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पारा शिक्षक और पंचायत स्वंय सेवक घर-घर जाकर कोस रहे #BJP को, रसोईया संयोजिका दबायेंगी नोटा

आंगनबाड़ी संघ ने कहा सरकार जैसा बोयी है वैसा ही काटेगी, पारा शिक्षकों और आंगनबाड़ी बहनों पर इस सरकार के काल में दो बार लाठियां बरसायी गयी

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Chhaya

Ranchi: पिछले पांच सालों में राज्य में शायद सबसे अधिक असंतोष देखा गया. असंतोष मानदेय पर काम करने वालें कर्मियों में रहा. इस दौरान काफी लंबे समय तक आंदोलन हुए. आंदोलन करने वालों में पारा शिक्षक, आंगनबाड़ी बहनें, पंचायत स्वयं सेवक, रसोईया संयोजिका के नाम पहले आते हैं.

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हालांकि पारा मेडिकल कर्मी, एएनएम, जीएनएम, नर्सें, पंचायत सचिव, प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षक आदि भी शामिल हैं. लेकिन बीजेपी के पिछले पांच साल के शासन काल में सबसे अधिक पारा शिक्षकों, रसोईया कर्मियों और आंगनबाड़ी बहनों पर प्रशासन की लाठी बरसी.

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लेकिन मुख्यमंत्री की ओर से इनके लिये एक शब्द नहीं निकले. अब राज्य में फिर से चुनाव हो रहे हैं. अपने लंबे-लंबे आंदोलन के क्रम में इन्हें सिर्फ आश्वासन मिलें. सितंबर माह के आखिरी दिनों में भी इन संघों की ओर से आंदोलन किया गया. लेकिन आश्वासन देकर इनके आंदोलन को शांत किया गया. नतीजा यही रहा कि अब अलग-अलग संघों के बैनर तले ये मानदेय कर्मी सरकार के खिलाफ योजना तैयार कर रहे हैं.

कुछ ग्राम और घर स्तर पर भाजपा और आजसू को वोट न देने की रणनीति बना रहे हैं तो कुछ सीटों को छोड़ नोटा दबाने की योजना बनायें है. पढ़िये किनकी क्या रणनीति है.

इस सरकार के काल में पारा शिक्षकों पर दो बार बरसी लाठियां, कैसे दें वोट

पिछले पांच सालों में दो बार पारा शिक्षकों पर लाठियां बरसायी गयी. 26 सिंतबर 2016 और 15 नवंबर 2018. लाठीचार्ज में सैकड़ों पारा शिक्षक घायल हुए. वहीं साल 2018 में 15 नवंबर से 17 जनवरी 2019 तक के आंदोलन के क्रम में लगभग 29 पारा शिक्षकों की मौत हो गयी.

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नियमावली, स्थायीकरण की मांग को लेकर पारा शिक्षकों ने कई लंबे आंदोलन किये. अब एकीकृत पारा शिक्षक संघर्ष मोर्चा के सदस्य मनोज यादव ने बताया कि पारा शिक्षकों में आक्रोश अधिक है. गांव स्तर पर अभियान चलाया जा रहा है. जिनमें सीधे तौर पर भाजपा का विरोध करने की अपील की जा रही है.

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यहां तक की ग्रामीणों से भी भाजपा को वोट नहीं देने की अपील की जा रही है. इस कार्यक्रम से पठन-पाठन प्रभावित नहीं है. छुट्टियों के दिनों में अभियान चलाया जा रहा है. पारा शिक्षकों से 17 जनवरी 2019 को मुख्यमंत्री ने वार्ता की थी. जिसमें 90 दिनों के भीतर नियमावली बनाने की बात की थी.

लेकिन पिछले माह शिक्षा विभाग की ओर से जारी नियमावली में पारा शिक्षकों के स्थायीकरण को नकार दिया गया. इससे पारा शिक्षकों में काफी आक्रोश है. कुछ पारा शिक्षकों ने बताया कि ग्राम स्तर के पारा शिक्षकों में इस सरकार के लिये काफी आक्रोश है. राज्य में इनकी संख्या 67 हजार है.

सरकार ने जैसा बोया है वैसा ही काटेगी, लोकतंत्र सबके लिये: आंगनबाड़ी संघ

पिछले पांच सालों में दो बार आंगनबाड़ी बहनों पर भी लाठीचार्ज किया गया. 9 अगस्त 2018 और 24 सिंतबर 2019 को. 24 सिंतबर के लाठीचार्ज में सात सेविकायें घायल हुई. वहीं इस साल आंदोलन के क्रम में 12 सिंतबर को प्रधानमंत्री से मिलने जा रही आंगनबाड़ी बहनों को थाना में बैठाया गया. 12 सिंतबर को राज्य में प्रधानमंत्री का कार्यक्रम था.

झारखंड प्रदेश आंगनबाड़ी वर्कर्स यूनियन के कार्यकारी अध्यक्ष बालमुकूंद सिन्हा ने कहा कि इस चुनाव में स्पष्ट है कि सरकार ने जैसा बोया है, वैसा ही काटेगी. सिन्हा ने कहा कि इसके पहले कभी आंगनबाड़ी बहनों पर लाठीचार्ज नहीं हुआ था.

काफी लंबे समय तक महिलाओं ने आंदोलन किया. लेकिन सरकार की ओर से इस पर कोई पहल नहीं की गयी. हालांकि संघ की ओर से किसी भी आंगनबाड़ी सेविका, सहायिका को किसी एक पक्ष में मतदान करने की बात नहीं की गयी है. लेकिन आक्रोश सबमें है. सरकार ने महिलाओं पर लाठीचार्ज किया.

