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सुनीता को भी लगा कि आखिर उसके हुनर को कोई पहचान मिल जायेगी

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सुनीता की पेंटिंग
Neeraj Neer
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 सरकार ने जब यह घोषणा की कि सभी सरकारी भवनों की दीवारों पर सोहराई पेंटिंग कराई जायेगी तो सोहराई पेंटिंग करने वालों के मानो भाग्य जाग गए. सुनीता को भी लगा कि आखिर उसके हुनर को कोई पहचान मिल जायेगी.

सुनीता को सोहराई पेंटिंग से बहुत लगाव था. लेकिन शादी के बाद उसका यह शौक छूट गया था. कभी वह अपने शौक को रंग देना भी चाहती तो उसके पति उसे समझा देते कि इन कामों से पेट नहीं चलने वाला है. इसलिए घर गृहस्थी का काम अच्छे से करे एवं खाली समय में खेत के कामों में उसका हाथ बटाये. उसकी पेंटिंग देखने वाले सभी लोग स्वीकारते थे कि इस काम में वह बहुत हुनर मंद थी. लेकिन अवसर के अभाव में वह अपनी कला का उपयोग नहीं कर पा रही थी.

उसने सरकार के पास जरूरी आवेदन दिया एवं उसे एक सरकारी भवन की चहारदीवारी पर पेंटिंग करने का काम मिल गया. काम ख़त्म होने पर कुल बारह हज़ार रुपये मिलने थे.  काम बहुत बड़ा था अतः उसने अपने साथ दो सहायिकाओं को भी काम पर रख लिया. सुनीता बहुत खुश थी . वह गर्व से सर उठाकर चल सकती थी. इस काम से वह अपने हुनर को अभिव्यक्त भी कर सकती थी और इससे होने वाली कमाई से घर चलाने में पति की मदद भी कर सकती थी.

सुनीता एवं उसकी सहायिकाओं ने परिश्रम पूर्वक काम करके निर्धारित कार्य  समय से पूर्व ही ख़त्म कर दिया. अब पेमेंट मिलने की बारी थी. उस कार्य के लिए कुल मिलाकर बारह हज़ार रुपये मिलने थे. दो हज़ार रुपये पेंट आदि में खर्च हो गए थे. चार हज़ार रुपये सहायिकाओं को देने के बाद शेष छह हज़ार सुनीता को बचने थे. सुनीता ने इन छह हज़ार से क्या क्या करेगी इसकी योजनायें भी बना ली थी. उसने सोचा कि इन पैसों से सबसे पहले अपने बच्चों के लिए नए कपड़े खरीदेगी और अपने पति के लिए एक नया जूता. कब से बेचारे फटे हुए जूते में पैर फँसा कर चल रहे हैं. सुनीता का आत्मविश्वास हिलोरे ले रहा था. उसका शौक उसके लिए कमाने का जरिया बन गया था. उसने सोचा वह गाँव की अन्य लड़कियों को भी पेंटिंग सिखाएगी ताकि वे भी अपने हुनर से रोज़गार पा सकें .

बहुत समय बीत जाने के बाद भी जब सुनीता के बैंक अकाउंट में राशि नहीं आई एवं उसकी सहायिकाओं ने तकादा करना शुरू कर दिया तो सुनीता चिंतित होकर सम्बंधित कार्यालय में गयी एवं अपने भुगतान के सम्बन्ध में पूछताछ की .

वहां के बाबू ने उससे कहा अभी सम्बंधित फण्ड में राशि नहीं है. सुनीता बहुत ही परेशान व ठगा हुआ महसूस कर रही थी. उसने बहुत ही मेहनत एवं श्रद्धा से अपना काम किया था. अब उसकी सहायिकाएं भी अपना मेहनताना मांग रही थी.  पेंट, ब्रश आदि खरीदने में उसकी पूँजी लगी सो अलग और सबसे बड़ी बात पति जो उलाहना देंगे उसका वह सामना कैसे करेगी. वह ऑफिस के बाबू के आगे घिघियाने लगी कि बाबू किसी तरह पैसे दिला दो, बहुत गरीब हूँ.

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बाबू ने उस पर दया दिखाते हुए कहा “अच्छा तुम इतना कह रही हो तो दूसरे  फण्ड से पैसा ट्रान्सफर करना होगा लेकिन इसके लिए छह हज़ार रुपये लगेंगे. छह हज़ार रुपये पहले दे दो तब बारह हज़ार रुपये खाते में चले जायेंगे.

सुनीता सब समझ गयी कि फण्ड में राशि कैसे आयेगी. वह चुचाप घर वापस आ गयी. घर आकर देखा कि पेंट के डिब्बे में कुछ पेंट बाकी है. उसने पेंट और ब्रश उठाया और वहां पहुँच गयी जहां उसने जी जान लगा कर कुछ दिनों पूर्व ख़ूबसूरत  सोहराई पेंटिंग बनाई थी. उसने उन्हीं दीवारों पर मोटे अक्षरों में लिख दिया कि इस दीवार  पर पेंटिंग करने के बदले मिलने वाले बारह हज़ार में से छह हज़ार रुपये ऑफिस का बाबू मांगता है. कल होकर शहर के सभी अख़बारों में इस बात की खबर मुख्यता से छपी. उसी दिन सुनीता के खाते में बारह हज़ार रुपये पहुँच गए .

संपर्क – अशोक नगर,रांची  

मोबाइल –  08797777598

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