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दर्द-ए-पारा शिक्षक: शिक्षा की लौ जलाने वाले प्रेम, अपने परिवार का पेट पालने के लिए कमीशन पर निर्भर

आंगनबाड़ी चला रही प्रेम की पत्नी को भी चार महीने से नहीं मिला मानदेय

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ईट और बालू का कमीशन लेने को मजबूर पारा शिक्षक प्रेम, जंगल से लकड़ी भी काट कर बेचते हैं.

कहते हैं शर्म आती है कि कमीशन और लकड़ी बेचकर दो-दो सौ रूपये की कमाई होती हैं.

प्रेम पारा शिक्षक हैं और इनकी पत्नी आंगनबाड़ी केंद्र चलाती हैं.

पत्नी को भी पिछले चार माह से नहीं मिला मानदेय और न ही केंद्र चलाने के लिए पैसे.

Ranchi: एक शिक्षक के लिए इससे बड़ी शर्म की बात कोई नहीं हो सकती, कि जिस समाज में वो ज्ञान की ज्योति फैला रहा हो, वहीं से कमीश्न लेकर वो अपने परिवार की अजीविका चलाता हो.

हास्यप्रद है, लेकिन एक कड़वी सच्चाई है. जिसे हम किसी की सोच का दोष या लालची व्यवहार कहते हो, लेकिन ये किसी इंसान के सम्मान की बात भी हो सकती है.

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जिसके खुद के परिवार का पेट नहीं पल रहा हो उसे कुछ न कुछ तो करना ही होगा अपने परिवार के लिए. कुछ ऐसा ही कर रहे हैं एक पारा शिक्षक, नाम है प्रेम आनंद गोंझू. जो वर्तमान में राज्यकीयकृत मध्य विद्यालय नचलदाग में कार्यरत हैं.

कहने को तो ये शिक्षक हैं, लेकिन स्कूल से समय मिलते ही ये ईंट-बालू कॉन्ट्रैक्टर से कमीशन लेते हैं. कमीशन इन्हें तब मिलता है, जब नचलदाग में ये किसी ग्रामीण के यहां ईंट-बालू सप्लाई करवाते हैं.

अपने बारे में बताते हुए इन्होंने कहा कि बताने में शर्म आती है कि ईंट-बालू का कमीशन लेते हैं. जिसमें मात्र 200 रूपये मिलता है. इसी से साग-सब्जी और दैनिक जरूरती वस्तुओं का खर्च चलता है. समय में तो कभी भी मानदेय नहीं मिला है. ऐसे में कुछ-न-कुछ करना होगा.

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उधार-कर्ज में चला जाता है मानदेय

जब प्रेम आनंद से पूछा गया कि अप्रैल माह का मानदेय दे दिया गया है. ऐसे में उन्होंने बताया कि मानदेय मिलने से क्या होगा. सरकार पांच-छह माह का रोकती है और एक माह का देती है. जो पैसा आता है, वो भी उधार कर्ज में चला जाता है.

घर की जरूरतें पूरी नहीं होती. बड़ा परिवार है. मां है, भाई, चाचा-चाची, पत्नी और दो बच्चे. भाई भी कभी-कभार मजदूरी करता है. पूरा परिवार प्रेम पर निर्भर है.

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उन्होंने कहा कि सरकार जो देती है, वो कर्ज चुकाने में चला जाता है. कम देने से बातें और सुननी पड़ती है. अब तो स्थिति ऐसी हो गई है कि राशन वाले को मुंह तक दिखाने का मन नहीं करता. कर्ज बढ़ता जा रहा है. दुकानदार भी कहते हैं अब उधार मत लिजिए, कौन सहेगा चार माह तक. समस्या तो बहुत है परिवार की चिंता भी होती है.

कौने में पड़ी रसोई गैस, लकड़ी बेच खरीदा यूनिफॉर्म और मोबाइल

गैस चूल्हा के बारे मे बताते हुए प्रेम ने कहा कि सरकार की ओर से उज्जवला योजना के तहत गैस सिलेंडर तो दिया गया है. लेकिन भरा नहीं सकते. क्योंकि मानदेय मिला नहीं है.

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मानदेय तो कर्ज में चला जाता है. पांच माह से गैस सिलेंडर नहीं भरा है. पत्नी लकड़ी और कोयला जलाती है. स्थिति तो यहां तक आ जाती है कि कभी-कभार जंगल से लकड़ी काट कर बेचना पड़ता है. जिससे भी सौ-दो-सौ कमाई हो जाती है.

ईंट-बालू के भरोसे भी बैठा नहीं जा सकता है. क्योंकि हमेशा लोग इसे ले इसकी गारंटी नहीं. बच्चों की फीस तो दूर री-एडमिशन तक नहीं कराएं है. साल 2016-17 का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि सरकार ने इन दिनों यूनिफॉर्म पहनने का आदेश जारी किया.

जिसे कमीशन और लकड़ी बेचकर खरीदा था. वहीं मोबाइल रखने का भी आदेश दिया गया था, जिसे भी लकड़ी और बकरी बेचकर ही खरीदा गया.

उन्होंने खीज खाते हुए कहा कि सरकार आदेश जारी कर देती है, लेकिन पारा शिक्षकों के स्थिति को नहीं देखती. हमारा भी परिवार है, अपने बच्चों का पेट काटकर हम कैसे समाज में अच्छी स्थिति बनाएं.

उधार में चल रहा आंगनबाड़ी केंद्र

अपनी पत्नी का जिक्र करते हुए इन्होंने कहा कि इनकी पत्नी आंगनबाड़ी केंद्र चलाती है. लेकिन दुर्भाग्य से इनकी पत्नी को भी पिछले चार माह से मानदेय नहीं मिला है. केंद्र चलाने के लिए सरकार की ओर से जो पैसे दिए जाते हैं, वो भी समय से नहीं मिलता.

आये दिन पत्नी बताती है. पिछले चार माह से तो आंगनबाड़ी केंद्र भी उधार में चल रहा. सरकार ने केंद्र चलाने तक के लिए पैसा नहीं दिया है. ऐसे में पत्नी को जो मानदेय मिलेगा, वो भी उधार कर्ज में ही जाएगा.

उन्होंने कहा कि जब से मानदेय नहीं मिला है तब से तो बिजली बिल तक नहीं दिया है. ऐसे में परिवार की जरूरत क्या पूरी करेंगे. सोचते है कि बच्चों को अच्छा कल दें, लेकिन महंगाई ये संभव नहीं है.

बकरी और लकड़ी बेचकर शादी समारोह में गये

शादी-विवाह का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि पिछले दिनों बकरी बेचकर शादी समारोह में लेन देन किया. निमंत्रण अधिक थे. परिवार से ज्यादा लोग नहीं गये. ऐसे में एक-दो बार लकड़ी बेच कर भी निमंत्रण में उपहार दिया. क्योंकि कोई विकल्प नहीं था.

पिछले दो सालों में महिला समिति से तीस हजार तक का कर्ज हो गया है. गांव की ही बात है इसलिए महिला समिति की ओर से अभी कुछ कहा नहीं गया है. एक मुश्त मानदेय मिलता तो जरूरी उधार से छुटकारा मिलता.

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