Opinion

||OPINION|| #Corona से डरें नहीं, संकट को अवसर में बदलने पर विचार करें

Nitish Priyadarshi

Ranchi : कोरोना से ज्यादा अनजाने डर से लोग परेशान हैं. ये समय अवसाद का नहीं अवसर का है. आज कोरोना का भय चारों तरफ व्याप्त है. तरह तरह की सूचनाएं सोशल वेबसाइट्स पर शेयर की जा रही हैं. इस वायरस के बारे में किसी को कोई सटीक जानकारी नहीं है. ऐसा लग रहा है कि इस बीमारी से ज्यादा जो भय उत्पन्न हो रहा है, उससे ज्यादा लोग परेशान हैं. भय ज्यादा उसी को लेकर है. जिसके बारे में हमको अधिक ज्ञान नहीं होता जैसे ये कोविड – 19 या फिर अकाल मृत्यु का भय. कोरोना के बारे कोई भी सटीक जानकारी नहीं है और न ही दवा. यही भय का सबसे बड़ा कारण है. फिर नौकरी जाने का भय, भूखे मरने का भय, गरीब होने का भय, ये सारे कारण लोगों को परेशान कर रहे हैं. कोरोना के भयभीत कर देनेवाली सूचनाओं से लोग काफी डरे हुए हैं. जिसके चलते इतनी अधिक मात्रा में पलायन,  भूख से मरना,  आत्महत्या की खबरें आ रही हैं. लोग अपने-अपने हिसाब से सूचनाओं का आदान-प्रदान कर रहे हैं, जिसकी कोई वैज्ञानिक सत्यता नहीं है. लोगों का ध्यान सिर्फ नकारात्मक समाचारों पर जा रहा है कि रोज कितने लोग मर रहे हैं.

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यह भी देखना होगा कि मरने से ज्यादा लोग इस बीमारी से ठीक हो रहे हैं. क्योंकि वायरस से तो आप बच सकते हैं लेकिन ये जो मरने का भय लोगों के दिलों में बैठ गया है उससे बचना बहुत मुश्किल है. आज के समय में बहुत कठिन है यह समझना कि भयभीत नहीं होना है. लेकिन अगर हमलोग भयभीत होते रहे तो भविष्य के लिए कुछ भी योजना नहीं बना पायेंगे. वायरस से तो कम इस भय से ज्यादा लोग मरेंगे. अगर इस भय को जल्दी न निकाला गया तो कई सामाजिक रिश्तों में भी दरारे पड़ेंगी.

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रही बात महामारी की तो विश्व में पहले भी कई महामारी आयी और लाखों लोग मरे और जिस तरीके से मनुष्य इस प्रकृति के साथ खिलवाड़ कर रहा है तो भविष्य में भी कई तरह की महामारियां आयेंगी. पहले लाखों लोग प्लेग, इबोला वायरस,  डेंगू,  मलेरिया और हैज़ा इत्यादि से मरे. भारत में मनुष्यजनित आपदा से भी हज़ारों लोग मरे हैं. जैसे कि भोपाल गैस त्रासदी. विश्व में इस वायरस से ज्यादा लोग प्राकृतिक आपदा से मर रहे हैं. जैसे बाढ़, सुनामी, भूकंप, सूखा इत्यादि. हम सभी को 2001 के गुजरात का भूकंप याद होगा इसमें करीब 20,000 लोग मारे  गये थे. उत्तराखंड त्रासदी इसमें करीब 10,000 लोग मारे गये. बहुतों का शव आज तक नहीं मिला. दूसरी तरफ  ह्रदय घात, किडनी का काम नहीं करना, कैंसर जैसी बीमारियां ज्यादा लोगों को मार रही हैं.

अगर भय से निकलना है तो इस समय को डर में जीने से ज्यादा अच्छा होगा कि लोग अपना समय नये अवसर ढूंढ़ने में लगायें.  नकारत्मक वीडियो या फिर समाचार न पढ़ें.  अगर अभी कमाई कम हो गयी हो तो उसको कैसे बढ़ाया जाये ये सोचने में लगायें,  नये व्यवसाय के बारे में सोचें,  नयी-नयी चीजों को सीखें, किताबों को पढ़ें,  व्यायाम करें,  शरीर को खूब थकाएं, शरीर की प्रतिरोधक शक्ति को बढ़ाएं,  बीमारी पर बेवजह चर्चा करने से बचें क्योंकि इस बीमारी के बारे में हम कुछ नहीं जानते. जो गरीब मज़दूर वापस आ रहे हैं वो भी अब गंभीरता से सोचें कि अब क्या करना है. सरकार को उनकी मदद करनी होगी.

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ये भय एक सामूहिक पागलपन की तरह है जो वायरस से ज्यादा तेज़ी से फैलेगा. लोग मृत्यु से पहले मृत्यु तुल्य कष्ट को झेलेंगे एक जिन्दा लाश की तरह. पूरा समाज बिखर जायेगा. लोग एक दूसरे से डरेंगे. डर मनुष्य का एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है. इस महामारी में डर तो लगेगा लेकिन अगर हो सके तो इस डर को अपने ऊपर हावी नहीं होने दें. प्रकृति ने लॉक डाउन के बहाने हम सभी को अपने को समझने के लिए बहुत अच्छा समय दिया है. इस समय में डरने की बजाय इसका सदुपयोग करने की जरूरत है. इतना ध्यान रखिये कि विश्व में पहले भी कई तरह की महामारी आयी और करोड़ों लोग भी मरे फिर भी दुनिया चल रही है. पहले भी प्राचीन काल में सूखे और बाढ़ की वजह से लाखों लोग विस्थापित हुए थे.

पृथ्वी हमेशा संतुलन बनाये रखने के लिए इस तरह की आपदा लाती है. जब से पृथ्वी बनी है (4.5 बिलियन वर्ष पहले) तब से संतुलन बनाये रखने के लिए पांच बार महाविनाश कर चुकी है. ये भी तय है कि छट्ठा महाविनाश अपने प्रथम चरण में है और आनेवाले सालों में ये धीरे धीरे बढ़ेगा. अब समय चिंतन करने का है कि कैसे इस आपदा से निकला जाये. अगर भविष्य में इस तरह की महामारी से बचना है तो पृथ्वी और पर्यावरण के बनाये हुए नियमों को पालन करना होगा.

(लेखक पर्यावरणविद् हैं और रांची विश्वविद्यालय के भूगर्भ विज्ञान में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं)

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