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लोकसभा चुनाव में सामने आयी आदिवासी वोटरों की बीजेपी से नाराजगी, पांच आरक्षित सीटों में दो पर हारी, दो पर मुश्किल से मिली जीत

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Ranchi: झारखंड की 14 लोकसभा सीटों में से पांच लोकसभा सीट एसटी श्रेणी के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित हैं. चुनाव से पहले ऐसा कहा जा रहा था कि आदिवासी वोटर्स बीजेपी सरकार से नाराज हैं. भले ही बीजेपी को नतीजों में बंपर जीत मिली हो. लेकिन इन पांच आरक्षित सीटों की बात करें तो, आंकड़े यही बयां कर रहे हैं कि आदिवासी वोटर्स अब भी बीजेपी से नाराज चल रहे हैं. विधानसभा चुनाव के लिए झारखंड में 28 विधानसभा सीटें एसटी के लिए आरक्षित हैं. ऐसे में बीजेपी को विस चुनाव में दूसरी पार्टियां इन आरक्षित लोकसभा क्षेत्रों में बड़ी चुनौती दे सकती हैं. ऐसा क्यों कहा जा रहा है आंकड़ों से समझते हैं.

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जानें पाचों एसटी अरक्षित सीटों का हाल

खूंटी

एक समय था जब खूंटी सीट बीजेपी के लिए सबसे ज्यादा सेफ मानी जाती थी. इसी सीट से कड़िया मुंडा आठ बार लोकसभा चुनाव जीत कर संसद पहुंचे हैं. लेकिन इस सीट से इस बार जब तीन बार सीएम रह चुके अर्जुन मुंडा मैदान में उतरे तो सीन बदल गया. नतीजों के दिन सबसे ज्यादा फाइट इसी सीट पर देखने को मिली. 2014 में कांग्रेस की सीट से जिस कालीचरण मुंडा को कड़िया मुंडा ने आसानी से 1,22,168 वोटों से हराया था, उसी कालीचरण मुंडा ने अर्जुन मुंडा की जीत मुश्किल कर दी. दिन भर की उठा पटक के बाद बीजेपी के अर्जुन मुंडा को मात्र 1,445 वोटों से जीत मिली. जो लोकसभा चुनाव के हिसाब से बेहद मामूली है. साफ तौर से कहा जा सकता है कि आदिवासियों ने दिल खोल कर अर्जुन मुंडा को वोट नहीं दिया.

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लोहरदगा

खूंटी के बाद लोहरदगा ही एक ऐसी सीट थी जहां खूंटी की ही तरह बेहद टफ फाइट देखने को मिली. दोनों भगत उम्मीदवारों के बीच नेक-टू-नेक फाइट देखने को मिली. गिनती के दिन एक समय ऐसा लग रहा था कि बीजेपी लोहरदगा से सीट हार जायेगी. आखिरकार सुदर्शन भगत ने सुखदेव भगत को मात्र 10,363 वोट से हराया. यहां भी जीत का अंतर बेहद मामूली होना बताता है कि आदिवासी वोटरों ने बीजेपी को दूसरे क्षेत्रों की तरह दिल खोल कर वोट नहीं दिया.

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चाईबासा

चाईबासा की फाइट की देश भर में चर्चा हुई. जहां झारखंड के दूसरे क्षेत्रों में बीजेपी जीत का पताका लहरा रही थी, वहीं चाईबासा से बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मण गिलुआ ही चुनाव हार गये. वो भी उस उम्मीदवार से जिसे 2014 में उन्होंने 3,03,131 वोट से हराया था. उस वक्त गीता कोड़ा जय भारत समानता पार्टी से उम्मीदवार थीं. इस बार चुनाव से पहले गीता कोड़ा ने कांग्रेस ज्वाइन किया और बीजेपी का आदिवासी चेहरा माने जानेवाले प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मण गिलुआ को 72,155 वोटों से हराया. निश्चित तौर पर बीजेपी को आदिवासी मामले पर इस हार के बाद गंभीरता से सोचने की जरूरत है.

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दुमका

जाहिर तौर पर बीजेपी ने दुमका में वो कर दिखाया, जिससे जेएमएम की साख ही दांव पर लग गयी. लेकिन जीत के अंतर की बात करें, तो आंकड़े इतने मजबूत नहीं जैसे गैर आदिवासी क्षेत्रों में हैं. दिशोम गुरु की राजनीति से विदाई एक हार से होगी ऐसा शायद ही किसी ने सोचा होगा. दुमका से बीजेपी के सुनील सोरेन ने गुरु जी को 47,500 वोट से हराय़ा. इस अंतर को ऐसा नहीं माना जा सकता कि फिर से जेएमएम अपनी विरासत हासिल न कर सके. आदिवासी ने बीजेपी को वोट किया, लेकिन उस तरीके से दिल खोल कर नहीं.

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राजमहल

मोदी लहर के बावजूद बीजेपी की यहां एक ना चली. जेएमएम के विजय हांसदा ने अपनी जीत को दोहराया और लगातार लोकसभा चुनाव में दूसरी बार बीजेपी के हेमलाल मुर्मू को पटखनी दे दी. वो भी करीब एक लाख वोटों से, जिस तरीके से गैर आदिवासी क्षेत्रों में बीजेपी जीती है, उसी तरह राजमहल में बीजेपी हारी है.

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पांच लोकसभा में 29 विधानसभा सीट, बीजेपी को लगाना होगा जोर

खूंटी, चाईबासा, लोहरदगा, दुमका और राजमहल लोकसभा क्षेत्रों में 29 विधानसभा सीट आती हैं. यूं तो एसटी कोटे के लिए 28 विधानसभा सीटें झारखंड में आरक्षित हैं. लेकिन निश्चित तौर पर बीजेपी और विपक्षी पार्टियां इन सभी 29 सीटों को हलके में नहीं लेंगी. विधानसभा चुनाव में बीजेपी की कोशिश इन सभी सीटों पर मजबूती बनाने की होगी, तो विपक्षी पार्टी हर हाल में बीजेपी को इन सीटों से खदेड़ने की स्ट्रैटिजी पर काम करेगी.

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