LITERATURE

खुद महज आठवीं कक्षा तक पढ़े लेकिन लेनिनग्राद विश्वविद्यालय में स्टूडेंट्स को पढ़ाया

स्वाध्याय और यायावरी की अनूठी मिसाल राहुल सांस्कृतायन की जयंती पर विशेष

Naveen Sharma

Ranchi : कोई व्यक्ति अपने जीवन में स्वाध्याय और लगन से कितना आगे बढ़ सकता है उसकी शानदार मिसाल पंडित राहुल सांस्कृतायन. महज आठवीं कक्षा तक पढ़े लेकिन सोवियत यूनियन की लेनिनग्राद विश्वविद्यालय में अध्यापन किया.
उत्तर प्रदेश में आजमगढ़ के पंदहा गांव में 9 अप्रैल, 1893 को भूमिहार ब्राह्मण परिवार में उनका जन्म हुआ. बचपन में उनका नाम केदारनाथ पाण्डेय था. उनके पिता गोवर्धन पाण्डेय और कुलवंती देवी थीं. माता का निधन बचपन में ही हो गया था इसलिए शुरुआती परवरिश ननिहाल में हुई.

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बाल विवाह हुआ तो घर छोड़कर साधु हुए

उन दिनों बाल विवाह का चलन था और इनकी भी शादी बचपन में ही करा दी गई. यह बात उन्हें जमी नहीं. वो घर छोड़ कर भागे और साधु हो गए. जो घर से निकले तो पूरी दुनिया को घर बना लिया. कोलकाता, काशी, दार्जिलिंग, तिब्बत, नेपाल, चीन, श्रीलंका, सोवियत संघ… कदमों से उन्होंने दुनिया नाप दी. जहां गए, वहां की जुबान सीखी और फिर से कुछ लेकर और कुछ देकर निकले.

एक लिहाज से राहुल सांकृत्यायन अपने दौर के कबीर थे. उन्होंने कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली, लेकिन जिनमें अनुभवों से सीखने की क्षमता होती है. उनके लिए तो जीवन से बड़ा गुरु कोई हो ही नहीं सकता. जीने के क्रम में जो अनुभव मिला, जो देखा-सुना, जो भोगा और महसूस किया, उन सभी को अपने भीतर समाहित करते चले गए.

जीवन ने उन्हें पंडित ही नहीं, महापंडित बनाया और इस महापंडित के ज्ञान के सागर में आज भी अनगिनत लोग डुबकी लगाते हैं. वो ऐसे महाज्ञानी थे, जिन्हें सोवियत संघ और श्रीलंका में पढ़ाने के लिए बुलाया गया. यह असधारण बात है और यह उनके असाधारण व्यक्तित्व का परिचायक है.

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आर्य समाजी बन गए, नाम हुआ ‘रामोदर साधु’

राहुल घर छोड़ कर भागे और दयानंद सरस्वती के अनुयायी यानी आर्य समाजी बन गए. साधु बन गए और उनका नाम केदारननाथ पाण्डेय से ‘रामोदर साधु’ हो गया. फिर 1930 में श्रीलंका पहुंचे और वहां बौद्ध धर्म की दीक्षा ली.‘रामोदर साधु’ से ‘राहुल’ बने और ‘सांकृत्य’ गोत्र होने के कारण सांकृत्यायन कहलाए. इन दौर में ईश्वर में उनकी आस्था खत्म हो चुकी थी, लेकिन पुनर्जन्म में यकीन बना हुआ था.

