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कंठ प्यासे, छाया है अंधेरा, पेंशन लटकी, फिर भी मुस्कुरा रहे हैं साहब, गजब का उत्साह लिये पोस्टर में बने हुए हैं सर

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Ravi Bharti

Ranchi: झारखंड में विकास की बयार भी कुछ अजीब है. बयार में चुभन है, टीस है. जनता के कंठ प्यासे हैं. बरसात में भी गला तर नहीं हो पा रहा. अंधेरा छाया हुआ है. अधिकांश जिलों में 10-12 घंटे तक बिजली नहीं है. कर्मचारियों की बात को दूर अफसरों को पेंशन के लिए चक्कर लगाने पड़ रहे हैं. फिर भी साहब मुस्कुरा रहे हैं. उत्साह भी गजब का है. वजह है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रविवार को झारखंड की धरती में कदम रखेंगे. कई योजनाओं का शिलान्यास भी करेंगे. उनके स्वागत में राजधानी की सड़कें पोस्टरों और बैनरों से अटी पड़ी हैं. उनमें साहब का चेहरा गजब दमक रहा है. उनका फोटोजेनिक फेस विकास की हकीकत को बयां कर रहा है. फेस देखकर ही लगता है, झारखंड खुशहाल हो गया है. प्रधानमंत्री के आव-भगत में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी जा रही है.

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सरकार के आंकड़े ही विकास को चिकोटी काट रहे

जनता के लिए सबसे अहम है पानी. पानी के बिना जिंदगानी नहीं. राजधानी में दो महत्वपूर्ण त्यौहार बीत गये, लेकिन पानी नहीं मिला. आधी आबादी पिछले दो दिनों से पानी के लिए तरस रही है. पूरे प्रदेश की बात करें, तो सरकार ने दावा किया था कि 10 पैसे प्रतिलीटर शुद्ध पेयजल उपलब्ध होगा. अब लोग 20 से 25 रुपये प्रति 20 लीटर पानी खरीदने को मजबूर हैं. यही नहीं सभी को पाइप लाइन से पानी देने का वादा भी था. खुद सरकार के आंकड़े बताते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में सिर्फ 18 फीसदी को ही पाइप लाइन से पानी मिलता है. राजधानी में ही पूरी तरह से पाइप लाइन नहीं बिछ पायी है. रुक्का डैम से हटिया को जोड़ा भी गया, लेकिन इसमें भी पानी पिलाने में आफत. 66 आदमी पर एक ही चापानल है.

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ज्यों-ज्यों बढ़ी मियाद, गहराता गया अंधेरा

चार साल से अब तक दर्जनों बार दावा किया गया कि हर घर में 24 घंटे बिजली उपलब्ध होगी. सरकार के आंकड़े खुद बता रहे हैं कि अब तक 18 लाख घरों में बिजली नहीं पहुंच पायी है. जहां पोल गड़े हैं, वहां तार नहीं है. पावर हब बनाने की बात कई बार मंच से की गयी. कहा गया कि 2019 में झारखंड में 5000 मेगावाट बिजली उपलब्ध होगी. हकीकत यह है कि राज्य के एकमात्र सरकारी पावर प्लांट से हर दिन औसतन 177 मेगावाट ही बिजली मिलती है. सात जिलों में डीवीसी ने बिजली में कटौती कर दी है. बिजली व्यवस्था पूरी तरह से सेंट्रल सेक्टर और उधार पर निर्भर हो गयी है.

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रिटायरमेंट बेनिफिट नहीं, खजाने में पैसे की किल्लत

कई देनदारी और जीएसटी का भी असर भी कहीं न कहीं सरकारी खजाने पर पड़ा है. अगर पेंशन की बात हो तो 15 नवंबर 2011 से अब तक पेंशन में 36 अरब रुपये का भुगतान हो चुका है. फैमिली पेंशन के रूप में एक अरब 50 करोड़ रुपये का भुगतान हो चुका है. वित्त विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 300 गजेटेड अफसरों का रिटायरमेंट बेनिफिट लंबित है. इनमें चार आईएफएस और एक आईपीएस भी शामिल हैं. अधिकतर अफसर राज्य प्रशासनिक सेवा और सचिवालय सेवा के हैं. ये सभी विभाग के चक्कर काट रहे हैं.

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ऑन गोइंग प्रोजेक्टों की बढ़ी लागत

सरकार के सभी विभागों में विभिन्न प्रोजेक्ट की डिजाइन और डीपीआर चेंज होने के कारण प्रोजेक्ट कॉस्ट हजार करोड़ से अधिक बढ़ गया. राजधानी की बात करें तो पहले चरण में सीवरेज-ड्रेनेज के लिए 360 करोड़ का कार्यादेश कानपुर की कंपनी ज्योति बिल्डटेक को मिला था. कंपनी को रांची नगर निगम की तरफ से इस काम के लिए 54 करोड़ रुपये अग्रिम और चार करोड़ का बिल भुगतान भी किया गया. 18 महीने के अंदर न तो प्रोजेक्ट पूरा हुआ और ना ही काम आगे बढ़ा.

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जोड़-तोड़ और फिर से निर्माण

कई प्रोजेक्ट्स में जोड़-तोड़ और फिर से निर्माण के कारण प्रोजेक्ट कॉस्ट बढ़ गया. बिरसा स्मृति पार्क को फिर से तोड़कर बनाने का आदेश दिया गया. मोरहाबादी में बन रहे टाइम्स स्कवॉयर को फिर से ठीक करने को कहा गया. ऐसे कई प्रोजेक्ट्स की डिजाइन में बदलाव किये गये. एजी ने सरकार से राशि मिलान करने का आग्रह किया. पर सरकार ने इसकी अनदेखी कर दी.

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