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Palamu: प्रथम आदिवासी और लोक चित्रकार शिविर में चित्रकारों को फिल्म के जरिये दिखायी गयी झारखंड की संस्कृति

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Palamu: झारखंड के पलामू प्रमंडल के नेतरहाट में आयोजित आदिवासी और लोक चित्रकारों के प्रथम राष्ट्रीय शिविर के चौथे दिन शाम को देश भर से आये लोक कलाकारों को झारखंड के सांस्कृतिक पर्व सोहराय के बारे में फिल्म के जरिये अवगत कराया गया.

जाने-माने फिल्म तथा डॉक्यूमेंट्री मेकर मेघनाथ एवं बीजू टोप्पो ने प्रभात विहार परिसर में अपनी नयी फिल्म ‘सोहराय’ का प्रीमियर किया. प्रीमियर में देशभर से जुटे लोक चित्रकार शामिल हुए.

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फिल्म डेवलपमेंट काउंसिल ऑफ झारखंड के अध्यक्ष मेघनाथ ने कार्यक्रम की शुरुआत एवं अंत खुद के निर्देशित ‘गांव छोड़ब नाही-जंगल छोड़ब नाही‘ म्यूजिक वीडियो से किया.

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मानव और पशुओं के बीच गहरे संबंध को दर्शाता सोहराय पर्व 

सृष्टि के निर्माण की कहानी ‘सृष्टिकथा’ फिल्म के माध्यम से बतायी गयी. सृष्टि कथा फिल्म के बाद मेघनाथ ने सोहराय पर्व पर आधारित अपनी नवनिर्मित फिल्म का प्रीमियर किया.

फिल्म में बताया गया कि कैसे सोहराय पर्व से मानव और पशुओं के बीच गहरा संबंध स्थापित होता है. फिल्म में दिखाया गया कि सोहराय पर्व झारखंड की सभ्यता व संस्कृति का प्रतीक है.

यह पर्व भारत के मूल निवासियों के लिए एक विशेष त्योहार है, क्योंकि भारत के मूल निवासी खेती बारी पर निर्भर हैं. खेती बारी का काम बैलों व भैंसों के माध्यम से किया जाता है. इसलिए इस पर्व में पशुओं की माता लक्ष्मी की तरह पूजा की जाती है.

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चित्रकारों से मिलने पहुंचे पद्मश्री से सम्मानित श्याम शर्मा

इस शिविर में पहुंचे पद्मश्री श्याम शर्मा ने कहा कि ऐसा लग रहा है जैसे पूरा भारत इस नेतरहाट की वादियों में आ बसा है. चित्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा कि आप सभी के अंदर कला की कस्तूरी है.

दुनिया में अनगिनत कलाकार हैं, परंतु हमें जानना होगा कि अपने अंदर क्या है? जो सभी से अलग है. इस चीज को अगर हम ध्यान में रख कर काम करते हैं तो हमारे अंदर एक अलग से स्फूर्ति पैदा होती है, जो हमें बाकियों से अलग करती है.

शिविर में पहुंचे कलाकार हिरेन ठाकुर ने कहा कि यहां आकर हम धन्य महसूस कर रहे हैं. आप सभी लोक कलाकार अपनी संस्कृति तथा चित्रकारी को कूचियों से कैनवास पर रंग रहे हैं. आपको ही इस ओरिजिनल आर्ट फॉर्म को बचाना है. हम जैसे चित्रकारों के लिए आप सभी रिसोर्स पर्सन हैं. हम सभी इस लोक चित्रकारी को रंग रेखा से ही बचा सकते हैं.

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