Opinion

20 लाख करोड़ के राहत पैकेज में पुरानी योजना को शामिल कर ठगा जा रहा लोगों को

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Apoorv Bhardwaj

सड़कों पर भूखे प्यासे चल रहे मजदूरों के जख्मों पर नमक छिड़क रहे हैं. ऐसा लगता है सरकार को उसके नागरिकों की कोई चिंता नहीं है. वह खुद में आत्ममुग्ध है. 20 लाख करोड़ राहत पैकेज में पुरानी योजनाओं को शामिल करके मजदूरों-किसानों को ठग रही है.

राहत पैकेज के नाम पर लोगों को ठगा जा रहा है. सरकार ने जो पैकेज में 202 रु न्यूनतम मजदूरी घोषित की है. वह पिछले 9 महीने से पेडिंग थी. सरकार ने यह वेज कोड बिल का कानून अगस्त 2019 में ही बना लिया था. लेकिन इसको अभी तक नोटिफाई नहीं किया है.

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यह कानून भारत के सभी 100 प्रतिशत मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी देने के लिए बनाया गया था. जो अभी वर्तमान में 40 फीसदी मजदूरों को ही मिलता है. लेकिन केंद्र सरकार इस कानून को कॉरपोरेट लॉबी के दबाव में 9 महीने से टाल रही है और कोरोना काल में भी नोटिफिकेशन भी नहीं कर रही है.

यह गौर करने वाली बात है कि सरकार ने 202 रु मजदूरी तय करके मजदूरों पर कोई एहसान नहीं किया है. क्योंकि मजदूरी दर बढ़ाने की सिफारिश राहत पैकेज में लागू दर से कहीं अधिक है. 340-360 तक मजदूरी दर तय करने कि सिफारिश की गयी थी.

मेरे डाटा के हिसाब से भारत में 90 प्रतिशत मजदूर असंगठित सेक्टर में काम करते हैं. जिसमें से लाखों मजदूरों का रजिस्ट्रेशन भी नहीं हुआ है. तो वो यह एक देश एक राशन कार्ड का फायदा कैसे उठाएंगे. एक देश एक राशन कार्ड की योजना जून 2019 में ही बन गयी थी. जिसकी इम्प्लीमेंट करने की डेडलाइन 30 जून 2020 तय की गयी थी.

उपभोक्ता मामलों के केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान ने 20 जनवरी 2020 को बताया था कि “One Nation One Ration Card”  योजना देश के 16 राज्यों में लागू हो चुका है. तो फिर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण कौन सी नयी बात कह रही हैं. उन्होंने क्यों नहीं बताया कि योजना पहले से चल रही है. यह राहत पैकेज का हिस्सा नहीं है.

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वर्ष 1947 के बाद भारत की सड़कों पर वो मंजर नजर आ रहा है, जिसको देखकर किसी भी संवेदनशील व्यक्ति की आंखों मे पानी आ जाये. लेकिन इस सरकार की आंखों में शर्म का भी पानी नही है. भारत का निर्माता आज सड़क पर बेबस अपनी क़िस्मत पर रो रहा है, लेकिन इस देश का मालिक उसके साथ रोज नित नये मजाक कर रहा है.

हजारों लाशें देखकर,

क्या आंखें नम नहीं होती ?

कैसे खा जाते हो झूठी कसमें,

हमसे तो रोटी हजम नहीं होती !

डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं.

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