जीवन के आखिरी दिनों में उनका झुकाव कार्ल मार्क्स के सिद्धांतों की ओर हुआ और पुनर्जन्म या फिर मृत्य के बाद के जीवन पर उनका यकीन खत्म हो गया. जब कोई लंबा सक्रिय जीवन जीए तो वैचारिक स्थिति में बदलाव स्वभाविक होते हैं. बहुत से धार्मिक लोग उम्र के आखिरी पड़ाव में नास्तिक हो जाते हैं और बहुत से नास्तिक आस्तिक बन जाते हैं. यह जीवन के अनुभवों पर निर्भर करता है. कुछ अनुभव ऐसे होते हैं जो जीवन की धारा बदल देते हैं. कुछ ऐसा ही राहुल सांकृत्यायन के साथ हुआ और कई बार हुआ और उसमें एक निरंतरता बनी हुई थी.

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एक दर्जन से ज्यादा भाषाओं पर पकड़

सांकृत्यायन एक दर्जन से ज्यादा भाषाओं पर पकड़ रखते थे. वो भोजपुरी, हिंदी, संस्कृत, पाली, उर्दू, अरबी, फारसी, सिंघली, तमिल, कन्नड़, फ्रेंच और रूसी जुबान में दखल रखते थे. कोई व्यक्ति कितने विषयों पर पकड़ रख सकता है? दो-तीन विषय लेकिन राहुल सांकृत्यायन अनगिनत विषयों पर पकड़ रखते थे. उन्होंने समाजशास्त्र, धर्म, आध्यात्म, दर्शन, साम्यवाद, इतिहास, भाषा विज्ञान, संस्कृति जैसे अनेक विषयों पर गंभीर पुस्तकें लिखी हैं. उनके यात्रा वृतांत तो लाजवाब रहे हैं.

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तीन शादियां की जिनमें रूस की लोला येलेना भी

राहुल सांकृत्यायन की तीन शादियां हुईं. पहली शादी बचपन में हो गई. उनकी पत्नी का नाम संतोषी देवी था. लेकिन उनसे उनकी मुलाकात नहीं हुई. उन्होंने अपनी जीवनी में लिखा है कि 40 साल की उम्र में उन्हें बस एक बार देखा था. 1937-38 में लेनिनग्राद यूनिवर्सिटी में पढ़ाने के दौरान उनकी मुलाकात लोला येलेना से हुई. दोनों में प्रेम हुआ और शादी हुई. वहीं उनके बड़े बेटे इगोर का जन्म हुआ. जब वो भारत लौटे, तो उनकी पत्नी और बेटा वहीं रह गए.
जीवन के आखिरी दौर में उनकी शादी डॉ. कमला से हुई. उनकी तीन संतान हुईं. एक बेटी और दो बेटे.

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राहुल सांकृत्यायन का रचना संसार

कहानियां : सतमी के बच्चे, वोल्गा से गंगा, बहुरंगी मधुपुरी, कनैला की कथा
उपन्यास : बाइसवीं सदी, जीने के लिए, सिंह सेनापति, भागो नहीं, दुनिया को बदलो, मधुर स्वप्न, राजस्थानी रनिवास, विस्मृत यात्री, दिवोदास
आत्मकथा
मेरी जीवन यात्रा (पांच खंड में)
यात्रा वृतांत
किन्नर देश की ओर, चीन में क्या देखा, मेरी लद्दाख यात्रा, मेरी तिब्बत यात्रा, तिब्बत में सवा वर्ष, रूस में पच्चीस मास
दर्शन और इतिहास
मज्झिम निकाय – हिंदी अनुवाद, दर्शन दिग्दर्शन, मध्य एशिया का इतिहास, मानव समाज

इन्होंने करीब 100 पुस्तकें लिखी है. कुछ ऐसी पुस्तकें भी हैं जो कभी प्रकाशित नहीं हुईं. उनका यह साहित्यिक सफर अद्भुत है. उनकी पुस्तक “मध्य एशिया का इतिहास” के लिए 1958 में उन्हें साहित्य अकादमी अवॉर्ड मिला.
सृजन के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए 1963 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया.करीब 70 साल की उम्र में 14 अप्रैल, 1963 को दार्जिलिंग में उनका निधन हुआ.

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