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दल बदले और हार से छवि हुई धूमिल, अब कोई घर वापसी की कोशिश में तो कोई कर रहा अलग प्लानिंग

Akshay Kumar Jha

Ranchi: विधानसभा चुनाव 2019 से पहले दल-बदल के कई उदाहरण मिले. इनमें कुछ बड़े नाम तो कुछ छोटे नाम भी शामिल हैं. पार्टी छोड़ने के पीछे मनचाही जगह से टिकट ना मिलना सबसे बड़ी वजह मानी गयी. दूसरी पार्टी से चुनाव लड़ने के बाद कइयों को हार का सामना करना पड़ा. हारने के बाद ना तो वो पार्टी के रहे और ना ही क्षेत्र में राजनीतिक पहचान बरकरार रख पा रहे हैं. इससे बौखलाये कई नेता अब घर वापसी की सोच रहे हैं, तो कुछ दूसरी प्लान पर काम कर रहे हैं.

इन नेताओं की फेहरिस्त लंबी है. इनमें सिर्फ कुणाल षाड़ंगी ही हैं, जिन्हें बीजेपी जैसी बड़ी पार्टी में एक ठौर मिला है. नहीं तो दूसरे कई नेता पार्टी बदलने का अफसोस आज तक कर रहे हैं.

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 प्रदीप बालमुचूः पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष. पार्टी के एक बड़ा नेता. पार्टी का दामन इसलिए छोड़ना पड़ा, क्योंकि गठबंधन होने की वजह से उन्हें घाटशिला सीट से टिकट नहीं मिल रहा था. कांग्रेस को छोड़ कर वो आजसू में चले गये. लेकिन जीत दर्ज नहीं कर पाये. उन्हें जेएमएम के प्रत्याशी रामदास सोरेन ने हराया. चुनाव हारने के बाद आजसू में उनका अस्तित्व सिर्फ नाम मात्र का रह गया.

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राजनीतिक जमीन खिसकता देख उन्हें अपनी पुरानी पार्टी की याद आयी. दोबारा कांग्रेस में जाने को वो बेताब दिख रहे हैं. बेताबी का आलम यह है कि बिना किसी बुलावे के वो राजीव गांधी की जयंती पर पार्टी कार्यालय पहुंच गये. हालांकि इस बात का विरोध पार्टी के मौजूदा अध्यक्ष ने किया.

 

सुखदेव भगतः कांग्रेस के एक और पूर्व अध्यक्ष जिन्होंने चुनाव से ऐन पहले बीजेपी का दामन थाम लिया. बीजेपी की तरफ से पूरी तैयारी के साथ सुखदेव भगत को चुनावी मैदान में उतारा गया. खुद अमित शाह ने एक रैली में आकर सुखदेव भगत के लिए वोट मांगा. लेकिन उन्हें मौजूदा कांग्रेस के पार्टी अध्यक्ष रामेश्वर उरांव ने चुनाव में हरा दिया.

हारने के बाद बीजेपी में वो महज एक नाम के लिए हैं. पुख्ता सूत्रों का दावा है कि उन्हें भी अपने पुराने घर कांग्रेस की याद आ रही है. वो भी घर वापसी को बेताब हैं. लेकिन पार्टी के कुछ बड़े नेता उन्हें पार्टी में नो इंट्री का साइन बोर्ड दिखा रहे हैं. इनमें खुद पार्टी अध्यक्ष और मंत्री रामेश्वर उरांव का नाम सामने आ रहा है.

 

मनोज यादवः पूर्व बरही विधायक मनोज यादव ने भी चुनाव से पहले कांग्रेस का दामन छोड़कर बीजेपी के साथ हो गये. लेकिन उन्हें अंदाजा नहीं था कि पूर्व बीजेपी विधायक उमाशंकर अकेला कांग्रेस में आकर उन्हें हरा देंगे. आज बीजेपी में उनकी क्या स्थिति है, किसी से छिपी नहीं है. पार्टी के किसी भी प्लेटफॉर्म से वो जुड़े हुए नहीं हैं. कांग्रेस में आने का दरवाजा भी उन्हें बंद दिख रहा है. लिहाजा अपनी राजनीतिक छवि बचाने के लिए वो अपने क्षेत्र में दूसरे तरीके से काम कर रहे हैं. देखना होगा कि आने वाले दिनों में वो अपनी राजनीतिक जीवन किस तरह बिताते हैं.

 

कुणाल षाड़ंगीः जेएमएम में उभरता एक युवा चेहरा अचानक चुनाव से पहले बीजेपी का दामन थाम लेता है. जीत के आत्मविश्वास के साथ वो चुनावी मौदान में काफी जोर से ताल ठोंकते हैं. लेकिन उन्हें उन्हीं की पुरानी पार्टी के उम्मीदवार से हार का सामना करना पड़ता है. चुनाव हारने के बाद कुछ दिनों की राजनीतिक संन्यास के बाद वो बीजेपी में सक्रिय दिखायी देते हैं.

पार्टी में उन्हें प्रदेश प्रवक्ता का पद दिया जाता है. जिसे एक सम्मान के साथ देखा जा रहा है. पार्टी की बातों को मीडिया में मजबूती से रखने की उनकी तारीफ हो रही है. दल बदलने वालों में एक कुणाल ही हैं, जिन्हें पार्टी छोड़ने के बाद बीजेपी जैसी बड़ी पार्टी में एक पहचान बनाने का मौका मिला है.

 

अंतु तिर्कीः जेएमएम के कद्दावर नेता. चुनाव से पहले हेमंत सोरेन के आस-पास दिखने वाले पूर्व जेएमएम नेता ने जेवीएम का दामन थाम लिया. इनकी भी नाराजगी टिकट ना मिलना थी. खिजरी सीट गठबंधन होने की वजह से कांग्रेस के कोटे में चला गया था. राजेश कच्छप ने कांग्रेस से चुनाव लड़ते हुए उन्हें हरा दिया.

चुनाव खत्म होने के बाद अब जेवीएम का अस्तित्व ही खत्म हो गया. ऐसे में अंतु तिर्की ना जेवीएम के रहे और ना ही जेएमएम के. हार के बाद उनकी क्षेत्र में सक्रियता भी कम देखी जा रही है. अपनी राजनीतिक भविष्य को वो कैसे संवारते हैं, देखने वाली बात होगी.

 

चुनाव के बाद जिनकी खो रही है राजनीतिक पहचान

कुछ नाम ऐसे भी हैं, जिन्होंने चुनाव से पहले पार्टी छोड़ दूसरी पार्टी का दामन थाम लिया. उनमें से जेवीएम के तीनों विधायकों का नाम आता है. बाबूलाल मरांडी को बीजेपी की तरफ से भले ही नेता प्रतिपक्ष माना जा रहा हो. लेकिन सदन में अभी भी वो संघर्ष ही कर रहे हैं. अब तो उनकी राजनीतिक भविष्य को लेकर अटकलें लगायी जा रही हैं.

वहीं बंधु तिर्की और प्रदीप यादव भले ही खुद को कांग्रेस का कहें. कांग्रेसी आलाकमान के साथ फोटो भी अपने आवास पर लगायें. लेकिन पार्टी में उनकी पहुंच क्या और कितनी है, वो और प्रदेश कांग्रेस दोनों इस बात से वाकिफ हैं.

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