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पालकी ढोये कोय, दूल्हा त नीतीशे कुमार…

Gyan Ranjan

Ranchi : बिहार में मंगलवार को बड़ा सियासी उलटफेर हुआ. नीतीश कुमार ने बीजेपी से अलग होकर राजद, कांग्रेस, वाम दलों के साथ मिल कर सरकार बनाने का दावा राज्यपाल के समक्ष पेश कर दिया है. यह दूसरा मौका है, जब नीतीश कुमार ने अपने पुराने सहयोगी बीजेपी से नाता तोड़ा है. इससे पहले नीतीश कुमार 2013 में बीजेपी से अलग हुए थे. हालांकि, 2017 में वे महागठबंधन का साथ छोड़ कर बीजेपी के साथ आ गये थे. राज्यपाल के पास नीतीश कुमार ने 160 विधायकों के समर्थन का पत्र सौंपा है. जाहिर है कि बिहार में अब जदयू, आरजेडी, कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियों के महागठबंधन वाली नयी सरकार होगी. हालांकि, इस बार भी सीएम नीतीश कुमार ही होंगे. तेजस्वी यादव डिप्टी सीएम बन सकते हैं. उन्होंने गृह मंत्रालय की भी मांग की है. बिहार की राजनीति में हुए उलटफेर का असर देश की राजनीति पर भी पड़ेगा. बिहार में फिर से सरकार पर नया लेबल चस्पा होने जा रहा है. अब एनडीए के बजाए महागठबंधन की सरकार बनेगी. कुछ महीनों पहले तक जो तेल-पानी की तरह धुर राजनीतिक विरोधी थे, कुछ हफ्ते पहले उनके तेवर नरम दिखे और अब तो घी-खिचड़ी जैसे हो गये हैं. नीतीश कुमार के एक बार फिर पलटी मारने के बाद बिहार के राजनीतिक गलियारे में यह चर्चा आम है कि भाजपा- राजद- कांग्रेस ढोते रहे पालकी, दूल्हा त “नितिशे कुमार” रहेंगे.

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8वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने को तैयार नीतीश कुमार

नीतीश कुमार आठवीं बार बिहार के मुख्यथमंत्री पद की शपथ लेने के लिए तैयार हैं. यह अपने आप में एक रिकार्ड है. इस रिकार्ड के साथ और भी कई रिकार्ड और अनोखी चीजें जुड़ी हैं. केवल पांच चुनाव जीत कर ही नीतीश कुमार आठवीं बार सीएम बनने जा रहे हैं. दरअसल, 2010 के विधानसभा चुनाव के बाद से अब तक हर बार नीतीश कुमार कार्यकाल के बीच में ही इस्तीफा देते रहे हैं और दोबारा मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते रहे हैं. ऐसा अब लगातार तीसरी बार होने जा रहा है. बतौर मुख्यमंत्री केवल दो चुनावों के बाद उन्होंने अपना गठबंधन सहयोगी नहीं बदला था.

नीतीश कुमार ने पिछले 2010, 2015 और 2020 के विधानसभा चुनाव के बाद कार्यकाल पूरा होने से पहले ही अपना गठबंधन साथी बदल लिया, हालांकि मुख्यमंत्री की कुर्सी पर वह लगातार काबिज रहे. 2010 के चुनाव तक नीतीश कुमार, भाजपा के सहयोगी रहे. 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की ओर से नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मी दवार बनाये जाने के बाद उन्होंने भाजपा से नाता तोड़ लिया. 2015 तक जदयू की सरकार राजद के बाहर से मिल रहे समर्थन की बदौलत चली. 2014 के लोकसभा चुनाव में जदयू की करारी हार के बाद नीतीश कुमार ने सीएम पद से इस्तीफा देकर सीएम की कुर्सी अपनी ही पार्टी के जीतन राम मांझी को सौंप दी. हालांकि एक साल के अंदर नीतीश कुमार ने फिर से मुख्यमंत्री पद की शपथ ली.

2015 में राजद-कांग्रेस की मिली पालकी तो 2020 में भाजपा की

2015 में नीतीश कुमार की पार्टी जदयू अपने इतिहास में पहली बार राजद और कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ी, जीती और सरकार बनायी. नीतीश कुमार फिर से मुख्यमंत्री बने. जदयू और राजद का गठबंधन विधानसभा का कार्यकाल पूरा होने तक नहीं चल पायी. नीतीश कुमार ने सीएम पद से इस्तीफा देकर फिर से भाजपा का समर्थन लेकर सरकार बनायी. 2020 का चुनाव नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ लड़ा. 2022 में इतिहास फिर से दोहराया गया. अब नीतीश कुमार भाजपा का साथ छोड़कर राजद और कांग्रेस की मदद से सरकार बनाने जा रहे हैं.

2000 में पहली बार सीएम बने थे नीतीश

नीतीश कुमार वर्ष 2000 में पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने थे. यह सरकार केवल सात दिनों तक ही चली. नीतीश कुमार विश्वास मत हासिल नहीं कर पाये. दूसरी बार 2005 के विधानसभा चुनाव के बाद नीतीश कुमार के सामने सीएम बनने का मौका था. लेकिन, तब लालू यादव के दबाव में तत्कालीन राज्य पाल बूटा सिंह की अनुशंसा पर बिहार में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया. तब लालू यादव केंद्र सरकार में अहम किरदार थे. इसी साल छह महीने के अंतराल पर दोबारा चुनाव हुए और नीतीश कुमार को मुख्य मंत्री बनने का मौका मिला.

अपने बूते कभी नीतीश को बिहार में नहीं मिला बहुमत

नीतीश कुमार राजनीति के बड़े चेहरे हैं इससे इनकार नहीं किया जा सकता लेकिन यह भी कटु सत्य है कि अपने बूते उन्हें कभी भी बिहार में सरकार बनाने का बहुमत नहीं मिला. नीतीश की पार्टी जदयू का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन वर्ष 2010 के चुनाव में हुआ था जब उनकी पार्टी को 115 सीटें मिली थीं. लेकिन उस समय भी सरकार भाजपा के सहयोग से ही बनी थी. नीतीश कुमार वर्ष 2000 में पहली बार भाजपा के समर्थन से सीम बने थे. इसके बाद 2005 और 2010 में भी भाजपा ही नीतीश की पालकी ढो रही थी. 2015 में कांग्रेस, राजद के कंधे पर नीतीश की पालकी थी. 2017 में भाजपा ने दूल्हा नीतीश की पालकी कांग्रेस और राजद से झपट कर अपने कंधे पर ले लिया. जो 2020 के चुनाव परिणाम के बाद भी जारी रहा. लेकिन वर्ष 2017 में जो काम भाजपा ने किया था वही काम आज राजद- कांग्रेस और वामदलों ने किया. भाजपा को हटा कर नीतीश की पालकी अपने कांधे ले ली. अब देखना दिलचस्प होगा कि यह मेलमिलाप कितना स्थायी होता है.

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