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||Opinion|| कोरोना ने सत्ता के दोहरे चरित्र पर से पर्दा हटा दिया, अब भी नहीं समझें सत्ता किनके लिये है !

  • सरकार के दोहरे चरित्र को समझना हो, तो इन घटनाओं पर गौर करें

Surjit Singh

कोरोना महामारी के बीच कुछ घटनाएं सोंचने को मजबूर करती हैं कि आखिर हमारी सरकार, सत्ता किसके लिए काम करती है? आप कहेंगे जनता के लिए. तो क्या देश व राज्य की सरकारों के लिए “जनता” के क्या मायने हैं? क्या शासन के लिए “जनता” में गरीब, मजदूर, किसान व लाचार लोग भी शामिल हैं? कोरोना महामारी के बीच और कुछ हुआ या ना हुआ हो, पर सत्ता, सरकार व राजनीतिक पार्टियों का दोहरा चरित्र परदे से बाहर आ गया है.
पहले इन घटनाओं को पढ़िये और समझिये क्या आप भी जनता हैं ?

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  •  जिस यूपी की योगी सरकार की पुलिस लॉकडाउन में पैदल घर लौटने वाले मजदूरों पर जुल्म करती दिखी, सड़क पर उठा-बैठक कराती दिखा, उसी यूपी सरकार ने राजस्थान के कोटा से 450 बसों में भरकर हजारों छात्रों को उनके घऱ तक पहुंचाया.
  •  बिहार सरकार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को मजदूरों की इस बात पर आपत्ति है कि योगी सरकार द्वारा कोटा से छात्रों को वापस लाकर ठीक नहीं किया. लेकिन भाजपा विधायक अनिल सिंह के बेटे को लाने के लिए स्पेशल पास जारी करने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं होती.
  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लॉकडाउन की घोषणा की. कड़े शब्दों में कहा: लॉकडाउन मतलब संपूर्ण लॉकडाउन. जो जहां है वहीं रहेगा. पर, उन्हें गुजरात के लोगों (धार्मिक यात्रा पर निकले थे) को उत्तराखंड से अपने गृह राज्य गुजरात वापस पहुंचाने में किसी तरह की दिक्कत नहीं नजर आयी.
  •  झारखंड की भाजपा लॉकडाउन को लेकर हेमंत सरकार पर हमलावर है. उसी पार्टी के दो सांसद संजय सेठ और पीएन सिंह लॉकडाउन में दिल्ली से झारखंड आ गये. हद तो तब हो गयी, जब सांसद संजय सेठ की रांची के डीसी के साथ तस्वीर अखबारों में छपी. जिस डीसी की जिम्मेदारी थी कि वह संजय सेठ को क्वारेंटाइन करने का आदेश देते, वही संजय सेठ के साथ फोटो खिंचवाते दिखे. इसपर भाजपा भी चुप और सरकार भी चुप.
  •  देशभर में शादी समारोह पर रोक है. कर्नाटक में एक राजनेता ने बेटे की शादी में भव्य समारोह का आयोजन किया. कार्यक्रम में वहां के सीएम येदुरप्पा भी शामिल हुए. यह खुल्लम खुल्ला लॉकडाउन का उल्लंघन है. सीधे तौर पर प्रधानमंत्री के आदेश की धज्जियां उड़ायी गयीं. पर किसी ने किसी पर कोई कार्रवाई नहीं की. दिल्ली परिवहन विभाग के अफसर को सस्पेंड करने वाली केंद्र सरकार को यह अपराध नजर नहीं आयी.
  •  जनवरी से लेकर 23 मार्च तक विदेशों से लोग आते रहें. उनकी ठीक से जांच तक नहीं की गयी. देशभर में कोरोना फैला. पर जब मजदूर घर लौटने के लिए निकले तो उन्हें लाठी से पीटा गया.

तो क्या अब भी नहीं समझ पा रहे हैं. देश में दो तरह के कानून हैं. पैसे वाले-अमीर लोगों के लिए अलग और गरीब-मजदूर के लिए अलग. कानून का पालन कराने की जिम्मेदारी जिन पर हैं, वह लोगों के कपड़े, गाड़ी और रहन-सहन को देखकर कार्रवाई करते हैं.

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अमीरों के लिए हर परिस्थिति में हर तरह की सुविधाएं उपलब्ध कराने वाली हमारी सत्ता गरीबों, मजदूरों व किसानों के मामले में कानून का पालन कराने के बहाने जुल्मी की भूमिका में नजर आने लगती है.
इसी सत्ता को पाने के लिए चुनाव के वक्त हमारे नेता कैसे-कैसे वायदे करते हैं. ये याद करने की जरूरत है. यह तय करने की भी जरूरत है कि वर्तमान व्यवस्था में गरीब, मजदूर और किसान सिर्फ वोट बैंक हैं. या सच में कल्याणकारी सरकार होने का दंभ भरने वाली हमारी इस व्यवस्था में उनके लिए कोई जगह भी बची है?

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