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पलामू : 75 लाख के इनामी संदीप यादव से पलामू एसपी चंदन सिन्हा की हुई थी दो बार मुठभेड़, 2003 में बोला करती थी तूती

Palamu : बिहार के गया में 75 लाख के इनामी भाकपा माओवादी के शीर्ष नेताओं में से एक संदीप यादव (55) की संदिग्ध मौत हो गयी है. संदीप पर झारखंड सरकार ने 50 लाख तो बिहार सरकार ने 25 लाख का इनाम रखा था. बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा और आंध्र प्रदेश में उसकी दहशत थी. गया में 4 लोगों को फांसी देने के बाद वो हिट लिस्ट में था. संदीप के शव के हाथ-पैर बंधे हुए थे. उसकी मौत कैसे हुई ये अभी साफ नहीं हो पाया है. संदीप यादव के घर के पुरुष सदस्यों का कहना है कि मौत दवा के रिएक्शन की वजह से हुई. उसकी बॉडी परिवार के लोग देर रात घर पर लेकर आए.

संदीप के खिलाफ पलामू जिले में 30 मामले दर्ज हैं. 2000 के दशक में संदीप की पलामू में तूती बोला करती थी. पलामू के एसपी चंदन कुमार सिन्हा (उस समय अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी छतरपुर, कैंप हरिहरगंज) के साथ संदीप के दस्ते की दो बार मुठभेड़ हुई थी. वर्ष 2003 में जब बतौर एसडीपीओ चंदन सिन्हा की पलामू में पोस्टिंग हुई थी तो संदीप का क्षेत्र में बड़ा ही आतंक था.

वह व्यवसायियों के अपहरण, पुलिसकर्मियों की हत्या, समाज के अनेक गणमान्य व्यक्तियों की हत्या कर क्षेत्र में अपना आतंक फैलाये हुआ था. तत्कालीन एसडीपीओ चन्दन कुमार सिन्हा की टीम से उसकी जबरदस्त मुठभेड़ 26 नवंबर 2003 को सरसोंत के जंगलों में हुई थीं.

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एसडीपीओ सिन्हा को सूचना मिली कि संदीप अपने दस्ते के साथ, जिसमें नक्सलियों की संख्या करीब 100 के आसपास है, ग्राम अकौनी में मीटिंग कर रहा है. इस सूचना पर एसडीपीओ चन्दन सिन्हा, तत्कालीन पुलिस अधीक्षक नवीन कुमार सिंह को आसूचना से अवगत कराया और क्योंकि उस समय सीआरपीएफ का बल उपलब्ध नहीं था, तो एसडीपीओ ने नक्सल विरोधी ऑपरेशन चलाने के लिए बल की मांग की.

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उस समय हरिहरगंज थाने में पुलिस बल की संख्या करीब 14-15 होती थी और अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी के पास 10. तब पुलिस अधीक्षक के आदेश से जिले के विभिन्न थानों से कहीं से 4, कहीं से 5 बल मिला कर एसपी ने एसडीपीओ के पास भेजा गया और उस बल के पहुंचते-पहुंचते शाम हो गयी.

फिर उन सभी बल को मिलाकर एसडीपीओ चन्दन कुमार सिन्हा (वर्तमान पुलिस अधीक्षक) जिनकी (पुलिसकर्मियों) कुल संख्या करीब 35-40 थी, अकौनी की ओर चले. किंतु विलंब होने के चलते ग्राम सरसोत पहुंचने से पहले ही अंधेरा हो गया था. ग्राम सरसोत के ही रास्ते में नक्सलियों ने एसडीपीओ के दल को एंबुश करने का प्रयास किया एवं एसडीपीओ के बुलेट प्रूफ जिप्सी पर अंधाधुंध फायरिंग की.

अंधेरे में करीब 1 घंटे तक जबरदस्त मुठभेड़ हुई, लेकिन पुलिस के जांबाज जवानों ने ऐसी बहादुरी दिखाई कि नक्सली भाग खड़े हुए. 28 मई 2004 में भी एसडीपीओ चन्दन कुमार सिन्हा के नेतृत्व में पुलिस दल के साथ ग्राम कुल्हिया में संदीप के दस्ते से मुठभेड़ हुई थी, किंतु संदीप सौभाग्यवश उस दिन जिंदा बच गया था.

चन्दन कुमार सिन्हा के बाद पदस्थापित अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी नवीन कुमार सिन्हा के कार्यकाल में संदीप के नेतृत्व में नक्सलियों ने हरिहरगंज थाना और अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी आवास हरिहरगंज हमला किया था, जिसमें नक्सलियों की संख्या करीब 500 से ज्यादा थी किंतु पुलिस के हमले में जवाबी कार्रवाई में वे सफल नहीं हुए.

तत्कालीन एसडीपीओ चन्दन कुमार सिन्हा के द्वारा एसडीपीओ आवास हरिहरगंज (जिला परिषद का डाक बंगला) आवास में निर्मित मोर्चा एवं ट्रेंच ने उस हमले के दौरान पुलिस कर्मियों को मोर्चा में लेने काफी मदद की थी और उस मोर्चे और ट्रेंच की काफी बड़ाई  तत्कालीन पुलिस महानिदेशक ने की थी, जो पुलिस के पलाश मैगजीन में भी छपी थी.

बता दें कि संदीप यादव मूल रूप से गया जिले के बांकेबाजार प्रखंड के बाबू रामडीह गांव का रहने वाला था. वह कम उम्र से ही नक्सली संगठन से जुड़ गया था. जुड़ने के बाद उसने भाकपा माओवादी के बैनर तले एक से बढ़ कर एक दिल दहला देने वाली नक्सली वारदात को अंजाम दिया. वह अक्सर सीआरपीएफ और पुलिस बल पर ही हमला बोला करता था. उसके हमले में कई पुलिस वालों की जान जा चुकी थी.

पलामू के अलावा गढ़वा, लातेहार और चतरा जिले में भी मामले हैं. बिहार के गया जिले से लगे पलामू जिले के मनातू और नवडीहा बाजार प्रखंड में संदीप की काफी सक्रियता थी. इसका प्रभाव था.

 

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