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दर्द-ए-पारा शिक्षकः सबसे ज्यादा शर्म तो राशन दुकानवाले को मुंह दिखाने में आती है, गैस तो तीन महीने से है खाली

2,023
  • नौकरी नाम की, लकड़ी और कोयला में खाना बनाने को मजबूर पारा शिक्षक, गैस सिलेंडर तक नहीं ले पा रहे
  • पारा शिक्षिका सोनी अधिकारी तीन माह से गैस सिलेंडर नहीं ले पायीं
  • क्या उज्ज्वला योजना इन पारा शिक्षकों के लिए यही थी
  • माइक्रो फाइनेंस से लोन ली, तब री एडमिशन कराया अपनी बच्ची का

Chhaya

Ranchi: हास्यप्रद है ये कहना कि जो शिक्षक स्कूलों में पढ़ाते हैं उनके घर में गैस सिलेंडर तक नहीं. स्थिति का आकलन किया जा सकता है. ये शिक्षक सरकारी शिक्षक नहीं, ये पारा शिक्षक हैं. जिनकी नियुक्ति सुदूर क्षेत्रों के बच्चों को घरों से निकाल कर स्कूल के द्वार तक पहुंचाने की लिए की गयी थी. बच्चे स्कूल के द्वार तक पहुंच तो गये लेकिन अब इन पारा शिक्षकों को अपने ही अस्त्तिव की लड़ाई लड़नी पड़ रही है. वो भी रोजमर्रा के लिए. अपनी सीरीज के दौरान न्यूज विंग को एक ऐसी पारा शिक्षिका मिलीं जिनके घर में तीन माह से गैस सिलेंडर तक नहीं है. ये शिक्षिका हैं सोनी अधिकारी, जो वर्तमान में राज्यकीयकृत मध्य विद्यालय चतरा टाटीसिलवे में कार्यरत हैं. गैस सिलेंडर के आभाव में सोनी लड़की, कोयला और पत्ता जलाती हैं. तीन महीने से एक पढ़ी लिखी महिला के लिए लकड़ी हांकना और फिर स्कूल में पढ़ाना कितना मुश्किल है ये बताया नहीं जा सकता.

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यूं तो सरकार ने उज्ज्वला योजना के तहत गैस सिलेंडर बांटा, लेकिन जिन महिलाओं के पास पहले से गैस सिलेंडर है, वो बदहाल सिस्टम के कारण गैस सिलेंडर उपयोग नहीं कर पा रही हैं. पारा शिक्षकों को फरवरी माह से वेतन नहीं मिला है. किसी भी कर्मचारी भले ही वह निजी या सरकारी क्षेत्र में कार्यरत हो, उसकी रोजी-रोटी वेतन पर ही निर्भर रहती है. ऐसे में पारा शिक्षकों की आर्थिक स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है. सोनी सात किलोमीटर की दूरी तय करके स्कूल पढ़ाने जाती हैं. जिसमें इन्हें 20 रुपया भाड़ा लगता है. आमदनी 11,200 रुपया. गर्मी की छुट्टियों के बाद सोनी का स्थानंतरण अनगड़ा में कर दिया जायेगा. जहां इनको प्रतिदिन आने-जाने का भाड़ा 60 रुपये लगेगा. ऐसे में सोनी का कहना है कि सरकार पहले तो मानदेय दे नहीं रही और ऊपर से स्थानांतरण करने से भाड़ा कहां से लायेंगे. आर्थिक और मानसिक परेशानी, जिससे सरकार अंजान.

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पति नहीं है, अकेले बेटी का भरण पोषण कर रही

अपने बारे में बताते हुए सोनी अधिकारी ने कहा कि वो साल 2009 से पारा टीचर की नौकरी कर रही हैं. तब एक हजार आमदनी थी, लेकिन संतुष्ट थी क्योंकि एक हजार रुपये महीने के एक से दस तारीख तक मिल जाते थे. 2016 में पति की दुर्घटना में मृत्यु हो गयी. ससुरालवालों ने साथ नहीं दिया, पति की कुछ खास आमदनी नहीं थी, जिसके कारण सोनी को मायके में ही रहना पड़ा. मायकेवालों ने सोनी को दो कमरे रहने के लिए दिये हैं. जहां वो अपनी बेटी शिवांगी सहदेव के साथ रहती हैं. सोनी बताती है कि माता-पिता बगल में हैं, तो छोटे-मोटे कर्ज ले लिया जा रहा. लेकिन अगर माता-पिता भी नहीं होते तो कैसे एक बच्ची को पालती, ये सोच भी नहीं सकती. जिस स्कूल में सोनी पढ़ा रही है, वहां तीन सरकारी शिक्षक हैं और पारा शिक्षक में एक वह ही हैं. सोनी बताती हैं कभी-कभी शिक्षकों से भी उधार ले लेती हूं, लेकिन ये कहते हुए शर्म लगता है कि पैसे वापस कब करेंगे. क्योंकि हमारे पास तो कोई निश्चित तारीख नहीं है मानदेय आने का. अन्य शिक्षकों के सामने भी शर्मिदंगी महसूस होती है.

