Opinion

||OPINION|| फिर वही राग, फिर वही आत्ममुग्धता!

Sri Niwas

अब तो यह जान कर ही बहुतों के, जिनका विवेक एकदम मर या सो नहीं गया हो, रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि आज साहेब फिर बोलेंगे. फिर भी उम्मीद थी कि इस बार (12 मई की रात) साहेब अपनी और सरकार की कुछ गलतियों व लापरवाहियों को स्वीकार करेंगे.

इस बीच लोगों, खासकर गरीबों को हुई और हो रही परेशानियों के लिए क्षमा नहीं मांगेगे, तो खेद व्यक्त करेंगे. मगर आप तो मानो आश्वस्त थे कि ‘राहतों’ की बारिश, लाखों करोड़ के पैकेज की घोषण से ही पीड़ितों का कष्ट दूर हो जाएगा, लोग खुशी से झूम उठेंगे!

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लेकिन जो लाखों थके-हारे, भूखे-प्यासे कोरोना पीड़ित (कोरोना संक्रमित नहीं) अब भी देश के विभिन्न हिस्सों में सड़कों पर और रेल की पटरियों पर चल रहे हैं, क्या वे लोग सुन और जान भी सके होंगे कि हमारा प्रधानसेवक कितना दरियादिल है.

इसके पहले एक शाम ताली-थाली-शंख बजवा कर, एक रात दिया जलवा कर प्रधानमंत्री जी ने बताया था कि महाभारत का युद्ध तो 18 दिन में खत्म हो गया था, पर कोरोना से जंग हम 21 दिनों में जीतेंगे. पर पूरे 45 दिन बाद, गत 11 मई को आपने (मुख्यमंत्रियों से वेब मीटिंग के दौरान) कहा- हमने कहा और चाहा था कि लोग जहां हैं, वहीं रहें. लेकिन जनता का स्वभाव ऐसा है कि वे घर जाना चाहते हैं. इसलिए हमें फैसलों में कुछ बदलाव करना पड़ा है.

नहीं साहब. कभी तो सच कुबूलने और बोलने का साहस दिखाइये. यह तो स्वीकार कीजिये कि आप कोरोना संकट की भयावहता का कोई अंदाजा ही नहीं लगा सके थे. न शायद आज तक लगा सके हैं; या फिर आपने जानबूझ कर देश को गफलत में रखा. देशवासियों को भीषण संकट में डाल दिया.

 

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आखिर आपने किस आधार पर और किनकी सलाह पर कह दिया था कि हम यह जंग 21 दिनों में जीत जायेंगे? इस विश्वास के पीछे कोई ठोस आधार था; या कि इसलिए सच नहीं बताया कि लोग आतंकित हो जायेंगे?

22 मार्च को जनता कर्फ्यू और फिर 21 दिनों के लॉकडाउन की घोषणा के लिए 24 मार्च की तारीख और ठीक शाम आठ बजे का समय आपके वैज्ञानिक सलाहकारों ने सुझाया था या किसी ज्योतिष ने?

आप खुद को जनता का सेवक कहते हैं, लेकिन जनता का स्वभाव जानने में आपको 45 दिन लग गये! कहीं आपका आशय यह तो नहीं था कि लोगों को जो कष्ट भोगना पड़ा और भोगना पड़ रहा है, उसका कारण खुद उनका ‘स्वभाव’ है, गलत तरीके से और बिना तैयारी के लॉकडाउन थोप देना नहीं!

गनीमत है कि आपने इसके लिए उनके पिछले जन्म के किसी ‘पाप’ को कारण नहीं बता दिया.

आपने ‘लोग जहां हैं, वहीं रहें’ भी बाद में कहा था, जब अपने घरों से सैकड़ों-हजारों किमी दूर फंसे लोग बेसब्र होकर निकल पड़े थे. आपने तो ‘अपने घरों में रहें’ कहा था. जाहिर है, आपको पता ही नहीं था कि जब आप वह अपील कर रहे थे, तब एक करोड़ से भी अधिक भारतीय रोजी-रोटी, नौकरी और पढाई के लिए अपने घरों से बहुत दूर रह रहे थे. आपको यह एहसास भी नहीं था, न शायद है कि आपके लाखों ‘भाइयों-बहनों’ (वैसे इस बार ‘साथियों’ कहा) के पास ‘अपना घर’ है भी नहीं.

