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दर्द ए पारा शिक्षक : शिक्षक कहने से सम्मान मिलता है, लेकिन पारा शिक्षक कहते ही लोग मुंह मोड़ लेते हैं  

अशोक कुमार 2013 से पारा शिक्षक हैं, बीएड कालेज में शिक्षक की नौकरी छोड़ कर बने पारा टीचर

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Ranchi :  उधार लेने में परेशानी न हो, इसलिए मानदेय मिलते ही सबसे पहले उधार वापस करते है. नहीं तो कोई दूसरा उधार भी नहीं देगा. पिछले दो साल से हमेशा चार पांच माह के बाद एक माह का मानदेय दिया जा रहा है. कैसे घर चलायं. बहुत परेशानी है. ये कहना है नामकुम के पारा शिक्षक अशोक कुमार का. गर्मी छुट्टियों के दौरान इन्हें आठवीं फेल बच्चों को पढ़ाने की ड्युटी मिली है. इसलिए वे इस दौरान स्कूल में ही मिले. अशोक कुमार साल 2013 से पारा टीचर की नौकरी कर रहे है. वर्तमान में ये राजकीयकृत बुनियादी मध्य विद्यालय में पढ़ा रहे हैं.

अपने बारे में बताते हुए कहा कि ऐसे कई कार्यक्रम सरकार चलाती रहती है. मानदेय तो कभी समय पर मिलता नहीं. पिछले साल भी एनआइएस कार्यक्रम चलाया गया था. जिस दौरान होली से लेकर गर्मी छुट्टी में भी काम किया था.  लेकिन उसका पैसा भी नहीं मिला. वर्तमान में सरकार ने निर्देश तो जारी कर दिया कि आठवीं के बच्चों को पढ़ाना है लेकिन  बच्चे स्कूल आयें,  तब तो पढ़ायें?. इनके स्कूल में पांच अन्य स्कूलों के छात्रों को मिलाकर कुल बीस छात्र हैं, जो आठवीं फेल है. इस स्कूल में पारा शिक्षक एक मात्र अशोक के होने के कारण इन्हें ही अन्य स्कूलों के छात्रों को भी पढ़ाने का काम दिया गया है.

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बीएड कालेज में पढ़ाते थे, बच्चों के कारण पारा शिक्षक बने

अपने बारे में  अशोक ने कहा कि 2013 से पहले वे अलग अलग बीएड कालेजों में पढ़ाते थे. अशोक एमएससी और एमएड हैं. राम लखन बीएड कालेज समेत चतरा के बीएड कालेज में भी ये पढ़ा चुके हैं. बातों बातों में कहा कि उनके बच्चे तब छोटे थे. लगा कि इन्हें अच्छी शिक्षा देनी है. कहा कि  शुरू से छोटे बच्चों को पढ़ाने की चाह थी. ऐसे में पारा शिक्षक की नौकरी की.

तब स्थिति ऐसी नहीं थी. तब तो समय पर मानदेय मिलता था. बच्चों की फीस से लेकर घर खर्च सब कुछ आसानी से मैनेज हो जाता था. भले ही मानदेय कम था. लेकिन अब ऐसा लगता है कि हम कहीं के नहीं रहे. क्योंकि बच्चे बड़े हो रहे हैं. जरूरत भी बढ़ रही है. कब तक कटौती करेंगे. अपने जरूरतों को मार देते हैं,  लेकिन बच्चों की छोटी मोटी जरूरतों को नहीं मार सकते हैं.

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गांव से चावल दाल मिलता है इसलिए राहत है

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अशोक कुमार ने बताया कि उनके परिवार में माता पिताज, पत्नी और दो बच्चे हैं. गांव में थोड़ी बहुत खेती होती है. माता के नाम से राशन कार्ड है. इसलिए अनाज की परेशानी नहीं होती. बच्चों को कम से कम भूखे नहीं रहना पड़ता. लेकिन सब्जी के लिए तो परेशानी होती ही है. लोआडीह में अपना घर है इसलिए किराया नहीं देना पड़ता. अगर किराये की समस्या होती तो काफी परेशानी थी.

बिजली बिल तो पिछले चार माह से नहीं दिया है. अप्रैल का मानदेय मिला वो भी उधार कर्ज में चला गया. थोड़े बहुत पैसे बचे हैं. अब स्कूल खुलते ही वे भी बच्चों के कापी किताब में चले जायेंगे. आठवीं के बच्चों को पढ़ाने के दौरान  काफी पैसा पेट्रोल में खर्च हो जा रहा है.

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पारा शिक्षक की पहचान से ही लोग मुंह मोड़ लेते हैं

जब  अशोक कुमार से पूछा गया कि पारा शिक्षक के रूप में आपको कितना सम्मान समाज में दिया जाता है, तो इन्होंने दम भरते हुए कहा कि जब तक लोगों को पता होता है कि शिक्षक है, तब तक लोग सम्मान की नजर से देखते है. लेकिन जैसे ही शिक्षक के आगे पारा शब्द लगता है. लोग हीन भावना से देखने लगते है. कई बार तो लोग मुंह तक मोड़ लेते हैं. परिवार व रिश्तेदारों के बीच भी काफी हीन नजर से देखा जाता है. क्योंकि कहीं ने कहीं उधार रहता है.

बच्चों की फीस में कटौती कर विभाग का निर्देश पूरा करते हैं

सरकार के विभिन्न आदेशों के बारे में बताते हुए इन्होंने कहा कि पारा शिक्षकों को यूनिफार्म पहनने और एक बार मोबाइल रखने का निर्देश दिया गया था. प्रखंड स्तर पर भी सख्ती से इन नियमों का पालन करने का दबाव दिया जाता है. ऐसे में सोचना चाहिए कि पारा शिक्षकों को एक तो समय से, मानदेय नहीं मिलता, ऐसे में यूनिफार्म और मोबाइल कैसे वहन करेंगे. हालांकि अभी पारा शिक्षक यूनिफार्म पहनते नहीं है. लेकिन मोबाइल रखना अनिवार्य है. बच्चों की जरूरतों में कटौती कर ऐसे निर्देशों को पूरा करते हैं. मोबाइल लेने के दौरान तो बच्चों की फीस नहीं भर पाये थे.

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