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दर्द-ए-पारा शिक्षक: उधार पर चल रहा जुदिका का परिवार, तंगी ने सामाजिक सम्मान भी छीना

उधार नहीं चुका पाने के कारण दो बार दुकानदार ने बंद किया राशन, अप्रैल माह के मानदेय से चुकाया कुछ उधार

घर में सालों से नहीं आता दूध, दाल या सब्जी में से कोई एक चीज ही बनती है

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पति है कृषक, जुदिका पर ही निर्भर है पूरा परिवार

Ranchi: सरकार से मानदेय नहीं मिलता, आर्थिक तंगी ने जीना मुश्किल कर दिया है. मानो उधार पर ही जिंदगी चल रही हो, ये कहना है पारा शिक्षिका जुदिका का. अपना दर्द बताते हुए जुदिका कहती हैं कि फरवरी माह से मानदेय रोक दिया गया है. इस दौरान राशन दुकानदार ने दो बार राशन देने से मना किया.

गरीबी झेल रहीं जुदिका कहती हैं कि हर छोटी- बड़ी जरूरतों के लिए उधार लेना पड़ता है. कोई दूसरा विकल्प नहीं है. और बकाया नहीं चुका पाने के कारण समाज में प्रतिष्ठा भी घट रही है. बातें तो सुननी पड़ती ही है, कई बार पेट के लिये झूठ भी बोलना पड़ता है.

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जुदिका पर निर्भर पूरा परिवार

पांच सदस्यों वाले परिवार में जुदिका पारा शिक्षिका हैं. पति कृषक हैं. और दोनों के तीन बच्चे हैं, जो कॉलेज में पढ़ते हैं. पति खेती के अलावा कुछ करते नहीं, और खेती में धान के सिवाये कोई और फसल होती नहीं. खेती की स्थिति भी ऐसी है कि मुश्किल से तीन माह का अनाज खाने को होता है.

ऐसे में पूरा घर जूदिका पर निर्भर है. अपने बारे में बताते हुए जुदिका ने कहा कि राशन कार्ड तो है, लेकिन सिर्फ कुछ जरूरतों की ही पूर्ति हो सकती है. खाने-जीने के लिये तो और भी आवश्यकताएं हैं.

अपनी माली हालत के बारे में बताते हुए पारा शिक्षिका ने कहा कि फरवरी से लेकर अब तक में दो बार राशन दुकानदार ने राशन बंद किया. दुकानदार पहले पुराना बकाया चुकाने को कहते हैं. किसी तरह बात बना के अभी राशन ले रही हूं.

इस बार अप्रैल माह का मानदेय तो मिला, लेकिन मानदेय काफी कम है. सही से देखा जाये तो पूरे महीने का भी गुजारा नहीं हो सकता. ऐसे में राशन दुकानदार को कुछ पैसे दिये है. अभी भी काफी उधार है.

बच्चों के कॉलेज जाने के लिये दूसरों से मांगती हैं पैसे

बच्चों का जिक्र करते हुए इन्होंने बताया कि तीनों बच्चे कॉलेज में हैं. कॉलेज आने-जाने के लिए भाड़े की जरूरत होती है. अब तो स्थिति ऐसी हो गयी है कि रोज बच्चे कॉलेज भी नहीं जा पाते.

अधिक जरूरत होने पर पास-पड़ोस से पैसे मांग लेती हूं. साल 2007 से पारा शिक्षक की नौकरी कर रही जुदिका ने बच्चों की जरूरतों के बारे में बात करते हुए कहा कि बच्चों को सिर्फ चावल खिला के नहीं रख सकती. अन्य चीजों की मांग करते हैं. जिसे पूरा करना मुश्किल है. बहुत खराब लगता है. घर में कई बार झगड़े भी होते है.

वर्तमान में उत्क्रमित प्राथमिक विद्यालय, ठुरखाटोली में कार्यरत जुदिका दूसरा काम भी करना चाहती हैं. लेकिन स्कूल के बाद इतना समय मिलता कि कुछ और काम वो कर सके.

कहती हैं, चाहती हूं बच्चे कुछ अच्छा कर लें, ताकि घर की स्थिति सुधरे. लेकिन इसके लिये पैसे भी तो चाहिये. जनवरी में महिला समिति से 25 हजार उधार लिये. लेकिन अभी तक एक किस्त भी नहीं दे पायी. जुदिका ने बताया कि वो खुद महिला समिति की सदस्य हैं. जिससे समय-समय पर ये पैसे ले लेती हैं.

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एक साल से खाली पड़ा है गैस सिलेंडर

गैस सिलेंडर का जिक्र करते हुए इन्होंने कहा कि नामकुम ब्लॉक से सीठियो ठुरखाटोली लगभग 18 से 20 किलोमीटर की दूरी में है. गांव में कभी गैस एजेंसी वाले गैस सिलेंडर देने नहीं आते. उज्जवला योजना से गैस कनेक्शन तो मिला. लेकिन अभी एक बार ही मात्र गैस भरवा पायी हैं.

इन्होंने बताया कि इनके गांव वाले नामुकम ब्लॉक जाकर गैस भराते हैं. जिसमें गैस के दाम के साथ आने-जाने का भाड़ा जोड़ कर 1200 रूपये लगते हैं. और जुदिका की आर्थिक हालत ऐसी नहीं कि रसोई गैस में 12 सौ रुपये लगा सके, ऐसे में एक साल से गैस सिलेंडर यूं ही खाली पड़ा है. फिलहाल लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाती हैं.

दाल-सब्जी एकसाथ नहीं बनती

खानपान का जिक्र करते हुए बताया कि कभी भी इनके घर में दाल और सब्जी एकसाथ नहीं बनती. दोनों में से एक ही चीज बनती है. इनके घर में दूध कई सालों से बंद है. सब्जी कभी-कभी गांव से ले लेती हैं. तंगी के कारण दो महीने से घर का बिजली बिल भी नहीं चुकाया है.

उधार लेने के कारण सम्मान में आयी कमी

पारा शिक्षकों के घटते सम्मान की बात करते हुए इन्होंने कहा कि बार-बार गांव वालों से उधार मांगने के कारण सम्मान में बहुत कमी आयी है. बताया कि 2007 में पारा शिक्षक के रूप में गांव में बहुत सम्मान मिलता था. लोग अभिभावक की तरह इज्जत देते थे.

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लेकिन समय के साथ-साथ लोगों के व्यवहार में परिवर्तन आ रहा है. लेाग समझते हैं हमारी स्थिति. बार-बार आस-पड़ोस से उधार, कभी दुकानदार से उधार, महिला समिति से भी कर्ज लिया है. लोग बात तो करते हैं. लेकिन वो सम्मान अब नहीं मिलता. बहुत कमी आयी है.

पारिवारिक परेशानी के बारे में बताते हुए इन्होंने कहा कि बहुत अधिक तनाव महसूस होता है. परिवार मुझ पर निर्भर है. जरूरतें पूरी नहीं कर पाती. किस परिस्थिति में हूं ये बताया नहीं जा सकता. कई बार तो पैसों और जरूरतों को लेकर घर में भी झगड़े हो जाते है. लेकिन दूसरा कोई साधन नहीं है. अब तो आदत हो गयी है.

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