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र सबके लिये है. लोकसभा चुनाव के वक्त स्थिति कुछ और थी. लेकिन अब तो स्पष्ट है कि सरकार जैसा की है, खामियाजा भुगतना होगा. गौरतलब है कि राज्य में आंगनबाड़ी संघ के आंदोलन के बाद 30 अक्टूबर को कैबिनेट की ओर से पांच सौ रूपये सेविकाओं और 250 रूपये सहायिकाओं के बढ़ाये गये. लेकिन इससे संघ असंतुष्ट है.

इनकी प्रमुख मांग न्यूनतम मजदूरी है. फिलहाल सेविकाओं को 5900 रुपये मिलते हैं,जो कैबिनेट से बढ़ने के बाद 6400 और सहायिकाओं को 2950 की जगह 3200 रुपये हो गये. संघ की ओर से 21 अगस्त से लगभग 45 दिनों तक आंदोलन किया गया. साल 2018 में भी 32 दिनों तक आंदोलन किया गया था. राज्य में इनकी संख्या लगभग 88 हजार है.

बीजेपी-आजसू किसी के पक्ष में नहीं पंचायत स्वयं सेवक

पंचायत स्वयं सेवकों की नियुक्ति ही भाजपा के शासन काल में 2016 में की गयी. प्रोत्साहन राशि के एवज में इन्हें सेवा देनी होती है. इस साल 19 सिंतबर से संघ की ओर से सात दिनों तक हड़ताल की गयी. मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव सुनील वर्णवाल के साथ वार्ता के बाद स्वयं सेवकों ने आंदोलन समाप्त किया गया.

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इसमें उन्हें आश्वासन दिया गया कि आचार संहिता के पहले इनकी कुछ मांगें पूरी कर ली जायेगी. इसमें, इनके लिये मॉनिटरिंग सेल का गठन प्रमुख था. लेकिन ग्रामीण विकास विभाग की ओर से ऐसा नहीं किया. वहीं पिछले दो साल से अधिक समय से सरकार के पास इनकी प्रोत्साहन राशि बाकी है.

अन्य मांगों में प्रोत्साहन राशि को मानदेय में तबदील करना है. इसके पहले जनवरी माह में भी स्वयं सेवकों ने लंबा आंदोलन किया था. बार-बार के आश्वासन के बाद अब पंचायत स्वयं सेवक डोर-टू-डोर अभियान चला रहे है.

संघ के अध्यक्ष चंद्रदीप कुमार ने बताया कि संघ की ओर से अभियान चलाया जा रहा है. इसकी रणनीति हर जिला में बना ली गयी है. गांव और प्रखंड स्तर पर स्वयं सेवक भाजपा और आजसू के खिलाफ वोट देने के लिये लोगों से अपील कर रहे हैं. चंद्रदीप ने कहा कि इसी सरकार ने हमारी नियुक्ति की.

प्रोत्साहन राशि के नाम पर दस से 1200 रूपये मिलते हैं. सरकार इतना भी नहीं दें पायी. भाजपा और आजसू दोनों का साथ इस चुनाव में पंचायत स्वयं सेवक नहीं देने वाले. बता दें कि इन पंचायत स्वंय सेवकों की संख्या 18 हजार है.

तीन विधानसभा छोड़ रसोईया करेंगी नोटा का प्रयोग

झाररखंड प्रदेश रसोईया संयोजिका अध्यक्ष संघ के अध्यक्ष अजीत प्रजापति ने कहा कि संघ की ओर से इस चुनाव के लिये रणनीति बना ली गयी है. तीन विधानसभा क्षेत्र को छोड़ बाकी सभी जगह रसोईया संयोजिका नोटा का प्रयोग करेंगी.

जिन तीन विधानसभा क्षेत्रों में रसोईया संघ नोटा नहीं दबायेंगे, उनमें बड़कागांव विधायक निर्मला देवी, राजधनवार से राजकुमार यादव और डुमरी से जगरन्नाथ महतो के विस क्षेत्र हैं. अजीत ने बताया कि तीनों विधायकों ने हमारी मांगों को सदन में उठाया, बाकी किसी ने भी चाहे वो सत्ता पक्ष हो या विपक्ष ने हमारी मांगों को तरजीह नहीं दी.

ऐसे में इन तीन क्षेत्रों को छोड़ बाकी सभी जगह नोटा का प्रयोग किया जायेगा. सिर्फ रसोईया ही नहीं, इनके परिवार के सदस्य भी ऐसा ही करेंगे. उन्होंने बताया कि इसके लिये आने वाले दिनों से घर-घर जाकर अभियान चलाया जायेगा और 24 नवंबर को गुमला में इसके लिये बैठक भी रखी गयी है.

संघ की ओर से पिछले साल 10 सिंतबर से 14 नवंबर तक आंदोलन किया गया. जिसमें पारा शिक्षकों के साथ इन पर भी लाठी बरसायी गयी. यहां तक की प्रशासन की ओर से इनका टेंट आदि भी उखाड़ दिया गया था.

जिसके बाद महिलाओं ने आंदोलन समाप्त किया. 19 सिंतबर 2019 से फिर से आंदोलन शुरू हुआ जो 27 सिंतबर को सीएम के प्रधान सचिव सुनील वर्णवाल से वार्ता के साथ समाप्त हुआ. इनकी संख्या दो लाख 47 हजार है.

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