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पलामू: पशु अस्पतालों को साधन संपन्न बनाने के सरकारी दावे फेल, नहीं हैं सुविधाएं, जीवन रक्षक दवाएं तक नहीं

Dilip Kumar

Palamu: पलामू जिला मुख्यालय मेदिनीनगर स्थित सरकारी पशु अस्पताल समस्याओं से जूझ रहा है. सरकारी तौर पर पशुपालन को बढ़ावा देने और पशुपालकों की सुविधा को ध्यान में रख कर पशु अस्पतालों को साधन संपन्न कराने का दावा पलामू में फेल होता नजर आ रहा है. न यहां 24 घंटे डॉक्टर उपलब्ध हैं और न ही स्वास्थ्यकर्मी. यहां तक कि इस पशु अस्पताल में एक भी जीवन रक्षक दवाएं उपलब्ध नहीं हैं.

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जून से नहीं हुई किसी पद पर पदस्थापना

एक तरफ राज्य सरकार पशुपालन को बढ़ावा देने पर जोर देती है और दूसरी ओर पशु अस्पतालों की यह दुर्दशा समझ से परे है. जिला मुख्यालय स्थित पशु अस्पताल में दो डॉक्टरों के पद सृजित हैं, लेकिन फिलवक्त यहां केवल एक डॉक्टर हैं. दरअसल, इस वर्ष जून महीने में पशु शल्य चिकित्सा पदाधिकारी सेवानिवृत हो गये और तब से इस पद पर किसी की पदस्थापना या प्रति नियुक्ति नहीं हो पायी है.

स्वास्थ्यकर्मियों को नहीं मिला महीनों से वेतन

इस वजह से जून माह से ही यहां काम कर रहे स्वास्थ्यकर्मियों, कंपाउंडर, गार्ड आदि का वेतन बकाया है. डीडीओ के अभाव में वेतन नहीं मिलने से स्वास्थ्यकर्मी आर्थिक रूप से काफी पिछड़ गये हैं. प्रखंडों में अवस्थित पशु स्वास्थ्य केन्द्रों की तो स्थिति और भी बदतर है. प्रखंडों में स्वास्थ्यकर्मियों को पिछले आठ महीने से वेतन का भुगतान नहीं हुआ है, ऐसा विभागीय सूत्र बताते हैं.

तीन बजे के बाद पशु भगवान भरोसे

कहने को तो यह पशुओं का जिला अस्पताल है, लेकिन यह अस्पताल सुबह 9 बजे से शाम तीन बजे तक ही काम करता है. इसके बाद अगर आपके पशु की तबीयत खराब हुई या कोई इमरजेंसी हुई तो पशुओं की रक्षा भगवान भरोसे ही हो सकती है. चूंकि अस्पताल में मैन पावर के साथ-साथ डॉक्टर की भी कमी है, इसलिए रोटेशन के आधार पर डयूटी नहीं लगायी जा सकती. यही वजह है कि दोपहर बाद तीन बजे से सुबह नौ बजे तक इस अस्पताल में कोई सेवा बहाल नहीं रहती. जब इस संवाददाता ने ऑन द स्पॉट जायजा लिया तो कई अन्य चौंकाने वाले तथ्य भी सामने आये.

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अस्पताल की व्यवस्था बद से बदतर

अस्पताल परिसर में अपनी बकरी का इलाज कराने पहुंचे व्यक्ति ने कहा कि अस्पताल की व्यवस्था बद से बदतर है. अस्पताल में दवा नहीं रहती है. अधिकांश दवाइयां बाहर से मांगनी पड़ती हैं. एक अन्य व्यक्ति, जो अपने कुत्ते का इलाज कराने आये थे, उन्हें भी सभी दवाइयां-इंजेक्शन बाहर से मांगने पड़े. कुत्ते के इलाज के नाम पर यहां केवल एंटी-रेबिज इंजेक्शन ही उपलब्ध था. कुत्ते को पड़नेवाले अन्य वैक्सिन स्टोर से नदारद थे.

इलाज के लिए हर दिन आते हैं 30-40 मवेशी

अस्पताल में कार्यरत स्वास्थ्यकर्मियों की मानें तो यहां हर दिन 30-40 मवेशी इलाज के लिए लाए जाते हैं, चूंकि यहां पशु चिकित्सा के पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए गंभीर रूप से बीमार पशुओं को पशु अस्पताल कांके रांची रेफर कर दिया जाता है. हालांकि अस्पताल में कार्यरत चिकित्सक और स्वाथ्यकर्मी जब तक अस्पताल में रहते हैं, पशुओं के इलाज में तत्परता दिखाते हैं, लेकिन विभागीय उदासीनता से उनका मनोबल गिरा हुआ नजर आता है.

अस्पताल भवन जर्जर, परिसर में जंगल-झाड़

स्थानीय महिला कॉलेज रोड में अवस्थित इस पशु अस्पताल के भवन की हालत भी बेहद खराब है. भवन जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है और छत से सीपेज भी होता है. कुल मिला कर यह पशु अस्पताल खुद बीमार है और हालत देख कर ऐसा लगता है कि यह कभी भी ध्वस्त हो सकता है. अस्पताल परिसर में चारों तरफ जंगल-झाड़ उगे हुए हैं और यह स्वच्छता अभियान को भी मुंह चिढ़ाता नजर आता है. वर्षों से भवन का रंग-रोगन भी नहीं हुआ प्रतीत होता है. सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिला मुख्यालय में अवस्थित पशु अस्पताल की इतनी बदतर स्थिति होने के बावजूद न ही इसकी सुधि विभाग ले रहा है और न ही प्रशासनिक पदाधिकारी.

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