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पलामू: 37 साल से बंद पड़ी सोकरा ग्रेफाइट माइंस क्या फिर से चालू होगी? या है चुनावी लॉलीपॉप

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Dilip Kumar

Palamu: चुनावी साल में वोट बटोरने के लिए कई योजनाओं का लॉलीपॉप झारखंड सरकार दिखा रही है. योजनाएं ऐसी हैं, जो लंबे समय से लंबित पड़ी हैं, लेकिन उन्हें पहले पूरा नहीं किया गया. और अब विधानसभा चुनाव से कुछ माह पहले पूरा करने का दावा किया जा रहा है.

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर भी नहीं हुआ भुगतान

झारखंड के पलामू जिला अंतर्गत चैनपुर के सोकरा ग्रेफाइट माइंस को लेकर सरकार की मंशा चुनावी दिखती है. सोकरा ग्रेफाइट माइंस पिछले 37 वर्ष से बंद पड़ी है. 455 मजदूरों की मजदूरी का करीब 1 करोड़ 27 लाख रुपया बकाया है.

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सुप्रीम कोर्ट 1990 में ही मजदूरी भुगतान का निर्देश दे चुकी है, लेकिन बिहार के बाद अब झारखंड सरकार ने इसे 19 वर्ष से लटका कर रखा है.

जूलॉजी विभाग के अधिकारियों ने जांची माइंस की स्थिति

झारखंड खान मजदूर सभा द्वारा लंबे समय से रांची में राजभवन के समक्ष आन्दोलन चलाने के बाद सरकार की नींद चुनाव से पहले खुली है.

डालटनगंज के विधायक आलोक चौरसिया के नेतृत्व में जूलॉजी विभाग के अधिकारियों और सर्वेयर ने माइंस की स्थिति जांची. पता लगाने की कोशिश की कि माइंस परिसर में कितना ग्रेफाइट बचा है.

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उत्खनन कैसे किया जा सकता है. टीम में जूलॉजी विभाग के डिप्टी डायरेक्टर वीके ओझा और शारदा सिन्हा, सहायक निदेशक रत्नेश सिन्हा, राजेश पाठक के अलावा सर्वेयर राजेन्द्र उरांव, अबु हुसैन, विपिन गुड़िया एवं अन्य थे.

सोकरा माइंस में है तीन मिलियन टन ग्रेफाइट

सोकरा माइंस में तीन मिलियन टन ग्रेफाइट भरा पड़ा है. इस क्षेत्र में गुणवत्तापूर्ण ग्रेफाइट पाये जाने के कारण एशिया भर में इसका महत्व है.

1957 में 257 एकड़ और 1974 में 723 एकड़ जमीन लीज पर दी गयी. क्षेत्र के ग्रेफाइट में कार्बन की मात्रा लगभग 80 से 85 प्रतिशत है.

इस क्षेत्र में खनन से न सिर्फ हजारों मजदूरों को रोजगार मिलेगा, बल्कि राज्य में भी समृद्धि आयेगी.

105 दिनों तक आन्दोलन करने के बाद सरकार ने सुनी फरियाद

झारखंड खान मजदूर सभा के अध्यक्ष शंखनाथ सिंह ने बताया कि राजभवन के समक्ष इस वर्ष 105 दिनों तक आन्दोलन किया गया. अंततः सरकार की नींद टूटी.

मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव सुनील कुमार बर्णवाल ने जल्द कार्रवाई का भरोसा दिलाते हुए आन्दोलन समाप्त कराया. विधायक आलोक चौरसिया ने मजदूरों के साथ प्रधान सचिव को ज्ञापन भी सौंपा.

शंखनाथ सिंह ने कहा कि माइंस को लेकर सरकार इन दिनों सक्रियता दिखा रही है. लेकिन यह चुनावी साबित हुआ तो मजदूरों के साथ बड़ा धोखा हो सकता है.

चुनाव होने के ठीक पहले इस तरह का निर्णय कुछ इसी तरह इशारा करता है, लेकिन अगर माइंस खुल जाये तो मजदूरों और ग्रामीणों को काफी फायदा होगा.

5 अक्टूबर को मजदूर-ग्रामीण करेंगे बैठक

झारखंड खान मजदूर सभा के अध्यक्ष शंखनाथ सिंह ने बताया माइंस के चालू होने की जानकारी पर मजदूर और ग्रामीणों में हर्ष है.

5 अक्टूबर को इस सिलसिले में चांदो हाइस्कूल के मैदान में बैठक होगी. बैठक में सभी मुद्दों पर चर्चा की जायेगी. अगर 10 से 15 दिनों के भीतर माइंस चालू होने की संभावना नहीं दिखती तो बड़ा निर्णय लिया जा सकता है.

