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पद्मश्री नागपुरी लोकगायक मधु मंसूरी ने साझा किया विस्थापन का दर्द, कहा- लोगों को विस्थापित कर कारखाने बने, आज न लोग बच रहे हैं न कारखाने

पद्मश्री मधु मंसूरी से न्यूजविंग की खास बातचीत

  • पद्मश्री मधु मंसूरी से न्यूजविंग की खास बातचीत

Praveen Munda

Ranchi : 74 साल का दुबला-पतला यह आदमी अभी भी ऊर्जा से लबरेज है. यह अहले सुबह तीन बजे उठकर गीत लिखना शुरू कर देते हैं. अब तक 300 से अधिक नागपुरी गीत गा चुके हैं, जिनमें ज्यादातर उनके खुद के लिखे हुए हैं. उनके क्रांतिकारी गीतों ने झारखंड आंदोलन के सांस्कृतिक पक्ष को आवाज दी. वह नागपुरी में आधुनिक राग रंग के जन्मदाता हैं. उनके पास नागपुरी गीतों का विशाल संग्रह है.

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उन्होंने नागपुरी गीतों का वर्गीकरण भी किया है. वह आराम करने की इस उम्र में भी इसलिए लगातार काम कर रहे हैं, ताकि नागपुरी गीतों को लिखने-गाने की यह परंपरा कायम रहे, नयी पीढ़ी प्रेरित हो और नये गीतकार लेखक आगे आयें. श्रोता प्यार से उन्हें नागपुरी मंच का राजकुमार कहते हैं. उनके गीत गांव छोड़ब नहीं… हम जंगल छोड़ब नहीं… में विस्थापन का दर्द झलकता है, वहीं नागपुर कर कोरा में झारखंड का सौंदर्य. यह हैं पद्मश्री से सम्मानित मधु मंसूरी. न्यूजविंग ने उनसे की खास बातचीत. पेश हैं उस बातचीत के मुख्य अंश :

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सवाल : गाने और लिखने की शुरुआत कैसे हुई?

जवाब :  मेरे पिता स्व अब्दुल रहमान अच्छे लोकगायक थे. बचपन से ही उनको सुना. मेरे गांव (रातू सिमलिया) स्थित घर का आंगन गांव का सामूहिक अखड़ा था. गांव में होनेवाले पर्व त्योहार करम, जिउतिया पर सभी समुदाय के लोग मिलकर गाते-बजाते थे. यही मेरी प्रेरणा बनी. आठ साल की उम्र में पहली बार घर से बाहर निकलकर सार्वजनिक स्थल पर गीत गाया. वह अवसर था रातू के प्रखंड कार्यालय के शिलान्यास का. 1965 में बिहार सरकार के प्रतिभा खोज कार्यक्रम में शामिल होने पटना गया. वहां गायन में पूरे बिहार में दूसरे स्थान पर रहा, दौड़ और सामान्य ज्ञान में प्रथम स्थान पर.

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सवाल : आपके गीत गांव छोड़ब नहीं… में विस्थापन की पीड़ा और सरकारी नीतियों के प्रति आक्रोश झलकता है. इसकी प्रेरणा कैसे मिली?

जवाब : 13 गांवों को विस्थापित कर एचईसी बना. इसके लिए 7500 एकड़ भूमि अधिग्रहीत की गयी. एक समय एचईसी में 22000 मजदूर काम करते थे. अब 5000 से भी कम रह गये हैं. क्या यहां के लोगों को यह पूछने का अधिकार नहीं है कि आखिर क्यों ऐसा हुआ?  हजारों लोगों को विस्थापित कर विशाल कारखाना बना, पर आज वह कारखाना भी खत्म होता जा रहा है. कई कॉलोनियां इस तरह से बनीं. विस्थापित लोगों का आज कोई पता नहीं है. झारखंड में ऐसा कई स्थानों पर हुआ. इन बातों ने ही मुझे इन गीतों को लिखने की प्रेरणा दी.

सवाल : कहा जाता है कि आपके गीतों ने झारखंड आंदोलन को काफी प्रभावित किया. आप क्या कहेंगे?

जवाब : झारखंड आंदोलन के दौरान मेरे अलावा कई और कवियों-गीतकारों ने गीतों की रचना की. लेकिन, उनमें सर्वाधिक गीत और रचनाएं मेरी ही हैं. इनसे आंदोलन आगे बढ़ाने में मदद मिली. लोग उन दिनों उन गीतों को खूब गाते थे. स्वर्गीय डॉ बीपी केसरी कहा करते थे कि मधु मंसूरी आते हैं, तो मंच गुलजार हो जाता है. स्व डॉ रामदयाल मुंडा अपने जीवन के अंतिम दिनों में मुझसे काफी नाराज थे. जब मैंने उनसे नाराजगी का कारण पूछा, तो उन्होंने कहा कि अब तुम खामोश हो गये हो, तुम्हें खामोश नहीं रहना चाहिए.

सवाल : अब तक आपने कितने गाने गाये हैं?

जवाब : मैंने अब तक 300 से अधिक गाने गाये हैं. नागपुरी भाषा में. 250 से ज्यादा गीतों को खुद लिखा. मेरे पिता और गांव का अखड़ा ही मेरी प्रेरणा रहे हैं. शुरुआती दौर में मैं हिंदी गीतों को गाता था, फिर धीरे-धीरे झुकाव नागपुरी की ओर चला गया. लोगों का भरपूर स्नेह और आशीर्वाद मिला. 1960 में पिताजी ने 60 रुपये का मड़ुआ बेचकर मुझे सांस्कृतिक मंच को बनाने में मदद की. इसमें लगातार सांस्कृतिक आयोजन हुआ करते थे.

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सवाल : आपने नागपुरी गीतों का वर्गीकरण भी किया है?

जवाब : मैं इस बात का इंतजार कर रहा था कि कोई मुझसे यह सवाल पूछे. नागपुरी गीत भी कई प्रकार के हैं. इनमें लोक गीत हैं और शिष्ट गीत भी. इनमें भी महिलाओं और पुरुषों के अलग-अलग गीत हैं. फिर संस्कार के गीत हैं. इनमें भी जन्म, छठी, जनेऊ, शादी गीत और मरकी गीत हैं. फिर ऋतु गीत है, इनमें भी बरखा, जड़ा गीत, शिशिर गीत, बसंत गीत, ग्रीष्म ऋतु के गीत शामिल हैं. फिर जाति वर्ग के गीत भी हैं. इनमें गोंड़, भांठ, नानवर्ग, उच्च वर्ग गीत शामिल हैं. इसके बाद एक वर्ग है क्रिया संबंधी गीतों का. इसमें रोपनी, निकौनी, जाता पिसौनी, शादी और व्रत के गीत हैं. एक वर्ग पर्व त्योहार का है. विविध गीतों का भी एक वर्ग है.

सवाल : नयी पीढ़ी को आप क्या संदेश देंगे?

जवाब : मैं आज भी लिखता हूं और गाता हूं. सुबह तीन बजे ही उठकर लिखना शुरू कर देता हूं. खेतों में भी काम करता हूं. ऐसा करता रहूंगा. नागपुरी गीतों को आगे बढ़ते रहना चाहिए. लोग झारखंड की साझा संस्कृति को सहेजें और आगे बढ़ायें.

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