Palamu

पलामू: 70 घंटों बाद मजदूरों का शव पहुंचा गांव, परिजनों की चीत्कार से गमगीन हुआ माहौल

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Palamu: पलामू के तीन मजदूरों का शव करीब 70 घंटे बाद उनके गांव पहुंचा. जिले के नावाबाजार प्रखंड क्षेत्र से रोजगार की तलाश में कर्नाटक जाकर हादसे के शिकार हुए तीन मजदूरों का शव गुरूवार को जब गांव पहुंचा तो माहौल मातम में बदल गया.

ताबूद में शव गांव लाये जाने के बाद परिजनों के चीत्कार से पूरा माहौल गमगीन हो गया. महिलाएं दहाड़ मारकर रोने लगी.

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मजदूरी के दौरान हादसे में हुई थी मौत

ज्ञात हो कि बेरोजगारी की मार झेल रहे नावाबाजार के तीन मजदूर इटको निवासी अर्जुन सिंह (32वर्ष) व कंडा निवासी सुकन भुईयां (20वर्ष) एवं रबदा पंचायत के खामडीहा निवासी सुर्गेश राम (22वर्ष) कर्नाटक मजदूरी करने गए थे.

और 27 मई को ओवरब्रिज निर्माण में मजदूरी के दौरान साइड रेलिंग फट जाने के बाद उसमें से गिरी मिट्टी में दबने से तीनों की मौत हो गयी थी.

पूर्वाहन में सभी मजदूरों के शवों का अंतिम संस्कार किया गया. दाह संस्कार में प्रमुख रविंद्र पासवान, मुखिया दीपक गुप्ता, विरेन्द्र राम, जुगूल भुईयां, गिरजा शंकर राम के साथ महादेव यादव, उपेंद्र पासवान, मनोज यादव, जितेंद्र पासवान, मुकेश यादव, लक्ष्मी प्रसाद गुप्ता सहित अन्य शामिल थे.

नावाबाजार के मजदूर पहले भी हुए हैं हादसे के शिकार

नावाबाजार इलाके से पलायन कर बाहर के प्रदेशों में मजदूरी करने गए मजदूर पहले भी हादसे के शिकार हुए हैं. गांव और पंचायत में रोजगार के ठोस साधन नहीं रहने के कारण हर दिन मजदूर बाहर जाते हैं.

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वर्ष 2006-2007 में कंडा गांव के नौ मजदूरों की गुजरात के भरुच जिले में मजदूरी के दौरान मौत हो गयी थी. उस समय एक साथ नौ शवों के कंडा में आने पर पूरा गांव दहल उठा था.

बावजूद इसके रोजगार के साधन और मजदूरों के हालात सुधारने के प्रति सरकार द्वारा कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया. पलायन के बाद प्रति वर्ष क्षेत्र में एक दर्जन मजदूरों की मौत हो जाती है.

पलायन रोकने में अक्षम साबित होती हैं योजनाएं: पार्षद

नावाबाजार के जिप सदस्य अनुज राम ने आरोप लगाया कि सरकार की योजनाएं रोजगार देकर पलायन रोकने में अक्षम साबित होती हैं. उन्होंने कहा कि मनरेगा योजना में कोई काम नहीं करना चाहता.

168 रूपये के हिसाब से मजदूरी दी जाती है. मजदूरी पाने की प्रक्रिया काफी जटिल है. इतनी कम राशि में मजदूर काम नहीं करते और दूसरे प्रदेश में पलायन कर जाते हैं.

महंगाई को देखते हुए मनरेगा में मजदूरी की राशि कम से कम 300 रूपये होनी चाहिए. जिप सदस्य ने कहा कि रोजगार देने के लिए जनप्रतिनिधियों और सरकार का रवैया हमेशा से उदासीन रहा है. यही कारण है कि इलाके की दुर्गा ग्रेफाइट माइंस लंबे समय से बंद पड़ी है.

सरकारी प्रावधान के तहत मिलेगा मुआवजा

नावाबाजार के बीडीओ विजय राजेश वरला ने कहा कि मजदूरों के परिजनों को सरकारी प्रावधान के तहत मुआवजा दिया जायेगा. पलायन वाले क्षेत्रों को चिन्हित कर रोजगार के अवसर प्रदान किए जायेंगे.

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