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पलामू : प्रधानाध्यापक की अनूठी पहल, कोरोना के कारण स्कूलों में लटके हैं ताले,  तो शुरू कर दी टोला कक्षा  

 पलामू जिले में कई ऐसे भी बच्चे हैं, जिन्हें डिजिटल सुविधा के अभाव में शिक्षा नहीं मिल पा  रही है.

Palamu :  कोरोना संक्रमण के कारण पिछले छह माह से सरकारी स्कूलों में ताले लटके हुए हैं. ऐसे में जो सुविधा संपन्न बच्चे हैं, वे ऑनलाइन स्मार्ट मोबाइल के माध्यम से थोड़ा बहुत शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं, लेकिन पलामू जिले में कई ऐसे भी बच्चे हैं, जिन्हें डिजिटल सुविधा के अभाव में शिक्षा नहीं मिल पा  रही है. ऐसे बच्चों में मेदिनीनगर सदर प्रखंड के रजवाडीह मध्य विद्यालय में पढ़ने वाले केवालटोला के बच्चे भी शामिल हैं.

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विद्यालय बंद होने पर बंद हो गयी थी पढ़ाई

कोरोना संक्रमण के कारण जब रजवाडीह मध्य विद्यालय को बंद कर दिया गया और डिजिटल सुविधा से बच्चों को पढ़ाने की कोशिश की गयी तो केवालटोला के बच्चे शिक्षा से पूरी तरह वंचित हो गये. यहां के बच्चे काफी गरीब हैं और उनके पास स्मार्ट फोन खरीदने के पैसे नहीं है. पूरा दिन बच्चों का ऐसे ही बीत रहा था. डिजिटिल सुविधा से वर्कसीट बांटने गये विद्यालय के प्रधानाध्यापक परशुराम तिवारी को जब इस संबंध में जानकारी हुई तो उन्होंने इसमें पहल की.

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20 बच्चों को सप्ताह में दो दिन दी जाती है ऑफलाइन शिक्षा

प्रधानाध्यापक ने डिजिटल सुविधा से वंचित बच्चों को शिक्षा से जोड़े का प्रयास किया. अभिवंचित केवालटोला को केन्द्र बनाकर सप्ताह में दो दिन ‘टोला कक्षा’ संचालित की जा रही है. शेष दिनों में बच्चों को कार्यपुस्तिका के माध्यम से सक्रिय रखा जा रहा है. कक्षा के दौरान कोविड-19 के तहत हर दिशा निर्देश का पालन किया जाता है. अबतक 20 बच्चों को टोला कक्षा से जोड़ा जा चुका है.

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पहली पीढ़ी के बच्चे हो रहे शिक्षित

रजवाडीह मध्य विद्यालय से केवालटोला की दूरी 3 किलोमीटर है. यहां भुइयां जाति के लोग रहते हैं. बेहतर पढ़ायी होने के कारण केवालटोला सटे सरकारी विद्यालय में न पढ़कर यहां के बच्चे 3 किलोमीटर दूर रजवाडीह मध्य विद्यालय में जाते थे. यहां के 20 बच्चे भुइयां जाति की पहली पीढ़ी हैं, जो पढ़ायी कर रहे हैं. बच्चों के माता-पिता अंगूठा लगाते हैं.

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टोले में हैं मात्र दो स्मार्ट फोन

केवालटोला में मात्र दो स्मार्ट फोन है. टोले के सबसे अधिक पढ़े लिखे और पारा शिक्षक की नौकरी कर रहे दिलीप भुइयां और इसी टोले के एक युवक स्मार्ट फोन रखता है. शेष लोगों के पास स्मार्ट फोन नहीं है.  इस कार्य में प्रधानाध्यापक को पारा शिक्षक विजय कुमार ठाकुर की भरपूर मदद मिल रही है. शुरू में अभिभावकों को यह सब अटपटा लगता था, किन्तु अब वे इसके महत्व को समझने लगे हैं.

बच्चे अपने घर से बोरा लेकर ‘टोला कक्षा’ में पहुंचते हैं. प्रधानाध्यापक के लिए एक अलग से बोरा लाया जाता है. मास्टर जहां बोरे पर बैठकर पढ़ाते हैं, वहीं बच्चे पढ़ायी करते हैं. करीब ढाई घंटे की क्लास होती है. कभी कभी मन लगने पर अवधि तीन घंटे या इससे अधिक भी हो जाती है. कोरोना काॅल में अबतक 10वीं क्लास बच्चों की ली जा चुकी है.

पढ़ाई के साथ सुरक्षा का भी ख्याल

पढाई के साथ सफाई व सुरक्षा को बराबर का महत्व दिया जा रहा है. टोले में तीन स्पॉट फिक्स किये गये हैं. किरोना संक्रमण को देखते हुए स्पॉट बदल बदल कर पढ़ाई कराई जाती है. प्रधानाध्यापक द्वारा उन सबको मास्क दिया गया है. पढ़ाई शुरू करने से पूर्व बैठने की जगह पर झाड़ू लगाया जाता है. सबके हाथ सेनेटाइज किये जाते हैं. फिर पढ़ने-पढ़ाने की गतिविधि शुरू होती है.

क्यों की गयी पहल?

प्रधानाध्यापक श्री तिवारी ने बताया कि कोरोना काल में शिक्षा का माहौल बनाये रखना जंग लड़ने जैसा है. तमाम बाधाओं के बाद भी जंग जारी रहेगी. पिछले दिनों राज्य के शिक्षा मंत्री ने बेबीनार के जरिये चर्चा की थी कि डिजिटल सुविधा से वंचित बच्चों पर शिक्षक ध्यान दें. यह उनके दिमाग में चल रहा था. अक्सर नामांकित बच्चों को नियमित कराने के लिए विद्यालय के अंतर्गत आने वाले टोलों में जाया करता था.

डिजिटल वर्कसीट देने केवालटोला में जाने पर देखा कि बच्चों पूरी तरह शिक्षा से कट गये हैं. उन्होंने बच्चों और अभिभावकों से बात की और ‘टोला क्लास’ चलाने का निर्णय लिया. लगातार क्लास चलाने से बच्चों और उनके परिजनों में उत्साह है. बारिश होने पर अगले दिन ‘टोला क्लास’ लगायी जाती है.केवालटोला के बाद पास के साव टोला में भी ‘टोला क्लास’ लगाने की तैयारी की गयी है. यहां सप्ताह में एक दिन क्लास ली जायेगी.


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