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आदिवासी-दलित समुदाय के लोगों को मनरेगा योजनाओं में मिल रहा है कम रोजगार

Ranchi: जहां एक ओर मनरेगा योजना ग्रामीणों को रोजगार देने और पलायन रोकने का काम करती थी. वहीं राज्य में इस योजना के सोशल ऑडिट से इसमें हुए कई घोटालों का पता चला है. इसके बाद भी सरकार की ओर से भ्रष्टाचार पर अकुश लगाने के लिए किसी तरह की संजीदगी नहीं दिख रही है. दूसरी ओर राज्य के ग्रामीण क्षेत्र में निवास करने वाले लोग धान की रोपाई के बाद पलायन करने को मजबूर हो जायेंगे. रोजगार की तलाश में राज्य से पलायन करने वालों में अधिकांश परिवार आदिवासी-दलित होते है. झारखंड के पाकुड़, गुमला और गढ़वा जिले में बड़ी आबादी में लोग पलायन करने को मजबूर हो जाते है. पलामू जिला में आदिवासी और दलित परिवार रोजगार की तालाश में झुंड बनाकर पलायन करने को मजबूर हो रहे है. मनरेगा योजना में कार्य नही मिलने के कारण गांव में धानरोपनी के बाद सिर्फ बुजुर्ग ही दिखते है. किसान इस वर्ष मानसून की बेरूखी के कारण कृषि कार्य से भी संतुष्ट नहीं नजर आ रहे है. परिस्थिति से मजबूर ग्रामीण रोजगार की तलाश में दूसरे प्रदेशों की ओर पलायन कर रहे है.

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राज्य में आदिवासी दलित समुदाय को मनरेगा में रोजगार की स्थिति

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ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार 2015-16 में मनरेगा में 50 प्रतिशत कार्य दिवस आदिवासी और दलित समुदाय के द्वारा किया जाता था. वहीं 2017-18 में कुल कार्य दिवस का 40 प्रतिशत ही कार्य आदिवासी और दलित समुदाय से जुड़े लोग को मिला. वहीं 2018-19 में जुलाई तक 37 प्रतिशत ही कार्य आदिवासी दलित समुदाय  के द्वारा किया गया है.

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ठेकेदार बैंक खाते से पैसे की फर्जी निकासी करने लगे है

मनरेगा मुद्दों पर कार्य करने वाले समाजिक कार्यकर्ता सिराज के अध्ययन के अनुसार झारखंड में मनरेगा अंतर्गत कुल सृजित रोजगार के अनुपात में आदिवासी-दलित परिवारों को मिल रहे रोजगार में लगातार गिरावट हो रही है. यह गिरावट 2015-16 के बाद से अधिक हो गयी है. इस आंकड़े और जमीनी स्थिति से दो बातें समझी जा सकती है कि राज्य के कई जिलो में आदिवासी-दलित परिवारों को पहले के अनुपात में कम रोजगार मिल रहा है. इसके कारण के रूप में जो निष्कर्ष सामाने आया है. वह योजना में कार्य करने और समाग्री के खरीद के लिए वर्ष 2016-17 से अधिकांश भुगतान बैंक खाते से होने लगा. अब ठेकेदार द्वारा अपने जान-पहचान के लोगों (जो काम नहीं करते हैं) के बैंक खाते से पैसे की फर्जी निकासी करने लगे है. जिसके कारण वैसे लोगों के नाम पर रोजगार सृजित होते दिख रहा है. जो कभी काम करने जाते ही नहीं है. जिस कारण राज्य में आदिवासी-दलित परिवारों को मिल रहे रोजगार के अनुपात में गिरावट हो रही है. यह गिरावट योजना में गड़बड़ी को ़ीबढ़वा दे रही है. जिसके प्रमाण सोशल ऑडिट  सामने आ चुकी है. और योजना में फर्जीवाड़ा का आरोप कई रोजगार सेवक से लेकर बीडीओं पर भी लग चूका है.

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