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बैंक नहीं देता लोन, माइक्रो फाइनेंस से कराया बेटी का री एडमिशन

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छलकती आंखों के साथ सोनी ने बताया कि उनकी बेटी डीएवी बरियातू में पढ़ती है. हर तीन-चार माह में स्कूल से फीस भरने का नोटिस आ जाता है. बेटी को शर्मिंदगी तो होती ही है, बार-बार माता-पिता से पैसे मांगने में मुझे भी शर्म आती है. खुद नौकरी करते हुए अपनी बेटी तक को सही से नहीं पढ़ा पा रही. लेकिन जब तक हो सके अच्छे स्कूल में ही मेरी बेटी पढ़ेगी. आगे उन्होंने कहा कि इस बार स्कूल में री एडमिशन कराना था बेटी का. मानदेय फरवरी से मिला नहीं. वहीं नवंबर में आंदोलन के दौरान सिर्फ नवंबर के पंद्रह दिन और जनवरी का मानदेय मार्च में दिया गया. ऐसे में कैसे संभव था कि री एडमिशन कराती. तो भारत माइक्रो फाइनेंस से 42,500 का लोन लिया, बैंक तो पारा शिक्षकों को लोन तक नहीं देते. इस लोन में भी प्रति सप्ताह 500 रुपये जमा कराने हैं, जो साल 2021 तक करना है. मानदेय मिल नहीं रहा, ऐसे में माता पिता, बहनों और आस पड़ोस से कर्ज लेकर घर चला रही हूं. गर्मी का दिन है तो बाहर खाना बना लिया जाता है, बरसात में ये संभव नहीं. उन्होंने कहा कि गर्मी की छुट्टी के दौरान उनकी बेटी को 12 प्रोजेक्ट मिले हैं. लेकिन इसे पूरा करने में तीन से चार हजार खर्च होगा, पैसे नहीं होने के कारण प्रोजेक्ट नहीं बन रहा. जून में स्कूल भी खुल जायेगी. उन्होंने कहा कि बेटी भी बार बार बोलती है, अब उसे कैसे समझाउं.

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मजाक बना रहे लोग, राशन लेने कैसे जायें, कैसे कहें कब पैसा देंगे

राशन का जिक्र होते ही उन्होंने कहा कि राशन लेने दुकान जाने में भी शर्मिदंगी होती है. क्योंकि राशन दुकानदार अब उधार चुकाने को कहते हैं. समझा जाये तो जनवरी से ही पारा शिक्षक परेशान हैं. मेरे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है कि कुछ और आमदनी के लिए क्या किया जाये. बेटी छोटी है छोड़ कर जा नहीं सकती. ऐसे में राशन तो बस इधर-उधर से कर्ज लेकर ही चल रहा है. दुकान में उधार भी पड़ा है. समाज और गांव के बारे में पूछने पर उन्होंने कहा कि लोग तो अब पारा शिक्षकों का मजाक बनाते हैं. कहते है पारा शिक्षकों का कुछ होगा कभी. राशन दुकानदार भी इसकी तरह तंज कसते हैं. सरकार ने हमारी बदहाली की है. पहले पारा शिक्षकों की स्थिति ऐसी नहीं थी. कम से कम लोग सम्मान की नजर से देखते थे. आर्थिक तंगी तो है ही साथ ही इस तरह से मानसिक परेशानी भी होती है.

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सरकार की गलत नीतियों के कारण परेशान हैं पारा शिक्षक

उन्होंने बताया कि 2014 के पहले पारा शिक्षकों को कभी ऐसी परेशानी नहीं होती थी. क्योंकि कभी भी एक साथ पांच माह का मानदेय नहीं रोका गया. पहले एक डेढ़ माह का रोक भी दिया जाता था तो सरकार एक बार में ही पूरा पैसा देती थी. लेकिन 2014 के बाद से पारा शिक्षकों के मुंह से सरकार ने निवाला छीन लिया. ये सिर्फ सरकार की गलत नीतियों के कारण हुआ है. साल 2016-17 में सरकार और अधिकारियों की गलती के कारण मिड डे मील का 100 करोड़ रुपये किसी बिल्डर के अकांउट में डाल दिया गया. जिसका 30 प्रतिशत ही वर्तमान में विभाग को मिल पाया है. जबकि मिड डे मील और पारा शिक्षक दोनों केंद्र की योजना में जिसमें केंद्र और राज्य 60 और 40 फीसदी पैसे देती है. ऐसे में स्कूलों में मिड डे मील तो सरकार बंद नहीं कर सकती. तो गाज पारा शिक्षकों के सर गिरी. इसी समय से पारा शिक्षकों की बदहाली और बढ़ गयी.

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टीचिंग मैटेरियल का सालाना 500 तक नहीं मिलता

बात-बात में उन्होंने बताया कि हर शिक्षक को चाहे वह पारा शिक्षक हो या सरकारी शिक्षक सभी को साल में एक बार यूडाइस भरना होता है. जिसमें स्कूल समेत छात्रों का सभी विवरण होता है. इसमें पारा शिक्षक भी सरकारी शिक्षकों की भांति टीचिंग लर्निंग मैटेरियल (टीएमल) बना के देते हैं. लेकिन 2009 से जब से कार्यरत हूं एक बार भी टीएमल का पैसा नहीं दिया गया. जबकि सरकार की ओर से ये 500 रुपये स्कूल प्रभारियों को दिया जाता है. जो पारा शिक्षकों के लिए दिये जाते हैं. स्कूल प्रभारी ये 500 रुपये भी पारा शिक्षकों को नहीं देते. ऐसे में लगता है कि क्या हम सालाना 500 अधिक पाने के लायक भी नहीं हैं.

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