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सीबीआइ के विशेष निदेशक राकेश अस्थाना पर दर्ज प्राथमिकी का मूल पाठ

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Ranchi: सीबीआइ के विशेष निदेशक राकेश अस्थाना पर दर्ज हुई प्राथमिकी का मूल पाठ न्यूजविंग को प्राप्त हुआ है. हम इसे हुबहू छाप रहे हैं. छह पन्नों की शिकायत सीबीआइ के निदेशक के पास हैदराबाद के सतीश बाबू सना ने 15 अक्तूबर को लिखित रूप से की थी.

 

सेवा में

निदेशक

सीबीआइ,

नयी दिल्ली

विषय : परेशान करने और अनावश्यक पैसे की मांग करने के संबंध में शिकायत

महोदय,

यह सबमिट करना चाह रहा हूं कि मेरे पास सीबीआइ के पुलिस उपाधीक्षक (डीएसपी) देवेंद्र कुमार नयी दिल्ली की तरफ से भादवि की धारा 160 के तहत 9.10.2017 को नोटिस भेजा गया था. नोटिस में 12.10.2017 को मुझे सीबीआइ कार्यालय नयी दिल्ली में उपस्थित होने को कहा गया था. इसमें मोईन अख्तर कुरैशी के आरसी केस 2243017ए 0001 का हवाला दिया गया था. मैं इस विषय पर डीएसपी सीबीआइ देवेंद्र कुमार के कार्यालय में उपस्थित हुआ. उपस्थिति के बाद मुझसे मेरे और मोईन अख्तर कुरैशी के संबंधों के बारे में और सुकेश गुप्ता के बेल मैटर पर बातें हुई.

12 अक्तूबर 2017 को मेरा बयान दर्ज होने के बाद मुझे घर जाने दे दिया गया. इसके बाद मुझे 17.10.2017 को फिर नोटिस भेजा गया. इसमें नोटिस भेजनेवाले अधिकारी देवेंद्र कुमार ही थे. उन्होंने 23 अक्तूबर को दोबारा मुझे सीबीआइ दफ्तर में प्रस्तुत होने को कहा था. फिर मैं 23 अक्तूबर को सीबीआइ दफ्तर में उपस्थित हुआ. मेरे से फिर पिछली बातें ही पूछी गयीं और यह कहा गया कि मैंने 2011 में मोईन कुरैशी की कंपनी मेसर्स ग्रेटर हाईट इंडिया को दिये थे. यह एक जेनविन ट्रांजैक्शन था, जिसका उल्लेख मेरे आयकर रिटर्न में भी किया गया था. इसके बाद मुझे फिर घर जाने दिया गया.

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इसके बाद एक नवंबर 2017 को फिर मुझे नोटिस भेज कर बुलाया गया. देवेंद्र कुमार जी ने फिर से वही बातें पूछीं. इस दिन सुकेश गुप्ता, शब्बीर अली और मोईन अख्तर कुरैशी भी मौजूद थे. उनसे भी वही सब बातें पूछी गयीं. केस के अनुसंधानकर्ता ने मुझसे कहा कि मैंने 50 लाख रुपये वैनपिक केस के लिए कुरैशी को दिये. इस पर मैंने मना कर दिया. मैंने अपना पक्ष रखा कि वैनपिक मामले में मैं निर्दोष हूं. 30.11.2017 को फिर मुझे सीबीआइ दफ्तर बुलाया गया. मैंने व्यक्तिगत कारण गिनाते हुए अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कराने की गुजारिश भी की. मुझसे यह कहा गया कि मैं सीबीआइ दफ्तर को अपने सारे खाते का ब्योरा भेजूं, जिसे वो चाहते हैं.