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वोट बहिष्कार कर सकते हैं ग्रामीण

झारखंड खान मजदूर सभा के अध्यक्ष शंखनाथ सिंह ने कहा कि सरकार के आश्वासन पर उनका आन्दोलन स्थगित हुआ है. सरकार अगर अपने निर्णय से पलट जाती है तो पुनः आन्दोलन तेज किया जायेगा.

यह भी बताया कि अगर माइंस नहीं खुली तो आगामी विधानसभा चुनाव में वोट बहिष्कार किया जायेगा. चांदो सहित आस-पास के ग्रामीण वोट नहीं देंगे.

1982 से 1992 तक अवैध तरीके से होता रहा खनन

मजदूरों से बात करने से जानकारी हुई कि साल 1982 में इन मजदूरों की छंटनी के बाद लगभग 1992 तक माइंस में अवैध खनन होता रहा. लीजधारक कुमार ब्रदर्स एंड कंपनी की ओर से इस क्षेत्र को लीज पर लिया गया था.

कंपनी का खुद का सरकार के पास रायॅल्टी बकाया लगभग 21 लाख 85 हजार हो गया था. वहीं इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट का भी आदेश आ गया और सरकार को पैसा भुगतान करने का आदेश दिया गया. जिसके बाद कंपनी ने खनन कार्य बंद कर दिया.

हर बार आया मजदूरों के पक्ष में निर्णय

बता दें कि 455 मजदूरों की ओर से छंटनी का विरोध करने पर कुमार ब्रदर्स एंड कंपनी के मालिक गुप्तेश्वर प्रसाद सिंह की ओर से हाइकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक वाद दायर किया गया. लेकिन निर्णय सभी जगह से मजूदरों के पक्ष ही आया. बावजूद इसके मजदूरों को उनका हक-अधिकार अबतक नहीं मिला.

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क्यों बंद हुई थी माइंस?

झारखंड खान मजदूर सभा के अध्यक्ष शंखनाथ सिंह ने बताया कि वर्ष 1982 में माइंस चल रही थी. कंपनी बरसात में मजदूरों को पैसे देने में खूब मनमानी करती थी.

इसी बीच जब मजदूरों ने इसका विरोध किया तो कंपनी द्वारा 445 मजदूरों की अवैध छंटनी कर दी गयी. मामले को लेकर रांची में पंचायती हुई.

14 नवम्बर 1982 को कंपनी ने मजदूरी भुगतान के बहाने छंटनीग्रस्त मजदूरों को माइंस परिसर में बुलाया और उन पर फायरिंग शुरू करवा दी. इससे भगदड़ मच गयी. दो मजदूरों को गोली लगी.

सारे मजदूर किसी तरह चैनपुर थाना पहुंचे. मामले की जानकारी दी. इसमें कई कर्मियों को जेल भेजा गया. इसके बाद से माइंस बंद है.

2014 में एक करोड़ 27 लाख की राशि स्वीकृत

साल 2014 में इन मजदूरों के लिए एक करोड़ 27 लाख रुपये राशि की स्वीकृति दी गयी. लेकिन चुनाव के बाद फिर से ये राशि पड़ी की पड़ी रह गयी.

कई बार इन मजदूरों ने श्रम मंत्री राज पालिवार से मिल कर अपनी समस्याएं बतायीं. मंत्री ने कई बार आश्वासन दिया कि मजदूरों के बकाया राशि का भुगतान कर दिया जायेगा.

जल्द खुलेगी माइंस: विधायक

इस संबंध में विधायक अलोक कुमार चौरसिया ने कहा कि माइंस खोलने की प्रक्रिया तेज कर दी गयी है. लीज प्राइवेट कंपनी ने लिया था, ऐसे में सरकार मजदूरों को पैसा नहीं दे सकती. हां, उक्त कंपनी पर कार्रवाई करना सरकार का दायित्व है.

फिलहाल तैयारी यही है कि सोकरा ग्रेफाइट माइंस खोला जाये, क्योंकि इससे मजदूरों को रोजगार मिलेगा. बैठकें भी कई हुई हैं. जूलॉजी विभाग के अधिकारियों और सर्वेयर ने उनके साथ माइंस की स्थिति देख ली है.

सब कुछ ठीक ठाक रहा तो जल्द उत्खनन शुरू करा दिया जायेगा. माइंस के अंदरवाले हिस्से में बरसात का पानी भरा है, लेकिन बाहर के क्षेत्रों में खनन का कार्य किया जा सकता है.

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