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पलामू: करगिल शहीद युगंबर दीक्षित को अपनी ड्यूटी के दौरान नम आंखों से किया था सैल्यूट

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Palamu: करगिल युद्ध को शुक्रवार (26 जुलाई) को 20 साल पूरे हो गए. युद्ध के दौरान अपने अदम्य साहस व बहादुरी से दुश्मनों के छक्के छुड़ा देने वाले शहीद जवानों को श्रद्धांजलि दी जा रही है.

पलामू के धरती पुत्र शहीद युगम्बर दीक्षित भी युद्ध के दौरान शहीद हुए थे. उनकी शहादत में कई कार्यक्रम आयोजित किये गये. उनके साथ सीमा पर दुश्मनों से लोहा लेने वाले कर्नल संजय सिंह पलामू के ही रहने वाले हैं. ड्यूटी के दौरान कर्नल संजय ने शहीद युगम्बर दीक्षित को नम आंखों से सैल्यूट किया था.

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करगिल युद्ध की कहानी कर्नल संजय सिंह की जुबानी

कर्नल सिंह ने कहा कि ज्यों-ज्यों कारगिल विजय दिवस नजदीक आने लगता है. वो सारे रोंगटे खड़े कर देने वाले शहीदों का तिरंगा में लिपटा हुआ पार्थिव शरीर नजर आता है. उसमें पलामू के रहने वाले युगम्बर दीक्षित भी थे, उन्हें मैंने अपने हाथों से तिरंगा लपेटा. कॉफिन में पैक किया और नम आंखों से सैल्यूट किया था.

करगिल युद्ध की जानकारी देते हुए कर्नल बताते हैं कि सेना में पांच वर्ष की सर्विस पूरी करने के बाद मैं दिल्ली के एक यूनिट में पोस्टेड था.

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तब दस चुनिंदे कैप्टन को लॉजिस्टिक मैनेजमेंट स्किल के आधार पर भारतीय सेना ने इन्हें इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन मुंबई में छह महीने का ऑफिसर्स पेट्रोलियम मैनेजमेंट में दक्षता के लिए भेजा था.

जिसमे से मैं भी एक था. हमारा ये कोर्स समाप्त होने में तकरीबन पंद्रह दिन बचा था. तभी कैप्टन अमरजीत वासदेव ने टी ब्रेक में चाय की चुस्की लेते हुए एक बात छेड़ी. ‘लगता है हम सभी को जल्द ही यूनिट जाना होगा, पाक बॉर्डर पर कुछ टेंशन का माहौल है, आज कमांडर का फोन आया था. बताये कि कोर्स छोड़ो जल्द यूनिट पहुंचो.’

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हम सभी समझे ये, यूं ही मजाकिया गप है. अभी तो पंद्रह दिन और है कोर्स समाप्त होने में. तभी टीवी पर जॉर्ज फर्नांडिस का बयान आ रहा था कि कुछ मुठ्ठी भर घुसपैठिये हमारे पोस्टों में घुस गए हैं. हम इन्हें एक सप्ताह में भगा देंगे.

सच और अफवाह के बीच इसी तरह से शाम हुई और हमारे ऑफिसर्स मेस में चीफ इंस्ट्रक्टर कर्नल दीपक कपूर ने सभी को बुलाकर बोला ‘टुमौरो मॉर्निंग यू आर गोइंग बैक टू यू यूनिट योर रिक्वायरमेंट इज मोर इन यूनिट लोकेशन योर कोर्स इज टर्मिनेटेड.’

दूसरे दिन सुबह ही जिसको जैसी सुविधा हुई, हवाई जहाज, ट्रेन के माध्यम से हम लोगों ने अपने-अपनी यूनिट में रिपोर्ट किया. क्योंकि मेरी यूनिट दिल्ली में थी, आते के साथ में हमारे कमांडर ब्रिगेडियर पी के मेहता ने मुझे बताया कि कल सुबह की स्पेशल फ्लाइट से मुझे लेह जाना है. युद्ध की स्थिति बन चुकी थी देश ने. मन बन चुका था पाकिस्तान को सबक सिखाने को.

