Opinion

कोरोना के बाद कितनी बदलेगी दुनिया, कैसा होगा हमारा रहन-सहन और काम का तरीका, जानें इस लेख में

Soumitra Roy

कोरोना की वैश्विक महामारी के बाद की दुनिया कैसी होगी ?  क्या बदलेगा ? कितना और कहां तक सटीक अनुमान लगाया जा सकता है ?

काफी सोचने, पढ़ने और विश्लेषण के बाद बस एक छोटी सी कोशिश की है. भारत और दुनिया में आने वाले समय की कुछ बड़ी घटनाओं को समेटने की.

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– राजनीति : सत्ता की चाबी हासिल करने का जरिया अब तक बैलेट, बुलेट, वंशानुगत या धार्मिक रहा है. यह बदलेगा. चुनाव तो होंगे, लेकिन जीत उसी की होगी जिसने खुद को साबित किया हो. कोरोना ने दुनिया के दो बड़े नेताओं को हार के कगार पर खड़ा कर दिया है – नरेंद्र मोदी और उनके मित्र ट्रम्प. बिहार से लेकर बंगाल और व्हाइट हाउस तक,  बड़े झटके देने को तैयार हैं. चीन इस मामले में सबसे आगे है. माओ के बाद चीन ने हर मोर्चे पर ख़ुद को साबित किया है. ताज़ा मामला कोरोना का है.

– सूचना का संसार : फेक न्यूज़ और रियल न्यूज़ के बीच की बढ़ चुकी खाई अब विश्वसनीय और अविश्वसनीय के बीच बदलेगी. दुनिया को पता चल चुका है कि कानूनी दांव-पेंच और सरकारी नियंत्रण सूचनाओं को विश्वसनीय नहीं बना सकते. लिहाज़ा, सूचनाओं को तैयार करने का तरीका और प्रसारण का माध्यम उनकी विश्वसनीयता तय करेगा. मेरे पत्रकार मित्रों को जागने की जरूरत है.

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– निजता में दखल : कोविड 19 ने आपके घर में कई जासूसों का इंतज़ाम कर दिया है. आरोग्य सेतु एप्प पर मोदी सरकार इसलिए ज़ोर दे रही है ताकि आपकी गतिविधि की जासूसी हो सके. चीन ने कोरोना को रोकने के लिए यही किया. जल्द ही पूरी दुनिया करेगी. आपका सर्विस प्रोवाइडर ही शायद आपकी लोकेशन को लगातार ट्रेस करे.

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– कामकाजी दुनिया : बैठने की सीटों के बीच दूरी,  शिफ्ट में काम,  वर्चुअल मीटिंग और दफ्तर में एंट्री के लिए कार्ड्स ये सब सफाई की नई आदतों के अलावा होंगे.  ITC, हिन्द लीवर,  डाबर आदि ने तैयारी कर भी ली है. वर्क फ्रॉम होम को ज्यादा तवज्जो मिलेगी.

– इकोनॉमी : आपको हैरत नहीं होनी चाहिए कि अगले 3 साल तक सड़क पर बहदवास घूमता हर चौथा शख्स बेरोजगार मिले. पेट्रोल-डीजल के दाम 150 रुपये को छूने लगें,  आपके पड़ोस की किराना दुकानों में ताले लगे नज़र आएं और उद्योगों को मज़दूरों को लुभाने के लिए रोज़ाने की मजदूरी 1000  रुपये तक करनी पड़े. मध्यम वर्ग इस दौरान सबसे ज़्यादा पिसेगा. एक्सपोर्ट,  इम्पोर्ट के लिए बाज़ार खोजने पड़ेंगे और वैश्विक व्यापार के मायने ही बदल जाएं. लोग गांव की ओर भागें. खेती फिर से जोर पकड़ ले. शांति,  भीड़ और बीमारियों से अलग-थलग,  अकेली ज़िंदगी लोगों को भाने लगे.

शायद ऐसा हो या न हो या फिर कुछ बातें छूट रही हों.

लेकिन खामोश ग़ाज़ीपुरी का यह शेर ज़रूर काम का है –

उम्र जलवों में बसर हो ज़रूरी तो नहीं

हर शब-ए-ग़म की सहर हो ये ज़रूरी तो नहीं.

डिस्केमरः ये लेखक के निजी विचार हैं.

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