आपके मुताबिक, तो पहले ही लॉकडाउन के बाद. यानी 14 अप्रैल तक कोरोना के खिलाफ हमें जंग जीत जाना चाहिए था. लेकिन 12 मई को आपने चौथे लॉकडाउन का संकेत दे दिया.

आपने कह दिया कि पहले भारत में पीपीई किट नहीं बंटी थी, अब बनने लगी है. यानी कोरोना संकट के बाद? और बनाने की रफ़्तार देखिये. आपने कहा- हम हर महीने नहीं, हर रोज लाखों पीपीई किट और मास्क बना रहे हैं! तो ये पीपीई किट और मास्क जा कहां रहे हैं?  मीडिया में तो यह कहा जा रहा है कि यहां के मेडिकल स्टाफ इस किट के लिए हड़ताल कर रहे हैं और नौकरी से भी हाथ धो रहे हैं.

अब बीस लाख करोड़ रुपये के पैकेज के बारे में मैं अधिक कुछ नहीं कह सकता. प्रधानमंत्री ने इसे विस्तार से बताने का जिम्मा वित्त मंत्री को दे दिया है. धीरे-धीरे समझ में आएगा. वैसे एक कन्फ्यूजन जरूर है.

कुछ लोग कह रहे हैं कि भारत सरकार का 2020-21 का वार्षिक बजट  कुल 30 लाख करोड़ का है. यदि यह सच है तो फिर 20 लाख करोड़ का पैकेज कहां से दिया जाएगा?

इतना समझ में आ रहा है कि किस बड़े पैमाने पर लोग दर-बदर हुए हैं. बेरोजगार हुए हैं. जिन गावों में रोजगार की कमी से लोग दूर दराज को गए थे, आज वे वहीं लौट रहे हैं. क्या उन्हें अपने घर के आसपास काम मिल जायेगा? चालाक स्थानीय समर्थ लोग उनकी विवशता का लाभ उठाने का प्रयास नहीं करेंगे? उधर उनकी अनुपस्थिति का उन उद्योगों पर क्या असर पड़ेगा, जो इनके दम पर ही चलते थे? और क्या वे कुछ दिनों बाद ही फिर रोजी रोटी के लिए बाहर निकल सकेंगे?

वैसे फिलहाल मूल सवाल तो यह है कि किस कोरोना के चलते देश इस संकट में फंसा है, क्या उसपर हम जल्द काबू पा लेंगे? हालात जल्द सामान्य हो जायेंगे? अभी बिहार, झारखंड,  ओडिशा और यूपी आदि राज्यों में प्रवासी मजदूरों का आना लगातार जारी है. इन सभी राज्यों में यह संख्या लाखों में होगी. अगली चुनौती तो उनके आने से कोरोना विस्तार के विस्फोट का जो खतरा आसन्न है, उसे रोकना है.

इन राज्यों की स्थिति और तैयारी को देखते हुए यह एक बड़ी चुनौती साबित होने वाली है. बाहर से आ रहे प्रवासियों को गांव में रहने देने को लेकर भी विवाद और तनाव बन सकता है.

क्वारेंटाइन सेंटरों की बदहाली की जो खबरें मिल रही हैं, उनमें कोई रहना नहीं चाहेगा. रखा जायेगा, तो भागने का प्रयास करेगा. इससे संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ेगा.

 

जो भी हो, एक बात तो है कि हमारे प्रधानमंत्री में जनता में जोश भरने, उनका हौसला बढ़ाने की पूरी काबिलियत है. सभी मान रहे हैं कि लॉकडाउन के कारण अर्थव्यवस्था संकट में है.

सारी आर्थिक गतिविधियां लगभग ठप हैं. दस करोड़ से अधिक रोजगार ख़त्म हो चुके हैं. फिर भी आपने कहा कि 21 वीं सदी भारत की होगी, कि भारत आत्मनिर्भर हो गया है. जुमले व तुकबंदी में तो आपका कोई जोड़ ही नहीं है-  ‘बीस-बीस (2020) और बीस लाख करोड़’, ‘फोर एल’, ‘लोकल- वोकल’, ‘चौथे लॉकडाउन का रंग रूप नया होगा’ आदि.

ऐसे तनाव और संकट काल में एक देश के मुखिया के दिमाग में इतने कलरफुल आइडिया आते हैं, यह मामूली बात है! इसे कहते हैं आत्मविश्वास.मगर कुछ लोग इसे बड़बोलापन भी कहते हैं. एक आत्ममुग्ध नेता ही ऐसी बातें बोल सकता है.

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.

 

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