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नवजात शिशु हत्या पर रोक लगाने की अनोखी पहल “पा-लो-ना”

कूड़ेदान में नवजात शिशुओं को फेंकना गंभीर अपराध.

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Chhaya

Ranchi : यूं तो नवजात शिशु के घर आने से घर खुशियों से भर जाता है, इनके स्वागत के लिए तरह तरह की तैयारियां की जाती है. लेकिन हमारे समाज में ही कुछ लोग ऐसे भी है जो इन मासूमों की जिंदगी शुरू होने के पहले ही खत्म करने की कोशिश करते है. कोई इन बच्चों को कचड़े में फेंक देता है तो कोई नाली में, जिनमें से अधिकांश बच्चे अनुकूल परिस्थितियों में अपनी आंख हमेशा के लिए बंद कर लेते है. ऐसे मामलों में कई बच्चों का अंतिम संस्कार तक नहीं किया जाता. पुलिस की ओर से इन बच्चों को पोस्टर्माटम के लिए अस्पताल तो ले जाया जाता है लेकिन पोस्टर्माटम के बाद इन बच्चों को अस्पताल के मर्चरी में ही छोड़ दिया जाता है.

इन बच्चों के साथ इस तरह की घटनाएं न हो और इन्हें भी इनके मौत पर विधिवत अंतिम विदाई दी जाए, इसके लिए ही कांके निवासी मोनिका गूंजन पिछले दो सालों से पा-लो-ना नाम से मुहिम चला रही है. अपनी मुहिम के माध्यम से मोनिका लोगों को जागरूक कर रही है ताकी इन बच्चों को भी समाज में उचित स्थान मिले.

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जाने क्या है “पा-लो-ना”

पा-लो-ना की जानकारी देते हुए मोनिका ने बताया कि वर्ष 2015 में नवजात शिशुओं के संदिग्ध स्थिति में मृत्यु के कई मामले सामने आएं. इनमें से कई बच्चे ऐसे होते थे, जिनको पक्षियों या जानवरों द्वारा क्षति पहुंचाई गई हो. वहीं पुलिस भी जानकारी के आभाव में उचित कार्रवाई नहीं करती थी. तब ऐसा लगा कि ये समाज के लिए अनछुआ मुद्दा है. इस क्षेत्र में हर स्तर पर जागरूकता की आवश्यकता है, जिसके तहत मुहिम चलाई गई.

सोशल मीडिया से जुड़े लोगों द्वारा जुलाई 2016 में “पा-लो-ना” के नाम से एक फेसबुक पेज लांच किया गया, जिसके बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि शुरू में लोगों के पास जानकारी कम थी, लेकिन जैसे जैसे लोग सोशल मीडिया से जुड़ते गए लोगों में जागरूकता आई. नवजात शिशुओं को इस तरह फेंकना जिससे उनकी मौत हो जाना एक अपराध है. जिसके तहत व्यापक कानूनी समझ और जागरूकता की आवश्यकता है. लोग अब इन बच्चों के मौत को गंभीर अपराध समझ रहे है. प्रदर्शनी, नुक्कड़ नाटक आदि माध्यम से शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता फैलाई जा रही है.

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 नवजात बच्चों के मौत के मामले में झारखंड का स्थान 17वां

उन्होंने बताया कि राज्य में नवजात बच्चों के इस तरह होने वाले मौत के आंकड़े बिलकुल भी नहीं है. एनसीआरबी और कारा की ओर से मिले आंकड़े के अनुसार झारखंड का स्थान 17 वां था. राज्य स्तर पर किसी के पास भी इन मामलों के आकंड़े नहीं है.

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मोनिका आगे बताती हैं कि विपरित परिस्थितियों में अभिभावक नवजात शिशुओं को इधर उधर फेंक देते है. ऐसे में बहुत कम ही मामलों में ये बच्चे जीवित रह पाते है. बच्चों की स्थिति का जायजा लेने से मर्माहत कर देने वाले चित्र उभर कर आते है. जिनमें कई बार बच्चों के पक्षियों से नोचे शरीर, तो कुत्तों द्वारा खाये बच्चों के कुछ भाग ही मिल पाते है. वहीं कुछ मामलों में जानवरों द्वारा बच्चों को इस तरह खाया जाता है जिसमें नवजात का आधा शरीर ही क्षत विक्षत हो जाता है. बहुत कम मामलों में ऐसे बच्चे जीवित रह पाते है.

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आंकड़े की माने तो लिंग भेद नहीं है कारण

इन परिस्थितियों में इस वर्ष 30 बच्चों की मौत हुई है. अपने मुहिम से प्राप्त आंकड़ों के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि इस वर्ष जनवरी से अगस्त तक 47 बच्चों को इन परिस्थितियों में पाया गया. जिनमें से 30 मृत और 17 जीवित हैं. 2017 में 65 बच्चे मिलें, जिनमें 28 मृत और 37 जिंदा हैं.

लोगों की मानसिकता है कि लड़की होने पर लोग इनको फेंक देते है, लेकिन ऐसा नहीं है. मोनिका ने बताया कि उनके पास जो आंकड़े उपलब्ध है उनमें लड़के लड़कियों में एक दो का ही अंतर है. जैसे वर्ष 2018 में अगस्त माह तक 20 लड़कियां और 19 लड़के मिलें. इससे स्पष्ट होता है कि बच्चों को फेंकने का कारण सिर्फ लिंग भेदभाव नहीं, बल्कि माताओं की परेशानी, पारिवारिक कलह, दुष्कर्म पीड़िताओं का मां बनना आदि है.

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सार्वजनिक स्थानों पर लगे हैं पालने

मोनिका ने बताया कि जन्म लेते बच्चों को मार देना या फेंक देना इस मामले को लोग अंसेवदनहीन नजरों से देखते है. लेकिन कानूनी नजर में ये गंभीर अपराध है. पुलिस के पास उचित कानूनी जानकारी नहीं होने के कारण उचित धाराएं नहीं लग पाती है. वर्तमान में पुलिस प्रशासन को भी जागरूक किया जा रहा है. वहीं सार्वजनिक स्थानों पर सरकार की ओर से पालने लगाने चाहिए, ताकि जो अभिभावक इन बच्चों को नहीं पाल सके वो इन बच्चों को पालने में रख दें. जिसके बाद बच्चों को शेल्टर होम में भेज दिया जाए.

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