मैंने कुरियर से सारे दस्तावेज भेज दिये. इसके बाद दो दिसंबर 2017 को मैं हैदराबाद से दुबई के लिए बैठक में भाग लेने रवाना हो गया. मैं वहां 15 से 20 दिनों तक रूका. दुबई प्रवास के समय मैं मनोज प्रसाद से मिला. जो मुझे जानते थे. मनोज ने बताया कि वे दुबई में इनवेस्टमेंट बैंकर हैं और अपना व्यवसाय चला रहे हैं क्यू कैपिटल के नाम से. इसी दौरान सीबीआइ की तरफ से किये जा रहे तहकीकात की बातें भी मैंने मनोज से कहीं. इस पर मनोज ने कहा कि उनके सीबीआइ के अफसरों से अच्छे तालुक्कात हैं. इसके बाद सोमेश प्रसाद नामक व्यक्ति ने सीबीआइ अफसर से बात की, जिसने अपने आप को मनोज प्रसाद का भाई बताया. इस प्रकरण के पश्चात मुझे बताया गया कि मेरी समस्याएं समाप्त हो जायेंगी. उस समय सोमेश प्रसाद ने पांच करोड़ रुपये मांगे और कहा कि उन्हें अब कोई नोटिस नहीं जायेगा. सोमेश ने यह भी कहा कि उनकी सारी समस्याओं का अंत हो जायेगा.

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तीन करोड़ रुपये अग्रिम के रूप में देने की बातें हुई और दो करोड़ रुपये चार्जशीट फाइल होने के समय देने की बातें कही गयीं. इसके बाद सीबीआइ से क्लीन चिट मिलने का आश्वासन भी मिला. सोमेश ने मुझे डीपी और व्हाट्सएप पर सीबीआइ अफसर का फोटो भी दिखलाया. यह मेरे मोबाइल पर अभी भी मौजूद है. सोमेश ने पुलिस वर्दी वाले अफसर की फोटो भी दिखलायी और उसका पूरा ब्योरा मुझे दिया. उसने बताया कि यह अधिकारी सीबीआइ के विशेष निदेशक हैं और राकेश अस्थाना इनका नाम है. इस पर मैंने गुगल के जरिये राकेश अस्थाना की तस्वीरें भी सर्च कर, सच्चाई जानी. सोमेश द्वारा दिखायी गयी तस्वीर और कांटैक्ट एक ही थे. मैंने अपने परिजनों से बातचीत की और यह कहा कि फलां व्यक्ति हमलोगों को राहत दिलवा सकता है. मैंने एक करोड़ रुपये की राशि की व्यवस्था कर मनोज प्रसाद को दुबई कार्यालय में दी. सोमेश प्रसाद ने सुनील मित्तल (9810058407) से कांटैक्ट करने की बातें कहीं. मैंने 1.95 करोड़ रुपये एरैंज कर सुनील मित्तल को 13.12.2017 को दिये. यह पैसे प्रेस क्लब ऑफ इंडिया परिसर, रायसाना रोड नयी दिल्ली के पार्किंग एरिया में रात्रि 9.25 बजे दी गयी. मेरे ऑफिस का एक व्यक्ति पुनीत को भी इसकी जानकारी थी.

भुगतान होने के बाद 14 दिसंबर को सोमेश दुबई से नयी दिल्ली आये. 15 और 16 दिसंबर 2017 को सोमेश ने शाम को मुझे फोन किया. व्हाट्सएप के जरिये सभी कॉल किये गये. इसमें सोमेश ने कहा कि वह सीबीआइ के संबंधित अफसर के दफ्तर से पांच मिनट में कॉल करेगा. उसने फिर मेरे दुबई नंबर पर कॉल किया और मुझसे बातें कीं. संबंधित व्यक्ति ने मेरे केस के बारे में मुझसे पूछा. संबंधित व्यक्ति द्वारा किसी को निर्देश दिये जाने की बातें भी मुझे सुनाई दीं. मुझसे कहा गया कि राकेश अस्थाना तभी केस लेंगे, जब उन्हें पांच करोड़ रुपये मिल जायेंगे. इससे मैं और कॉन्फीडेंट हो गया और 21 दिसंबर को दुबई से भारत आ गया. मैंने सोमेश से बात भी की, जिसमें काम होने की गारंटी दी गयी. सोमेश ने कहा कि वह राकेश अस्थाना के सभी निवेश के मामलों को दुबई और लंदन में निबटाता है. यह सिलसिला काफी वर्षों से चल रहा है. सोमेश ने सामंत गोयल और परवेज हयात नामक दो अफसरों का भी जिक्र किया. इसके बाद बची राशि का भुगतान करने के लिए मुझ पर दवाब डालना शुरू कर दिया गया.