अहले सुबह पालम एयरपोर्ट पर जब पहुंचा तो शारीरिक रूप से स्वस्थ्य सभी पदाधिकारी जिन्हें सेप वन केटेगरी कहा जाता है, कारगिल में अपने-अपने पैरेंट यूनिट में जाने को बेताब दिखे. भारतीय वायु सेना का आइएल 76 हवाई जहाज में हम सभी कॉम्बैट ड्रैस में तकरीबन एक बजे लेह लैंड किये.

हमें वहां पर कारगिल के पास में द्रास नामक सेना मुख्यालय में पहुंचना था. जहां पर आगे का दायित्व दिया जाना था, तब तक टाइगर हिल पर आक्रमण शुरू हो चुका था क्योंकि दुश्मन पहाड़ के शीर्ष पर बैठा था, इसलिए हमें दस गुनी ज्यादा शक्ति से आक्रमण करना था.

शहीदों की पार्थिव शरीर तेजी से आना प्रारम्भ हो चुका था. उधर, पूरे देश मे शहीदों की खून से टीवी और समाचार पत्र रंगे हुए थे.

शहीद के पार्थिव शरीर को पहुंचना बड़ी चुनौती थी

उसी समय भारतीय सेना के लिए शहीद के पार्थिव शरीर को उनके परिजनों तक पहुंचना एक बहुत बड़ी चुनौती बन चुकी थी. उन्हें एक ऐसे पदाधिकारी की तलाश थी, जो दिल्ली में पोस्टेड रहा है और शहीद के परिजनों तक उनके पार्थिव शरीर को सैनिक सम्मान के साथ भेजवा सके.

सेना मुख्यालय से मेरी ड्यूटी दिल्ली में लगा दी गई. जहां मुझे कारगिल से दिल्ली शहीदों का पार्थिव शरीर को उनके परिजनों तक सैनिक रीति-रिवाज से शोक शस्त्र और रीथ लेआउट करके कॉफिन में पैक कर उसके आसपास के सैनिक को हैंडओवर कर के वहां जानेवाले हवाई जहाज या रोड के माध्यम से भेजवाना था.

फिर वहां के नजदीकी आर्मी, एयरफोर्स या नेवी बेस को उस शहीद को सम्मान देते हुए उनके परिजनों को सौंपने का निर्देश देना, ताकि किसी की भावना को ठेस न पहंचे. हर दिन पूरे भारत वर्ष के हर राज्य, हर भाषा, हर धर्म के शहीद के पार्थिव शरीर देखते के साथ राष्ट्रीय भावना और देशभक्ति का जोश कभी कभी मजबूर कर देता था.

सेना के प्रति कैसे बढ़ा आकर्षण  

पलामू के एक छोटे से शहर मेदिनीनगर से निकल कर भारतीय सेना में पदाधिकारी बनना मेरी जिंदगी की सबसे अहम उपलब्धि रही. सपने को हकीकत में परिणत होने के सुख की अनुभूति अद्भुत ही होती है. ये सपना मैंने 1984 में तब संजो लिया था.

जब तात्कालिक प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद मेदिनीनगर में हिंसात्मक झड़प को नियंत्रण करने हेतु कर्फ्यू लगा दिया गया था और शहर की कानून व्यवस्था की जिम्मेवारी रांची से आये हुए एक आर्मी बटालियन को दी गई थी.

मेरे पिताजी जिस बालक बुनियादी विद्यालय नवाटोली, (मेदिनीनगर) के प्रधानाध्यापक थे. उसी विद्यालय में ये आर्मी बटालियन कैम्प की थी.

प्रधानाध्यापक आवास में ही मैं पिताजी के साथ रहता था और उसी समय सेना की कार्यपद्धति और सैनिकों में अपने पदाधिकारी और अपने प्रोफेशन के प्रति वफादारी देख मेरे मन में सेना पदाधिकारी बनने की इच्छा जागृत हो गई और मैं यूपीएससी के सीडीएस कम्पीटिशन के माध्यम से ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकैडमी चेन्नई में प्रशिक्षण प्राप्त कर सेना में पदाधिकारी बन गया.

SP Deoghar

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