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ठंड में सड़कों पर गुजरी 5 रातें, वन आधिकार कानून के प्रावधनों का पालन कराने निकले झारखंड के आदिवासी-मूलवासी

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Pravin Kumar

Ranchi: बारिश और आंधी हौसले को परास्त नहीं कर सके. ठंड से भी इरादे नहीं डिगे. बुलंद इरादों और अपने वजूद के लिए संघर्ष कर रहे आदिवासी पांचवें दिन भी सड़कों पर रहे. खुली आसमान के नीचे सत्ता और सरकार को नींद से जगाने के इरादे के साथ जंगल-जमीन अधिकार पदयात्रा करीब 70 किलोमीटर दूरी तय करके छठे दिन ओरमांझी जैविक उद्यान के पास पहुंची. वहीं अपना पड़ाव डाला. पदयात्रा में काफी संख्या में महिलाएं और युवा भी शामिल हैं. पदयात्रा में वैसे लोग भी शामिल हैं जिनकी अजीविका वन उपज और वन क्षेत्र से चल रही है. इस यात्रा में वैसे लोग भी शामिल हैं जो एक बार विस्थापित हो चुके हैं और उनके सामने फिर से विस्थापन का खतरा मंडरा रहा है. 20 फरवरी को संत कोलंबस कॉलेज ग्राउंड से निकाली गयी पदयात्रा 27 फरवरी को रांची पहुंचेगी.

कई दशकों से जिस भूमि को सींचा, वन विभाग ने उससे खदेड़ दिया

पदयात्रा में नेतृत्व कर रही महिला फूल कुमारी बखला कहती हैं हमारे पूर्वज 60-70 साल पहले रांची से विस्थापित होकर हजारीबाग कटकमसांडी में आकर बस गए. जंगलों को साफ करके खेती और रहने लायक बनाया. लेकिन वन विभाग ने उसे हमसे छीन लिया. पूर्वजों के द्वारा सिंचाई के लिए बनाये गये जलस्रोत को भी अपने कब्जे में ले लिया. कानून आने के बाद ग्राम सभा के अनुमोदन के बाद पट्टा के लिए दावा भी किया गया, लेकिन दावे को  रिजेक्ट कर दिया गया. जिस भूमि से आजीविका चलती थी, उसे वन विभाग ने ले लिया. इलाके के कई परिवार के समक्ष भुखमरी से लेकर बच्चों की परवरिश का भी संकट है. क्षेत्र से युवा तो पलायन करते ही हैं नाबालिग युवतियों को भी पलायन के लिए मजबूर होना पड़ रहा है. इस विषम परिस्थिति में हम सड़कों पर उतरे हैं. ताकि परिस्थिति से सरकार भी वाकिफ हो. जिला में बैठे अधिकारी मनमानी करते हुए वन पट्टे के दावे को खरिज करने का काम कर रहे हैं ऐसे में आदिवासी जायें तो जायें कहां.

जिसकी देखभाल ग्रामीण करते हैं, वह जंगल लहलहा रहा है

हमारे पूर्वज ने 40-50 साल पूर्व झाड़ी साफ कर खेती करने योग्य जमीन बनायी. उसके बाद वन विभाग ने वन आधिकार कानून आने के बाद उस जमीन पर पेड़ लगा दिया, जिससे हमारी आजीविका चलती थी. 10 साल के बाद फिर उसी भूमि पर पेड़ वन विभाग लगा रहा है. विभाग के द्वारा आदिवासियों और वन आश्रित समुदाय को परेशान करने का काम किया जा रहा है, वहीं कल्याण विभाग भी मूकदर्शक बन बैठा है. इलाके में जिस जंगल की देखरेख ग्रामीण कर रहे हैं, वह जंगल लहलहा रहा है, लेकिन वन विभाग जिस जंगल की देखरेख करता है वहां के जंगल वीरान हो गये हैं.

वन आश्रित दलित परिवार के समक्ष भुखमरी का है संकट

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यात्रा में शामिल इटखोरी के महावीर राम कहते हैं कि इलाके में एससी परिवार के समक्ष भुखमरी की स्थिति  पिछले 10-15 सालों से आ गयी है. वन विभाग के द्वारा जंगल से फलदार वृक्ष, महुआ, आम, कटहल, चार आदि को काट दिया गया है. एससी समुदाय की आजीविका वन उपज पर निर्भर थी, जो अब नहीं मिल पा रहा है. न ही वन में जड़ी-बूटी मिलती है जिसे इकट्ठा कर बेच कर जीविका चलती थी, अब सब खत्म हो गया है. वन विभाग आकाशिया, यूकेलिप्टस और टिंबर वृक्ष लगा रहा है. विभाग के द्वारा पत्ता, सूखी लकड़ी लाने पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया है. भूदान में मिली जमीन कहां है, कोई अधिकारी नहीं बता रहे हैं. ऐसे में कोडरमा, हजारीबाग, चतरा जिला में एससी परिवारों की काफी दयनीय स्थिति है. एससी परिवार के समक्ष बड़ा संकट आ गया है.

पदयात्रा में शामिल शीला देवी कहती हैं कि कंपनी और कल कारखाने बैठाने के लिए पूंजीवालों को जमीनें दी जाती हैं, लेकिन रैयतों के बारे में सरकार का नजरिया ठीक नहीं है. जंगलों और उसके आसपास रहनेवालों को सिर्फ वोट का हिस्सा माना जाता है. सरकारी योजना का लाभ मुश्किल से मिलता है.

वन पट्टा के दावे को कम कर देते हैं अधिकारी

किरन मिंज कहती हैं ग्राम सभा में पास प्रस्ताव को बिना ग्रामसभा को सूचित किये बिना अधिकारी काम करते है. वन पट्टा के लिए ग्राम सभा अगर 1 एकड़ अनुमोदित करती है तो अधिकारी उसे 5 डिसमिल कर देते हैं. हजारीबाग जिले में जितना भी वन पट्टा ग्रामीणों को मिला है उससे रकबा कई गुना कम कर दिया गया है. यह काम अधिकारी और वन विभाग के लोग मिलजुल कर करते हैं.

पदयात्रा में शामिल लोगों की सरकार से ये हैं मांगें

  1. राज्य के उन सभी मामलों को सरकार वापस ले, जो गलत तरीके से आदिवासियों पर दायर किये गये हैं.
  2. किसी भी तरह से भूमि अधिग्रहण से पहले ग्रामसभा से अनुमति ली जाये.
  3. जनजातीय अधिकारों को सरकार लागू करे.
  4. वन अधिकार अधिनियम के तहत व्यक्तिगत और सामुदायिक भूमि अधिकार 2006 लागू करने के लिए सरकार अभियान चला कर छह महीने के भीतर अधिकार दे.
  5. गैर-लकड़ी वन उपज का मौजूदा न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया जाये, ताकि पारंपरिक वन आवास समुदाय ग्राम पंचायत के माध्यम से एनटीएफपी का लाभ उठा सकें और इसका निपटान कर सकें.
  6. सीएनटी एक्ट और एसपीटी एक्ट को सख्ती से लागू किया जाये.
  7. सामूहिक भूमि को भूमि बैंक की पकड़ से मुक्त किया जाये.
  8. भूमि अधग्रिहण अधिनियम 2013 को तुरंत लागू किया जाये.

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