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मैंने मनोज को बातें बतायी और कहा कि सोमेश काफी दवाब डाल रहा है. मैंने काफी दवाब झेलते हुए कुछ पैसे भी दिये. इसके बाद मुझे सीबीआइ के दफ्तर से कोई नोटिस नहीं भेजा गया. मेरे द्वारा 2.95 करोड़ रुपये का भुगतान मनोज प्रसाद को किया गया. इसके बाद 13.2.2018 को मुझे सीबीआइ के देवेंद्र कुमार ने फिर नोटिस भेज दिया. मुझे 19 फरवरी को बुला कर फिर से वही पुराने सवाल पूछे गये. मुझे इस बात की बेचैनी हो रही थी कि 2.95 करोड़ रुपये का भुगतान करने के बाद भी मैं परेशानी में हूं. मैंने मनोज प्रसाद से बातचीत की और बताया कि मुझे सीबीआइ से नोटिस जारी किया गया है, यह प्रोमिस के विपरीत है. बातचीत के क्रम में मैंने यह कहा कि कैसे मुझे पूरी तरह रियायत देने की बातें कही गयी थीं. मुझे यह भी कहा गया कि 20 फरवरी 2018 तक पूरे मामले से निबटारा मिल जायेगा. इसके बाद मुझे 21 फरवरी को फिर से उपस्थित होने को कहा गया. पर मैं दुबई चला गया. मैंने मनोज प्रसाद से मुलाकात की.

उन्होंने बताया कि सोमेश दुबई में नहीं हैं. इसके बाद डीएसपी देवेंद्र कुमार से मुझे 26 फरवरी 2018 को एक मेल प्राप्त हुआ. जिसमें मुझे सारे बैंक खातों का ब्योरा भेजने को कहा गया. मई 2018 तक मुझे कोई नोटिस नहीं मिला. फिर डीएसपी देवेंद्र कुमार ने 5.6.2018 को नोटिस जारी करते हुए नौ जून को उपस्थित होने का आदेश दिया. मैंने आइओ से दूसरी तिथि देने को कहा. मैंने 24 सितंबर तक कोई नोटिस नहीं देखा. जब मैं 25 सितंबर को पेरिस के लिए इमीरेट्स एयरलाइंस से रवाना हुआ. मुझे हैदराबाद एयरपोर्ट पर इमीग्रेशन अधिकारियों ने जबरन रोक लिया. मुझे यह बताया गया कि मेरे खिलाफ लूक ऑउट सर्कुलर नोटिस जारी किया गया है, जिसकी वजह से मैं भारत छोड़ कर नहीं जा सकता. एसपी सीबीआइ ने 26.9.2018 को यह नोटिस जारी किया है. मैंने डीएसपी देवेंद्र कुमार से टेलीफोन पर बात की. उन्होंने 27 नवंबर को सीबीआइ दफ्तर में मुझे बुलाया. इसके बाद एसएमएस से 1.10.2018 को मुझे सीबीआइ दफ्तर में हाजिर होने को कहा गया. मैंने एक अक्तूबर को डीएसपी से मुलाकात की. उन्होंने मेरी मुलाकात एसपी जगरुप से करायी. एसपी जगरूप को मैंने बताया कि मुझे फ्रांस जाना है.

