेहनत भी करते हैं. लेकिन, पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं को खुद को आर्थिक रूप से सशक्त और आत्मनिर्भर बनाने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ती है. क्योंकि, ये कितना भी खुद को सशक्त बनाने की कोशिश करें, लेकिन परिवार और अपने कर्तव्यों से ये कभी मुंह नहीं मोड़ पातीं. खुद को सशक्त और आर्थिक रूप से मजबूत करने के लिए राजधानी में कुछ महिलाएं पिंक ऑटो चलाती हैं. इसे अपने परिवार के प्रति इनकी जिम्मेदारी ही कहें कि अब इन्हें अपने बच्चों को पीठ पर बांधकर ऑटो चलाते देखा जा रहा है. अरगोड़ा से बिग बाजार तक चलनेवाले इस पिंक ऑटो में नन्हे बच्चों को गोद में या पीठ में बांधे महिलाओं को बड़ी सरलता से ऑटो चलाते देखा जाता है. सिर्फ इसी रास्‍ते में ही नहीं, बल्कि कोकर चौक, रेलवे स्टेशन के आस-पास भी कुछ महिलाओं को इसी तरह ऑटो चलाते देखा जाता है.

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आर्थिक स्थिति से तंग आकर कर रहीं ऐसा

जब इन पिंक ऑटो चालिकाओं से बात की गयी, तो अधिकतर महिलाओं ने बताया कि उन्होंने ऑटो चलाने की शुरुआत ही घर की आर्थिक स्थिति से तंग आकर की. महिलाओं ने बताया कि सामाजिक संगठनों से जुड़ने के बाद इन्हें ऑटो चलाने का प्रशिक्षण दिया गया, जिसके बाद किस्तों में इन्होंने ऑटो लिया.

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सुरक्षा की होती है फिक्र

ऑटो चालिकाओं ने बताया कि बच्चे को पीठ पर या गोद में रखकर ऑटो चलाने में काफी डर लगता है. सुनीता देवी ने बताया कि घर में कोई ऐसा नहीं है, जो बच्चे को देखे. वहीं, घर बैठ जाने से घर की आर्थिक स्थिति खराब हो जायेगी. ऐसे में यही एक मात्र उपाय है कि बच्चे को लेकर ही ऑटो चलायें.

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पति और बच्चे के कारण कर्ज में डूबी

महिला ऑटो चालक बिरस देवी ने बताया कि वह पहले मजदूरी करती थी. किसी तरह कर्ज लेकर ऑटो लिया. लेकिन पति का सहयोग नहीं मिलने के कारण पांच साल में अब तक वह ऑटो की किस्त नहीं चुका पायी हैं. वहीं, पति के पीने-खाने की वजह से वह और भी कर्ज में डूबी है. बिरस ने बताया कि इनका एक बेटा पिछले तीन माह से पैसे की कमी के कारण स्कूल नहीं जा रहा है.

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अगल-बगल के ऑटो चालकों से लगता है डर

एक अन्य महिला ने बताया कि ट्रैफिक में फंस जाने से कई बार बेटी रोने लगती है. ऐसे में कई बार पैसेंजर को परेशानी होती है, तो कई बार सवारी बच्चे को खुद गोद में उठा लेते हैं. उन्होंने बताया कि सामने से अचानक ऑटो आ जाने या अगल-बगल से ऑटो के आड़े-तिरछे काटे जाने से बच्चे को चोट लगने का भय बना रहता है.


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होती है तीन से चार सौ की कमाई

इन महिलाओं ने बताया कि इनकी प्रतिदिन की कमाई तीन से चार सौ रुपये है. वहीं, कुछ महिलाएं ऐसी भी हैं, जिनको ऑटो चलाते हुए पांच साल हो गये, लेकिन अभी तक वे ऑटो के कर्ज में डूबी हुई हैं.

राजधानी में चलते हैं 40 पिंक ऑटो

पिंक ऑटो के संस्थापक संजय साहू ने जानकारी दी कि राजधानी में अरगोड़ा, रांची रेलवे स्टेशन और कोकर से लगभग 40 महिलाएं ऑटो चलाती हैं. सुबह सात-आठ बजे से रात के नौ बजे तक ये महिलाएं ऑटो चलाती हैं. कई बार इन्हीं रूट में चलानेवाले पुरुष ऑटो चालकों के दुर्व्‍यवहार का सामना भी इन महिलाओं को करना पड़ता है.

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