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इसके बाद अफसर मुझे साईं मनोहर के पास ले गये, वह संयुक्त निदेशक थे. साईं मनोहर ने मेरे और मोईन कुरैशी के संबंधों की जानकारी ली. साई मनोहर ने कहा कि मैं झूठ बोल रहा हूं. साईं मनोहर ने कुछ दस्तावेजों की जांच की, जिसमें मोईन कुरैशी की कंपनी में निदेशक के रूप में मेरा कहीं नाम ही नहीं था. फिर मुझे तीन अक्तूबर को सीबीआइ कार्यालय में बुलाया गया. एसपी जगरूप ने मुझसे यह आवेदन लिखवाया कि मेरे संबंध सुकेश गुप्ता और मोईन अख्तर कुरैशी से कैसे हैं. इसके बाद मैंने तीन अक्तूबर को अपना स्टेटमेंट एसपी सीबीआइ को सौंप दिया और इसकी जानकारी देवेंद्र कुमार को भी दे दी. डीएसपी ने मुझसे कहा कि वे सत्य की जानकारी नहीं दें. इसके बाद मुझे नौ अक्तूबर को फिर बुलाया गया. मैंने इस संबंध में धारा 164 के तहत दिल्ली के एक न्यायालय में अपना बयान भी दर्ज कराया है.

मैंने फिर मनोज प्रसाद से कांटैक्ट कर, उनसे परेशानी से निजात दिलाने का आग्रह किया. मैंने कई कॉल, व्हाट्सएप कॉल, एसएमएस और अन्य माध्यमों से मनोज प्रसाद से बात की. उन्होंने यह कहा कि सब कुछ बैलेंस एमाउंट के नहीं दिये जाने से हो रहा है. मैंने कहा कि जल्द ही शेष राशि का भुगतान हो जायेगा. मुझे यह बताया गया कि यह बात हो गयी है कि आपकी गिरफ्तारी अथवा पूछताछ सीबीआइ से नहीं होगी. मुझे नौ अक्तूबर 2018 की सुबह तक भुगतान करने को कहा गया. 10 अक्तूबर को मनोज प्रसाद से मुझे जानकारी दी गयी कि प्रोमिस के हिसाब से दो करोड़ का भुगतान नहीं हुआ है.

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उसने एक व्यक्ति जिसका नंबर 7497092054 है, से संपर्क करने को कहा. मैंने 25 लाख रुपये पुनीत नामक व्यक्ति से मनोज प्रसाद के आदमी को दिये और फोन संख्या 7497092054 पर बातें भी करायी. बैंक स्ट्रीट करोलबाग के पास की एक दुकान डायमंड पोल्की के पास मनोज से बात भी करायी. मैंने यह कहा कि पैसे एरेंज करने में मुझे दिक्कतें हो रही हैं. मैंने मेरे एक मित्र सूर्या से मनोज प्रसाद को 25 हजार दिहराम (पांच लाख रुपये) 15 को भिजवाये. इसके बाद मुझसे 30 हजार दिहराम और मांगे गये. यह पैसे भी मैंने सूर्या के माध्यम से दिलवाये.

पूरी परिस्थिति और दृष्टांत से यह प्रतीत होता है कि मेरे द्वारा सीबीआइ अधिकारियों की मिलीभगत से इतनी बड़ी राशि की उगाही की गयी. पूरे प्रकरण में मेरी कहीं सहभागिता नहीं है. मेरे मामले में त्वरित कानूनी कार्रवाई करते हुए आरोपियों को सजा दिलायी जाये. जरूरत पड़ने पर मैं व्हाट्सएप और व्यॉस कॉल की जानकारी भी उपलब्ध कराउंगा.

सतीश बाबू सना

ऊवला,72, हिल रिज विलाज

इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस के पीछे

गाचीबावली, हैदराबाद, तेलांगना

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